IRS अधिकारी की गिरफ्तारी के दौरान मारपीट के मामले में CBI अधिकारी दोषीं: दिल्ली कोर्ट

Shahadat

20 April 2026 9:32 AM IST

  • IRS अधिकारी की गिरफ्तारी के दौरान मारपीट के मामले में CBI अधिकारी दोषीं: दिल्ली कोर्ट

    दिल्ली कोर्ट ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) के दो अधिकारियों को 2000 में इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी की गिरफ्तारी के दौरान मारपीट, जबरन घुसने और नुकसान पहुंचाने के अपराधों के लिए दोषी ठहराया। कोर्ट ने माना कि तलाशी और गिरफ्तारी की यह कार्रवाई "बदनीयती" से और अपनी सरकारी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हुए की गई।

    तीस हज़ारी कोर्ट के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास शशांक नंदन भट्ट ने इंस्पेक्टर वी.के. पांडे और DSP रामनीश को IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 427 (नुकसान पहुंचाना) और 448 (जबरन घुसना) के तहत दोषी ठहराया।

    यह मामला 1985-बैच के IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल द्वारा दायर शिकायत से जुड़ा है। अग्रवाल ने आरोप लगाया कि 19 अक्टूबर, 2000 की सुबह CBI अधिकारी ज़बरदस्ती उनके पश्चिम विहार स्थित घर में घुस आए, उनके साथ मारपीट की और उन्हें गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार कर लिया।

    अग्रवाल ने दावा किया कि यह कार्रवाई सीनियर अधिकारियों के साथ उनके विवादों से जुड़ा एक बदले की भावना से उठाया गया कदम था। इसका मकसद सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को नाकाम करना था, जिसमें उनके निलंबन की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था।

    आरोपियों ने दलील दी कि उनकी कार्रवाई उनके सरकारी कर्तव्यों का हिस्सा थी और CrPC की धारा 197 के तहत उन्हें इसके लिए सुरक्षा प्राप्त है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि इन कार्यों का सरकारी कर्तव्य के वैध निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं था।

    कोर्ट ने कहा,

    "...चूंकि 19.10.2000 को हुई पूरी तलाशी और गिरफ्तारी की कार्रवाई आरोपियों द्वारा 'बदनीयती' से की गई और उन्होंने कानून द्वारा उन्हें दी गई शक्तियों का उल्लंघन किया, इसलिए इस कोर्ट की राय है कि आरोपियों की कार्रवाई 'सरकारी कर्तव्य के निर्वहन' के दायरे में नहीं आती है। इस प्रकार, उन्हें CrPC की धारा 197 (दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के साथ पढ़ी जाने वाली) के तहत दी गई सुरक्षा का लाभ नहीं दिया जा सकता है।"

    जज ने टिप्पणी की कि अधिकारियों ने बिना किसी उचित कारण के दरवाज़ा तोड़कर शिकायतकर्ता के घर में ज़बरदस्ती प्रवेश किया। इस मामले में आरोपियों के दावे के अनुसार, घर का दरवाज़ा तोड़ने का मुख्य कारण यह था कि गिरफ़्तारी टीम के एक सदस्य ने ज़मीन मंज़िल की खिड़कियों से देखा कि शिकायतकर्ता और उसका भाई ड्राइंग रूम में कुछ फ़ाइलें ले जा रहे थे।

    इस पर अदालत ने कहा कि IO (जांच अधिकारी), जो आरोपी नंबर 1 भी है, ने उन फ़ाइलों में से किसी को भी ज़ब्त नहीं किया; जिससे आरोपियों द्वारा बताई गई बात की पुष्टि की कोई गुंजाइश ही नहीं बची।

    अदालत ने कहा,

    "तदनुसार, इस अदालत की राय है कि 19.10.2000 को तलाशी और गिरफ़्तारी की कार्यवाही के दौरान, बिना किसी उचित कारण के शिकायतकर्ता के घर का मुख्य दरवाज़ा तोड़ने की आरोपियों की कार्रवाई 'शरारत' (Mischief) करने के बराबर है। इसके परिणामस्वरूप, अपने पेशेवर हिसाब-किताब चुकाने के लिए अपनी आधिकारिक शक्तियों का दुर्भावनापूर्ण तरीके से इस्तेमाल करने के इरादे से शिकायतकर्ता की संपत्ति में प्रवेश करने का कृत्य 'आपराधिक अतिचार' (Criminal Trespass) की परिभाषा के अंतर्गत आता है।"

    अदालत ने आगे कहा कि तलाशी और गिरफ़्तारी की कार्यवाही के समय आरोपियों द्वारा घसीटे जाने और उनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती किए जाने के कारण शिकायतकर्ता की दाहिनी बांह पर चोट लगी थी।

    जज ने कहा कि आरोपी शिकायतकर्ता के शरीर पर उक्त चोट पहुंचाने के लिए कोई भी उचित आधार साबित करने में असमर्थ रहे।

    यह मानते हुए कि आरोपियों ने एक साझा इरादे के साथ काम किया और अपनी सत्ता का दुरुपयोग किया, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने मामले को हर उचित संदेह से परे साबित किया।

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