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दिल्ली हाईकोर्ट ने पिता को मुलाकात का अधिकार देने के आदेश पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिका को खारिज किया

LiveLaw News Network
9 May 2022 6:33 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने पिता को मुलाकात का अधिकार देने के आदेश पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिका को खारिज किया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पुनर्विचार याचिका को खारिज किया, जिसमें पिता को मुलाकात के अधिकार देने, अगर वह एक ही इमारत में रहता है, के आदेश को चुनौती देने की मांग की गई थी।

जस्टिस कामेश्वर राव ने कहा,

"किसी भी स्थिति में इस न्यायालय ने 28 अक्टूबर, 2021 के ट्रायल कोर्ट के आक्षेपित आदेश को संशोधित करते हुए, इस तथ्य को नोट किया था कि नाबालिग बच्चे की उम्र तीन साल से कम है और इस तथ्य से इनकार नहीं है कि अंततः मुलाकात का अधिकार देते समय, बच्चे का हित है, जो सर्वोपरि है। मुझे याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता है, इसे खारिज कर दिया जाता है।"

यह पुनर्व‌िचार याचिका प्रतिवादी/आवेदक ने 24 मार्च, 2022 के आदेश पर पुनर्व‌िचार के लिए दायर की थी, जिसके तहत अदालत ने उसे उसी संपत्ति में रहने वाले प्रतिवादी/आवेदक के अधीन नाबालिग बच्चे को मुलाकात का अधिकार दिया था। उन्होंने अदालत को सूचित किया कि उन्होंने पहले भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक एसएलपी दायर की थी, जिसमें आदेश को इस शर्त की सीमा तक चुनौती दी गई थी कि जब वह उसी संपत्ति में रह रहे हों, तभी मुलाकात की अनुमति दें।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि प्रतिवादी/आवेदक को दिए गए मुलाकात के अधिकार उन्हें उपरोक्त परिसर में रहने की शर्त के अधीन थे, जो स्पष्ट रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि न्यायालय के समक्ष यह प्रतिनिधित्व किया गया था कि प्रतिवादी आवेदक उक्त परिसर से बाहर चले गए थे और इस तथ्य को इस न्यायालय ने नोट किया है।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि हाईकोर्ट का निष्कर्ष कि ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी/ आवेदक को केवल उक्त संपत्ति में बच्चे से मिलने के लिए मुलाकात का लाभ दिया है, सही नहीं है क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी थी। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्त हाईकोर्ट नहीं रख सकता, खासकर जब अदालत ने बच्चे को पार्क में ले जाने की अनुमति दी है और यह भी कहा है कि उसे बच्चे को दिल्ली के न्यायालयों की क्षेत्रीय सीमा से बाहर नहीं ले जाना चाहिए। .

इसका मतलब यह था कि प्रतिवादी/आवेदक बच्चे को दिल्ली के भीतर कहीं भी ले जाने के लिए स्वतंत्र था। इसलिए, शर्त पर पुनर्व‌िचार/वापस लेने की आवश्यकता है।

दूसरी ओर सुश्री लोहिया ने इस आधार पर पुनर्व‌िचार का विरोध किया कि पुनर्व‌िचार याचिका के समर्थन में हलफनामा खुद याचिका से पहले का है और इस तरह कानून की नजर में कोई हलफनामा नहीं है। उन्होंने कहा, शर्त संख्या III यानी मुलाकात के अधिकार के बारे में जब प्रतिवादी/आवेदक एक ही संपत्ति में रहते हों, सही ढंग से रखा गया है,, जैसा कि मूल मामले में प्रतिवादी/आवेदक का स्वयं का मामला था- कि पार्टियां प्रतिवादी/आवेदक द्वारा तय एक सर्विस अपार्टमेंट में रह रही हैं और याचिका/गैर-आवेदक और बच्चा उसी इमारत में ऊपर रह रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा, वास्तव में यह याचिकाकर्ता/गैर-आवेदक का मामला है कि प्रतिवादी/आवेदक परिसर में नहीं रह रहे थे और ओबेरॉय होटल में रह रहे थे। उन्होंने कहा कि इस अदालत द्वारा लगाई गई शर्त संख्या III इस मामले के तथ्यों में एक उपयुक्त शर्त है और पुनर्व‌िचार याचिका को खारिज करने की मांग करती है।

कोर्ट ने दर्ज किया कि जब ट्रायल कोर्ट ने आक्षेपित आदेश पारित किया था, तो प्रतिवादी/आवेदक का यह मामला था कि वह परिसर में रह रहा था और उसके बयान के अनुसार 20 दिसंबर, 2021 तक वर्तमान याचिका के लंबित रहने के दौरान भी वह वहीं रहा। हालांकि, वह उक्त परिसर से बाहर चला गया, क्योंकि वह इस तथ्य के कारण निराश महसूस कर रहा था कि मुलाकात के घंटों को संशोधित किया गया था और स्थानीय आयुक्त को उसकी मुलाकातों का पर्यवेक्षण करना था।

"यहां तक ​​​​कि इस अदालत ने 15 दिसंबर, 2021 के आदेश के माध्यम से भवन की दूसरी मंजिल पर प्रत्येक शनिवार को शाम 4.00 बजे से शाम 7.00 बजे तक बच्चे से मिलने के लिए अंतरिम व्यवस्था के रूप में मुलाकात की अनुमति दी है। ऐसा प्रतीत होता है, उक्त निर्देश को प्रतिवादी/आवेदक की ओर से दिए गए सबमिशन के आधार पर पास किया किया गया है कि उसे बच्चे को लेने और उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर एक कमरे में ले जाने की अनुमति दी जाए, जो उसके विशेष अधिकार में है।"

कोर्ट ने कहा कि किसी भी स्थिति में हाईकोर्ट ने आक्षेपित आदेश में संशोधन करते हुए इस तथ्य को नोट किया था कि नाबालिग बच्चा तीन साल से कम उम्र का है और यह इस तथ्य से इनकार नहीं है कि अंततः मुलाक़ात का अधिकार देते समय बच्चे का हित सर्वोपरि है।

उपरोक्त को देखते हुए, न्यायालय ने आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया और पुनर्व‌िचार याचिका को खारिज कर दिया।

केस शीर्षक: किनरी धीर बनाम वीर सिंह

सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (दिल्ली) 422

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