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कोर्ट के समक्ष ट्रांजिट वारंट के माध्यम से गिरफ्तार अभियुक्त की पेशी में देरी अनुच्छेद 21 के तहत उसकी मौलिक अधिकार का उल्लंघन है: मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
9 Jan 2021 9:16 AM GMT
कोर्ट के समक्ष ट्रांजिट वारंट के माध्यम से गिरफ्तार अभियुक्त की पेशी में देरी अनुच्छेद 21 के तहत उसकी मौलिक अधिकार का उल्लंघन है: मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांजिट वारंट पर गिरफ्तार किए गए अभियुक्त की कोर्ट के समक्ष पेशी होने में देरी, उस अभियुक्त के मौलिक अधिकार का हनन है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसे स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है।

इस मामले में अभियुक्त औपचारिक रूप से एक पी.टी. के माध्यम से गिरफ्तार किया गया था। उसे देरी से मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने वारंट के माध्यम से पेश किया गया था। लेकिन मजिस्ट्रेट ने इस पर यानी देरी से पेशी की बात पर ध्यान नहीं दिया और मजिस्ट्रेट के सामने जिस तारीख को पेश किया गया, उसे ही उसने सही माना। इसके खिलाफ अभियुक्त ने हाईकोर्ट में याचिका डाली। दायर याचिका में उच्च न्यायालय द्वारा विचार किया गया मुद्दा यह था कि क्या पुलिस द्वारा आरोपी को अदालत के समक्ष पेश करने में देरी के कारण उसे औपचारिक रूप से पी.टी. वारंट के आधार पर न्यायालय द्वारा पारित रिमांड आदेश को रद्द कर दिया जाएगा?

अदालत ने कहा कि,

पी.टी. वारंट केवल जेल में बंद या हिरासत में रखे गए व्यक्ति की पेशी को कानूनन आदेश के माध्यम से निर्देशित करने के लिए है। इस तरह के वारंट का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता है कि पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्वतंत्रता को कम किया जाए। जब तक वह संबंधित न्यायालय के समक्ष पेश नहीं हो जाता, तब तक पुलिस को कानून के मुताबिक चलना होगा।

न्यायमूर्ति एन.आनंद वेंकटेश ने कहा कि,

"जहां जांच अधिकारी औपचारिक गिरफ्तारी के माध्यम से धारा 607 के तहत परिकल्पना के अंतर्गत 60 दिनों या 90 दिनों की अवधि की गणना करते हुए आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का फैसला करता है लेकिन आरोपी व्यक्ति पुलिस की शारीरिक हिरासत में नहीं आएगा क्योंकि C.R.P. C(2) के अनुसार केवल मजिस्ट्रेट के आदेशों की हिरासत वाली तारीख से देखा जायगा न कि पुलिस द्वारा औपचारिक गिरफ्तारी की तारीख से देखा जाएगा।"

"एक पी.टी. वारंट का उपयोग किसी व्यक्ति को संबंधित न्यायालय के समक्ष पेश किए बिना हिरासत में रखने के उद्देश्य से नहीं किया जा सकता है और इस तरह की हिरासत निश्चित रूप से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करेगी। यदि किसी आरोपी व्यक्ति को न्यायिक अभिरक्षा में रखा गया है और उसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है, तो संबंधित मामले में आरोपी व्यक्ति की हिरासत की गणना उसके रिमांड की तारीख और उससे पहले की अवधि से की जाएगी। अगर वह पी.टी. वारंट के बल पर नजरबंद रखा गया है तो इस वारंट पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। इस प्रथा को इस न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया है और इस तरह के आदेश से आरोपी व्यक्ति की एक गिरफ्तारी के बाद औपचारिक गिरफ्तारी में देरी होती है. वारंट, निश्चित रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है. "

अदालत ने पुलिस की भी आलोचना की। कहा कि पुलिस ने गलत तरीका अपनाकर याचिकाकर्ता के अधिकारों का हनन किया है। और इस तरह याचिकाकर्ता की स्वतंत्रता का सीधे तौर पर उल्लंघन हुआ।

पीठ ने आगे कहा कि,

यह प्रथा पुलिस द्वारा तुरंत बंद कर दी जानी चाहिए और यहां तक कि ऐसे मामले में जहां कोई व्यक्ति गंभीर अपराधों में शामिल है, सही प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक अपनाया जाना चाहिए। दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रदान की गई प्रक्रिया दोनों हल्के अपराधों और गंभीर अपराधों के लिए है और इसलिए अपराध की प्रकृति के अनुसार पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह सही प्रक्रिया का पालन करने में विफल न हो। अगर विफल होती है तो यह मौलिक उल्लंघन होगा। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सही गारंटी प्रदान की गई है। पीठ ने कुछ शर्त पर आरोपी को जमानत देने का काम किया।

केस: एम.किशोर बनाम पुलिस इंस्पेक्टर [Crl.O.P.Nos.18040 And 2020 of 14411]

कोरम: जस्टिस एन.आनंद वेंकटेश

काउंसिल: अधिवक्ता एस. सुरियकला, बी.त्यागराजन, सरकारी सलाहकार सी.राघवन

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