दिल्ली हाईकोर्ट चीफ़ जस्टिस ने CBI के एक्साइज़ पॉलिसी केस को जस्टिस स्वरणा कांता शर्मा से हटाने अर्ज़ी खारिज की
Shahadat
15 March 2026 6:27 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल की अर्ज़ी खारिज की, जिसमें उन्होंने CBI के एक्साइज़ पॉलिसी केस को जस्टिस स्वरणा कांता शर्मा से हटाकर किसी दूसरी बेंच को सौंपने की गुज़ारिश की थी।
चीफ़ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि मौजूदा रोस्टर के मुताबिक, CBI की अर्ज़ी जस्टिस शर्मा को ही सौंपी गई है और अगर कोई जज खुद को केस से अलग करना चाहता है तो यह फ़ैसला उसे खुद ही लेना होगा।
कोर्ट ने कहा,
"हालांकि, मुझे ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता कि मैं प्रशासनिक तौर पर कोई आदेश जारी करके इस अर्ज़ी को किसी दूसरी बेंच को सौंप दूं।"
AAP प्रमुख ने CBI की उस क्रिमिनल अर्ज़ी को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग की थी, जिसमें इस केस में उन्हें बरी किए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी गई। इस मामले में अरविंद केजरीवाल भी एक पक्षकार हैं।
यह मामला 9 मार्च को जस्टिस शर्मा के सामने सुनवाई के लिए आया था। उन्होंने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की उस अर्ज़ी पर नोटिस जारी किया था, जिसमें कथित शराब नीति घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य लोगों को बरी किए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी गई।
ऐसा करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि शराब नीति केस में AAP नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य सभी आरोपियों को बरी करते समय ट्रायल कोर्ट ने गवाहों और सरकारी गवाहों के बयानों के बारे में जो टिप्पणियां कीं, वे "पहली नज़र में गलत लगती हैं और उन पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है।"
AAP प्रमुख ने कहा कि 9 मार्च के आदेश में यह साफ़ नहीं बताया गया कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों में "खास तौर पर क्या गड़बड़ी" थी। उन्होंने आगे कहा कि संबंधित बेंच पहले ही एक्साइज़ पॉलिसी केस से जुड़े कई मामलों पर सुनवाई कर चुकी है और उसने पहली नज़र में टिप्पणियां करते हुए आरोपियों की तरफ़ से दायर की गई अर्जियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपियों को राहत दी। उन्होंने कहा कि उनकी यह मांग किसी निजी पूर्वाग्रह पर आधारित नहीं है, बल्कि एक निष्पक्ष और जानकार मुक़दमेबाज़ के मन में पैदा होने वाली "वाजिब आशंका" की कसौटी पर आधारित है। AAP नेता ने इस आधार पर केस को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग की है कि उन्हें "गंभीर, वास्तविक और वाजिब आशंका है कि इस मामले की सुनवाई निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से नहीं हो पाएगी।"
बता दें, ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि अरविंद केजरीवाल पर लगाए गए आरोप सह-आरोपियों या गवाहों के बयानों पर आधारित हैं, लेकिन ऐसा कोई भी स्वतंत्र सबूत नहीं मिला, जो उन्हें किसी भी आपराधिक साज़िश से जोड़ता हो। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पाया कि CBI ने एक लंबे समय तक अप्रूवर के बयान बार-बार रिकॉर्ड किए "ज़ाहिर तौर पर कमियों को भरने, प्रॉसिक्यूशन की कहानी को बेहतर बनाने, और भी आरोपियों को फंसाने, या परिस्थितियों की कड़ी में छूटी हुई कड़ियों को जान-बूझकर जोड़ने के लिए।"
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा,
"जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसमें कुछ तथ्यात्मक विसंगतियां बताई गईं; गवाहों और अप्रूवरों के बयानों के बारे में ट्रायल कोर्ट जज ने आरोप तय करने के चरण में ही जो टिप्पणियां कीं, वे पहली नज़र में गलत लगती हैं और उन पर विचार करने की ज़रूरत है।"
जज ने आगे कहा कि CBI के जांच अधिकारी के खिलाफ की गई कड़ी टिप्पणियां—कि उन्होंने अपनी सरकारी पद का गलत इस्तेमाल करके गलत तरीके से जांच की—पहली नज़र में "बुनियादी तौर पर गलतफहमी पर आधारित लगती हैं, खासकर तब जब ये टिप्पणियां आरोप तय करने के चरण में ही की गई हों।"
