दिल्ली की अदालत ने तेज और लापरवाही भरी ड्राइविंग के आरोपी भारतीय को ऑस्ट्रेलिया प्रत्यर्पित करने की सिफारिश की, नस्लीय पूर्वाग्रह के दावे को खारिज किया
LiveLaw News Network
1 Sept 2021 3:52 PM IST

दिल्ली की एक अदालत ने हाल ही में एक भगोड़े अपराधी को ऑस्ट्रेलिया को प्रत्यर्पित करने की सिफारिश की। युवक पर कल्पेबल ड्राइविंग और लापरवाही से गंभीर चोट पहुंचाने का अरोप था, जिसके कारण 2008 में एक पैदल यात्री की मौत हो गई थी, जबकि एक अन्य को गंभीर चोट आई थी। युवक पर विदेश यात्रा दस्तावेज के अनुचित उपयोग का भी आरोप था।
अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट आकाश जैन ने भगोड़े अपराधी पुनीत की दलील को खारिज कर दिया कि उसे स्थानीय मीडिया और ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय समुदाय में नस्ल और राष्ट्रीयता के आधार पर निशाना बनाया जा रहा था।
कोर्ट ने कहा, "हालांकि, DW-1 और DW-2 की गवाही वर्तमान मामले के तथ्यों से संबंधित नहीं है, DW-3 रिकॉर्ड पर यह दिखाने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं ला सका कि FC पर मौजूदा मामले में उसकी नस्ल, धर्म या राष्ट्रीयता के कारण मुकदमा चलाया जा रहा है। बिना ठोस सबूत के केवल यह कहना कि नस्लीय पूर्वाग्रह और राजनीतिक आग्रह है, एफसी के मामले का समर्थन नहीं करता है।"
अदालत ने कहा, "मेरी रिपोर्ट के मद्देनजर, मैं यूनियन ऑफ इंडिया को FC पुनीत के प्रत्यर्पण की सिफारिश अनुरोधकर्ता राज्य यानी ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रमंडल सरकार को अपराधों के मुकदमे का सामना करने के लिए करता हूं।"
पुनीत पर एक अक्टूबर 2008 कल्पेबल ड्राइविंग के कारण एक पैदल यात्री की मौत और लापरवाही से दूसरे को गंभीर चोट पहुंचाने का आरोप लगाया गया था। उस पर आरोप था कि वह कथित तौर पर नशे की हालत में और लापरवाही से एक सेडान कार चला रहा था, जिससे डीन बायरन हॉफस्टी की मौत हो गई और क्लैंसी कोक को गंभीर चोटें आईं।
उसे मेलबर्न मजिस्ट्रेट की अदालत ने विभिन्न शर्तों के अधीन जमानत दी थी। 2009 में अपराधों के लिए दोषी ठहराए जाने पर, कार्यवाही स्थगित होने के कारण उसकी जमानत बढ़ा दी गई थी। इसके बाद वह अदालत के सामने पेश होने में विफल रहा जिसके बाद काउंटी कोर्ट ने उसके खिलाफ कल्पेबल ड्राइविंग और लापरवाही से गंभीर चोट पहुंचाने के अपराधों के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था।
हालांकि, पुनीत ने कथित तौर पर 12 जून, 2009 को एक अन्य भारतीय नागरिक सुखचरणजीत सिंह के पासपोर्ट का उपयोग करके ऑस्ट्रेलिया छोड़ दिया था।
फरवरी 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने प्रत्यर्पण के लिए एक औपचारिक अनुरोध किया था। केंद्र ने तब दिल्ली कोर्ट के समक्ष पेशी वारंट जारी करने के लिए आवेदन किया था, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।
इस सवाल का जवाब देने के लिए कि क्या जिन अपराधों के लिए प्रत्यर्पण की मांग की गई थी, वे प्रत्यर्पण योग्य अपराध थे, अदालत ने ऑस्ट्रेलियाई प्रावधानों की तुलना की, जिसके तहत पुनीत पर अपराध का आरोप लगाया गया था, भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों से की।
अदालत ने पाया कि भगोड़े अपराधी ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 304ए ((लापरवाही से मौत का कारण बनना), धारा 279 (सार्वजनिक तरीके से वाहन चलाना या सवारी करना) और धारा 12 (1) (डी) के तहत प्रथम दृष्टया अपराध किए हैं।
"चूंकि, भारतीय कानून के तहत FC के खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध धारा 304 भाग- II आईपीसी, धारा 279/338 आईपीसी और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 (1) (डी) के तहत हैं, जो एक वर्ष से 10 वर्ष तक की अवधि के कारावास से दंडनीय हैं, वे संधि में परिभाषित 'प्रत्यर्पण अपराध' के मानदंडों को पूरा करते हैं।"
अदालत ने इस प्रकार प्रत्यर्पण की सिफारिश करते हुए कहा, "इस रिपोर्ट की एक प्रति विद्वान काउंसल के माध्यम से यूओआई को भेजी जाए और एक प्रति FC को निःशुल्क दी जाए। इस रिपोर्ट की प्रति भी नियमानुसार वेबसाइट पर अपलोड की जाए। एफसी को भी प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 की धारा 17(3) के तहत लिखित बयान/प्रतिवेदन दाखिल करने के उसके अधिकार के बारे में सूचित किया जा रहा है।"
शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पुनीत

