सह-आरोपी का इकबालिया बयान; दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोप अटकलों के आधार पर होने के कारण चार्टर्ड अकाउंट के खिलाफ आरोप खारिज किए
Shahadat
18 Aug 2022 12:34 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने चार्टर्ड अकाउंट के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत सह-आरोपी द्वारा दिए गए इकबालिया बयानों के आधार पर अपने मुवक्किल को मनी लॉन्ड्रिंग में सहायता करने के लिए लगाए गए आरोपो खारिज कर दिये।
जस्टिस आशा मेनन की एकल पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत सह-आरोपी द्वारा दिए गए बयान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों के गठन में साजिश में भागीदारी स्थापित करने के लिए अपर्याप्त हैं।
याचिकाकर्ता विनोद कुमार किला ने विशेष न्यायाधीश, सीबीआई द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 13(1)(ई) सपठित धारा 13(2) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 109 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रिट याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया कि सीबीआई द्वारा बैंगलोर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के चीफ इंजीनियर अरविंद कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 109 और आईपीसी की 13 (1) (ई) के सपठित धारा 13 (2) के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इंजीनियर पर आरोप लगाया कि उसने आय से अधिक संपत्ति अर्जित की है। याचिकाकर्ता ने कहा कि लोक सेवक की पत्नी और कई अन्य के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है।
याचिकाकर्ता विनोद कुमार किला ने तर्क दिया कि सीबीआई ने याचिकाकर्ता को आरोपी बनाते हुए आरोप पत्र दायर किया कि याचिकाकर्ता ने सह-आरोपी की कंपनी का चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के कारण उसे काले धन को सफेद में बदलने में मदद की।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उसके खिलाफ कथित आरोप सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज तीन बयानों पर आधारित हैं। आरोप पत्र में आरोपी के रूप में नामित व्यक्तियों द्वारा दिए गए और उक्त बयानों से बाद में वे पीछे हट गए। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोपी के इकबालिया बयान का इस्तेमाल याचिकाकर्ता के खिलाफ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह सह-आरोपी है।
इसलिए, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने में गलती की है, क्योंकि सह-आरोपी के उक्त वापस लिए गए बयानों के अलावा याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं है कि उसने उक्त लोक सेवक को अपराध करने के लिए उकसाया है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) में प्रावधान है कि लोक सेवक को आपराधिक कदाचार का अपराध करने के लिए कहा जाता है, यदि वह या उसकी ओर से कोई व्यक्ति निश्चित अवधि के दौरान किसी भी समय आर्थिक संसाधनों या आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति का मालिक है, जिसके लिए लोक सेवक संतोषजनक रूप से हिसाब नहीं दे सकता।
आईपीसी की धारा 109 किसी अपराध के लिए उकसाने के लिए सजा का प्रावधान करती है।
हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि एशियन रिसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी (पी) लिमिटेड बनाम सीबीआई (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आरोप तय करने का आदेश विशुद्ध रूप से अंतःक्रियात्मक आदेश नहीं है और न ही यह अंतिम आदेश है। इसलिए, अधिकार क्षेत्र हाईकोर्ट के लिए वर्जित नहीं है। हालांकि, न्यायालय को केवल दुर्लभतम मामलों में आरोप तय करने वाले आदेश के खिलाफ चुनौती पर विचार करना चाहिए और जहां क्षेत्राधिकार की त्रुटि है।
हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का मानना है कि इस बात की संभावना है कि कोई भी आरोपी सीआरपीसी की धारा 315 के तहत गवाही देना पसंद कर सकता है। इसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 21 या सीआरपीसी की धारा 164 के तहत इकबालिया बयान के साथ पढ़ा जाए। याचिकाकर्ता के खिलाफ साबित हो सकता है, इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय किया जा सकता है।
यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप केवल अदालत के समक्ष सामग्री के आधार पर तय किए जा सकते हैं और वे अटकलों पर आधारित नहीं हो सकते हैं, अदालत ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई स्वतंत्र सामग्री नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"इसमें कोई तर्क नहीं कि इस तरह का तर्क वास्तव में जटिल है। आरोप केवल अदालत के समक्ष सामग्री के आधार पर तय किया जा सकता और अटकलों पर आधारित नहीं हो सकता। अदालत को इस बात पर विचार करना है कि क्या आरोप पत्र और दस्तावेजों पर सीबीआई द्वारा भरोसा किया गया है, जिसमें सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज किए गए इकबालिया बयानों को वापस लेने के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार हैं।"
बेंच ने कहा कि सह-आरोपी द्वारा दिए गए बयान वापस लेने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त है। प्रथम दृष्टया सह-आरोपियों के साथ साजिश में याचिकाकर्ता की भागीदारी को आईपीसी की धारा 109 के तहत अपराधों के कमीशन की सुविधा के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के धारा 13(1)(e) और सपठित धारा 13(2) है। यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट वर्तमान में मौजूद नहीं होने की संभावना के लिए इंतजार करना और देखना चाहता है, कोर्ट ने फैसला कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाए गए तर्क जटिल है, इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों को कायम नहीं रखा जा सकता।
इस प्रकार, कोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर लिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों के साथ-साथ आरोपों पर पारित आदेश रद्द कर दिया।
केस टाइटल: विनोद कुमार किला बनाम सीबीआई
दिनांक: 08.08.2022 (दिल्ली हाईकोर्ट)
याचिकाकर्ता के वकील: आर.के. हांडू, आदित्य चौधरी एवं गर्वित सोलंकी, एडवोकेट।
प्रतिवादी के लिए वकील: मृदुल जैन, एसपीपी
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