COVID​​-19 मानदंडों के उल्लंघन का मामला| इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई

  • COVID​​-19 मानदंडों के उल्लंघन का मामला| इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) प्रमुख और राज्यसभा सदस्य जयंत चौधरी के खिलाफ एमपी/एमएलए कोर्ट, गौतमबुद्ध नगर में 2022 में आदर्श आचार संहिता और COVID-19 मानदंडों का उल्लंघन के मामले में लंबित आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी।

    जस्टिस राजबीर सिंह की पीठ ने आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाते हुए राज्य के वकील को 4 सप्ताह के भीतर मामले में जवाब दाखिल करने का भी निर्देश दिया और मामले में अगली सुनवाई के लिए 3 फरवरी, 2024 की तारीख तय की।

    यादव और चौधरी के खिलाफ आरोप इस आशय के हैं कि वे 3 फरवरी, 2022 को 300-400 अज्ञात व्यक्तियों के साथ लुहारली गेट, गौतमबुद्धनगर से नोएडा की ओर यात्रा कर रहे थे, जब सह-अभियुक्तों ने उनका स्वागत किया। व्यक्तियों और उस प्रक्रिया के दौरान, एक बड़ी सभा इकट्ठी हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप COVID-19 के दिशानिर्देशों का उल्लंघन हुआ था।

    आगे आरोप है कि उस समय सीआरपीसी की धारा 144 के साथ-साथ आदर्श आचार संहिता भी लागू थी और रात 10 बजे से सुबह 8 बजे तक प्रचार-प्रसार पर रोक थी। इस तरह से उद्घोषणा की गई। सीआरपीसी की धारा 144 के तहत COVID-19 दिशानिर्देशों के साथ-साथ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया गया।

    यादव और चौधरी पर आईपीसी की धारा 188, 269, 270 और महामारी रोग अधिनियम की धारा-3/4 के तहत मामला दर्ज किया गया और दोनों को स्थानीय अदालत ने तलब किया। समन आदेश के साथ-साथ संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए वर्तमान याचिका दायर की गई।

    एचसी के समक्ष यादव के वकील ने प्रस्तुत किया कि आवेदक ने जिला प्रशासन को पूर्व सूचना के बाद चुनाव अभियान के संबंध में जिला-गौतमबुद्ध नगर के क्षेत्र का दौरा किया था। इसलिए यह सार्वजनिक सभा का प्रबंधन करना जिला प्रशासन और पुलिस का कर्तव्य और जिम्मेदारी थी।

    आगे यह तर्क दिया गया कि जिस वाहन (रथ) में आवेदक यात्रा कर रहा था, उसमें केवल पांच सीटें थीं और आवेदक COVID​​-19 महामारी या किसी अन्य संक्रामक बीमारी से पीड़ित नहीं था। इस प्रकार, यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने COVID​​-19 के किसी भी दिशानिर्देश का उल्लंघन किया, या संक्रमण फैलाने के लिए कोई लापरवाही भरा कार्य किया। इस प्रकार आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता।

    दूसरी ओर, राज्य के वकील द्वारा यह तर्क दिया गया कि आवेदक मुकदमे के दौरान अपना बचाव पक्ष पेश कर सकता है, लेकिन इस स्तर पर रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उसके खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है।

    इन दलीलों की पृष्ठभूमि में और मामले के तथ्यों, पक्षकारों के वकीलों की दलीलों पर विचार करते हुए न्यायालय का मानना था कि इस मामले पर गुण-दोष के आधार पर विचार और सुनवाई की आवश्यकता है।

    नतीजतन, अदालत ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि लिस्टिंग की अगली तारीख तक आवेदक के संबंध में कार्यवाही पर रोक रहेगी।

    अपीयरेंस- आवेदक के वकील: इमरान उल्लाह, मोहम्मद खालिद, विनीत विक्रम और प्रतिवादी के वकील: जी.ए

    केस टाइटल-अखिलेश यादव बनाम यूपी राज्य और अन्य

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