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शैक्षणिक नियुक्तियों में अपने विचारों को थोपने में अदालतों को "बेहद अनिच्छुक" होना चाहिए: उड़ीसा हाईकोर्ट

Avanish Pathak
5 Aug 2022 7:44 AM GMT
शैक्षणिक नियुक्तियों में अपने विचारों को थोपने में अदालतों को बेहद अनिच्छुक होना चाहिए: उड़ीसा हाईकोर्ट
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उड़ीसा हाईकोर्ट ने दोहराया है कि शिक्षा के क्षेत्र में नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले नियमों या कानूनों की उपेक्षा करते हुए न्यायालयों को अपने स्वयं के विचारों को थोपने में अत्यधिक अनिच्छुक होना चाहिए। एक याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए, जिसमें 'चांस सर्ट‌िफिकेट' की कमी के कारण उम्मीदवारी से इनकार करने के खिलाफ अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई थी।

ज‌‌स्टिस डॉ संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने कहा,

"मौजूदा मामले में, मौका प्रमाण पत्र की आवश्यकता को नोटिस संख्या 225 / निदेशक, VIMSAR, बुर्ला 19.04.2022 के साथ-साथ 20.05.2022 को जारी एक रिमाइंटर वेबसाइट नोटिस के जर‌िए जारी विज्ञापन में बहुत स्पष्ट रूप से बताया गया था, यानि मूल दस्तावेज सत्यापन की तारीख से पांच दिन पहले। इसलिए, यह याचिकाकर्ताओं के लापरवाह रवैये को दर्शाता है। इसके अलावा, मौका प्रमाण पत्र को एक अप्रासंगिक दस्तावेज के रूप में नहीं माना जा सकता है, यह देखते हुए कि इससे नेगेटिव मार्किंग जुड़ी हुई है। इसलिए, एक व्यक्ति के अंकों पर इसके प्रभाव के बावजूद , इसे एक आवश्यक दस्तावेज के रूप में माना जाना चाहिए, जिसे उम्मीदवारी हासिल करने के लिए सत्यापित किया जाना चाहिए।"

मामला

प्रतिवादी-विश्वविद्यालय ने 19.4.2022 को विभिन्न विषयों के लिए संविदा/प्रतिनियुक्ति के आधार पर एसिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन जारी किया। एनेस्थिसियोलॉजी विभाग में दो रिक्तियों का विज्ञापन किया गया। उक्त नोटिस में, योग्यता मानदंड एमडी या समकक्ष डिग्री था, लेकिन योग्यता मूल्यांकन के उद्देश्य के लिए केवल मैट्रिक, इंटरमीडिएट और एमबीबीएस परीक्षाओं में प्राप्त अंक को वेटेज दिया गया था। एक दस्तावेज, जिसे पेश करना आवश्यक था वह एमबीबीएस / एमडी / एमडीएस / डीएनबी / एमएससी (मेडिकल) परीक्षा का 'मौका प्रमाण पत्र' था।

याचिकाकर्ताओं ने उक्त विज्ञापन के खिलाफ आवेदन किया था और उन्हें दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाया गया था। दस्तावेज सत्यापन के दरमियान प्रतिवादी की ओर से कोई कमी नहीं बताई गई। 22.6.2022 को एक अनंतिम चयन सूची प्रकाशित की गई थी जिसमें याचिकाकर्ताओं को योग्यता के मामले में तीसरी (एनेस्थिसियोलॉजी) और 8 वीं (पैथोलॉजी) रैंक पर दिखाया गया, लेकिन एमडी चांस सर्टिफिकेट जमा न करने के आधार पर खारिज कर दिया गया था। इससे क्षुब्ध होकर याचिकाकर्ताओं ने यह रिट याचिका दायर की है।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील सुश्री पामी रथ ने प्रस्तुत किया कि 'मौका प्रमाण पत्र' केवल एक परीक्षा को पास करने के लिए एक व्यक्ति द्वारा किए गए प्रयासों की संख्या को दर्शाता है। यह नकारात्मक अंकन के उद्देश्य से आवश्यक है यानि उक्त परीक्षा को पास करने के लिए लिए गए प्रत्येक अवसर के लिए एक अंक की कटौती। चूंकि याचिकाकर्ताओं ने अपने पहले प्रयास में परीक्षा पास कर ली थी, इसलिए उन्हें किसी मौका प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं थी। इसके अलावा, उसने तर्क दिया, याचिकाकर्ताओं के पास प्रमाण पत्र में यह भी कहा गया है कि उन्होंने 2018 में नियमित उम्मीदवार के रूप में परीक्षा पूरी की थी। इस प्रकार, मौका प्रमाण पत्र द्वारा दी जाने वाली जानकारी स्वाभाविक रूप से 'पास प्रमाण पत्र' के रूप में रिकॉर्ड में थी। इसके अलावा, यह प्रस्तुत किया गया था कि याचिकाकर्ताओं के एमडी परीक्षा से संबंधित मौका प्रमाण पत्र जमा न करने से उनकी योग्यता मूल्यांकन प्रभावित नहीं होता है। इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्हें चयन से बाहर नहीं किया जाना चाहिए था।

