सुप्रीम कोर्ट में हंगामा करने वाले लॉ स्टूडेंट्स को जमानत, दिल्ली कोर्ट ने कहा- अदालत की गरिमा से समझौता स्वीकार नहीं
Amir Ahmad
30 July 2026 3:47 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंगामा करने और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के आरोप में गिरफ्तार लखनऊ यूनिवर्सिटी के दो लॉ स्टूडेंट्स को दिल्ली कोर्ट ने जमानत दी। हालांकि अदालत ने उनके आचरण की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि अदालत की गरिमा और न्यायिक संस्थाओं का सम्मान बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
पटियाला हाउस कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी रवि ने 24 वर्षीय थर्ड ईयर के लॉ स्टूडेंट प्रबल प्रताप सिंह और 23 वर्षीय सेकेंड ईयर स्टूडेंट चंदर भान को जमानत देने का आदेश दिया।
27 जुलाई को पारित आदेश में अदालत ने कहा,
"कोई भी वादी, चाहे वह अपने मामले के परिणाम से कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो या बिना वकील के स्वयं पैरवी कर रहा हो, उसे अदालत में कागजात फेंकने या पीठ की अध्यक्षता कर रहे प्राधिकारी, विशेषकर चीफ जस्टिस के पद के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करने का अधिकार नहीं मिल जाता।"
अदालत ने कहा कि चीफ जस्टिस का पद ऐसी संवैधानिक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है, जो प्रत्येक नागरिक के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की अंतिम संरक्षक है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
"यदि इस तरह के आचरण को बिना टिप्पणी के छोड़ दिया जाए तो इससे यह संदेश जा सकता है कि ऐसा व्यवहार स्वीकार्य है। इसलिए यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि इस प्रकार का आचरण किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और इसकी स्पष्ट रूप से निंदा की जाती है।"
हालांकि, अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना पर संयम का परिचय दिया और आरोपियों के खिलाफ अलग से कोई कार्रवाई करने की इच्छा नहीं जताई।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संस्था किसी एक उत्तेजित और बिना वकील वाले वादी के अनुचित व्यवहार से कमजोर नहीं होती। इसलिए जमानत पर विचार करते समय निचली अदालतों को भी वही संस्थागत संयम अपनाना चाहिए, जिसका परिचय सर्वोच्च अदालत ने दिया।
अदालत ने पाया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। घटनास्थल का निरीक्षण किया जा चुका है, संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं और आवश्यक दस्तावेज भी जब्त किए जा चुके हैं। ऐसे में आगे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने कहा कि अभियोजन यह दिखाने में विफल रहा है कि दोनों आरोपियों की आगे किसी जांच के लिए जरूरत है।
साथ ही अदालत ने कहा,
"अभद्र भाषा का प्रयोग निंदनीय हो सकता है लेकिन केवल इसी आधार पर ऐसे अपराधों को, जो सामान्यतः जघन्य श्रेणी में नहीं आते अनिश्चितकाल तक विचाराधीन कैद का आधार नहीं बनाया जा सकता।"
दिल्ली पुलिस के अनुसार यह मामला 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान हुई घटना से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा शाखा की शिकायत पर तिलक मार्ग थाने में FIR दर्ज की गई थी।
आरोप है कि प्रबल प्रताप सिंह, जो स्वयं अपने मामले में पक्षकार के रूप में पेश हुए, ने सुनवाई के दौरान जजों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, अदालत कक्ष में अपनी केस फाइलें फेंकी और हंगामा किया। पुलिस का यह भी आरोप है कि उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे सुरक्षा कर्मियों के काम में भी उन्होंने बाधा डाली।
यह घटना इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल 2026 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान हुई। घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से वायरल हुआ।