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए जज ने जांच अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर रोक लगाई, जिसमें उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करने का निर्देश भी शामिल था।
इस बीच कोर्ट ने उस ट्रायल कोर्ट से अनुरोध किया, जहां मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी कार्यवाही चल रही है, कि वह इस मामले की सुनवाई को उस तारीख के बाद की किसी तारीख तक के लिए टाल दे, जो हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए तय की गई, और CBI की याचिका के नतीजे का इंतज़ार करे।
27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में सभी 23 आरोपियों को बरी किया, जिनमें राजनीतिक नेता केजरीवाल, सिसोदिया और के. कविता भी शामिल हैं।
जिन सभी को बरी किया गया, उनके नाम हैं: कुलदीप सिंह, नरेंद्र सिंह, विजय नायर, अभिषेक बोइनपल्ली, अरुण पिल्लई, मूथा गौतम, समीर महेंद्रू, मनीष सिसोदिया, अमनदीप सिंह ढल्ल, अर्जुन पांडे, बुच्चीबाबू गोरंटला, राजेश जोशी, दामोदर प्रसाद शर्मा, प्रिंस कुमार, अरविंद कुमार सिंह, चनप्रीत सिंह, के. कविता, अरविंद केजरीवाल, दुर्गेश पाठक, अमित अरोड़ा, विनोद चौहान, आशीष चंद माथुर और शरथ रेड्डी।
ट्रायल कोर्ट ने जांच में हुई चूकों के लिए CBI को कड़े शब्दों में फटकार लगाई और कहा कि "विशाल चार्जशीट" में कई कमियां हैं, जिनका समर्थन किसी भी गवाह या बयान से नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि CBI सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला बनाने में विफल रही। स्पेशल CBI जज ने आगे कहा कि केजरीवाल को बिना किसी ठोस सबूत के इस मामले में फंसाया गया।
उल्लेखनीय है, सिसोदिया इस मामले में लगभग 530 दिनों तक जेल में रहे थे।
अरविंद केजरीवाल दो अलग-अलग अवधियों में कुल मिलाकर लगभग 156 दिन जेल में रहे। उन्हें आखिरकार 13 सितंबर, 2024 को रिहा किया गया; इससे पहले उन्हें ED वाले मामले में अंतरिम जमानत मिल चुकी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें CBI वाले मामले में भी जमानत दी।
आबकारी नीति (Excise Policy) दिल्ली सरकार द्वारा 2021 में राजस्व बढ़ाने और शराब व्यापार में सुधार लाने के उद्देश्य से बनाई गई थी। हालांकि, इसके लागू होने में अनियमितताओं के आरोप लगने के बाद इस नीति को वापस ले लिया गया। उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस नीति की जांच CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो) से करवाने का आदेश दिया।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दावा किया कि इस नीति—जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजधानी में शराब व्यापार का पूरी तरह से निजीकरण करना था—का इस्तेमाल निजी संस्थाओं को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए किया गया, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा और इसमें भ्रष्टाचार की बू आती थी। मनीष सिसोदिया को सबसे पहले 26 फरवरी, 2023 को आबकारी नीति से जुड़े एक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने गिरफ्तार किया। बाद में 9 मार्च, 2023 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गिरफ्तार किया। CBI द्वारा दर्ज की गई FIR में सिसोदिया और अन्य लोगों पर 2021-22 की आबकारी नीति के संबंध में 'सिफारिश करने' और 'निर्णय लेने' में अहम भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया। आरोप है कि उन्होंने ये काम "सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना टेंडर के बाद लाइसेंसधारी को अनुचित लाभ पहुंचाने के इरादे से" किए।
केंद्रीय एजेंसी ने यह भी दावा किया कि AAP नेता को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने सवालों के टालमटोल वाले जवाब दिए और जांच में सहयोग करने से इनकार किया, जबकि उनके सामने सबूत भी पेश किए गए।
AAP प्रमुख (केजरीवाल) को 26 जून, 2024 को CBI द्वारा औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया; उस समय वे कथित शराब नीति घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में थे।