प्रतिवादियों की दलीलें

विरोधी पक्ष की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सरकारी एडवोकेट श्री डी मुंड ने प्रस्तुत किया कि विज्ञापन के खंड 6.2 के अनुसार, एमडी/एमएस/डीएनबी/ एमएससी (मेडिकल) परीक्षा सहित परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए किए गए प्रत्येक अतिरिक्त प्रयास के लिए कुल कैरियर अंक से एक अंक काटा जाएगा। इसी तरह, विज्ञापन के खंड 8 में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की एक सूची प्रदान की गई है और खंड 8 (vii) के अनुसार आवश्यक दस्तावेजों में से एक एमबीबीएस / एमडी / एमएस / एमडीएस / डीएनबी / एमएससी (मेडिकल) परीक्षा का 'मौका प्रमाण पत्र' है। .

उन्होंने आगे प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ताओं ने 19.04.2022 को विज्ञापन के प्रकाशन की तारीख से 25.05.2022 को मूल दस्तावेज सत्यापन की तारीख तक एक महीने से अधिक की लंबी अवधि में अपने मूल एमडी मौका प्रमाण पत्र प्राप्त करने में ध्यान नहीं दिया। वेबसाइट पर दो रिमाइंडर एक 13.05.2022 को और दूसरा 20.05.2022 को दिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर अदालत को इस तथ्य को दबा दिया था कि उन्हें 20.05.2022 को एक ‌रिमाइंडर नोटिस दिया गया था कि 25.05.2022 को सभी आवश्यक मूल दस्तावेज पेश करें।

न्यायालय की टिप्पणियां

न्यायालय ने कहा हाईकोर्ट का एक सतत दृष्टिकोण रहा है कि विधियों द्वारा शासित शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के मामले में प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को अनिवार्य माना जाता है। वर्तमान मामले में विज्ञापन के खंड 8 में जमा करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की एक सूची प्रदान की गई है और क्लॉज 8 (vii) के अनुसार आवश्यक दस्तावेजों में से एक एमबीबीएस/एमडी/एमएस/एमडीएस/डीएनबी/एमएससी (मेडिकल) परीक्षा का मौका प्रमाण पत्र है। इसलिए, फॉर्म जमा करने के साथ-साथ दस्तावेजों के सत्यापन के समय भी दस्तावेज जमा करना आवश्यक था।

इसने आगे प्रकाश डाला कि उक्त मेडिकल कॉलेज ने सत्यापन के समय दस्तावेज (यदि कोई हो) दिखाने का अवसर दिया था, जिसे उम्मीदवारों ने आवेदन पत्र के साथ जमा नहीं किया होगा। इतनी छूट के बाद भी याचिकाकर्ताओं ने सत्यापन के समय मौका प्रमाण पत्र लाने की जहमत नहीं उठाई।

कोर्ट ने तब महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी एजुकेशन और अन्य बनाम पारितोष भूपेश कुमार सेठ और अन्य पर भरोसा किया जिसमें यह आयोजित किया गया था,

".. शैक्षिक मामलों में बुद्धिमत्तापूर्ण, विवेकपूर्ण और उचित क्या है, इस संबंध में शिक्षण संस्थानों और उन्हें नियंत्रित करने वाले विभागों के वास्तविक दिन-प्रतिदिन के कामकाज का समृद्ध अनुभव और तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवरों के विचारों पर न्यायालय को अपने स्वयं के विचारों को प्रतिस्थापित करने के लिए बेहद अनिच्छुक होना चाहिए।"

इसके अलावा कोर्ट विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बनाम नेहा अनिल बोबडे पर निर्भर रहा, जिसमें यह माना गया कि शैक्षणिक मामलों में, जब तक कि वैधानिक प्रावधानों, विनियमों या जारी अधिसूचना का स्पष्ट उल्लंघन नहीं होता है, अदालतें अपना हाथ बंद रखेंगी।

ऐसे में कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

केस टाइटल: डॉ सत्य नारायण भुजबल और बनाम वीर सुरेंद्र साई आयुर्विज्ञान और अनुसंधान संस्थान, बुर्ला और अन्य।

केस नंबर: W.P.(C) No. 16290 of 2022 और जुड़े मामले

साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (ओरि) 118


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