Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

'अदालतों को डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए और मरने से पहले अधिकारों को बचाना चाहिए': दिल्ली ‌हाईकोर्ट ने 2008 के सीरियल ब्लास्ट मामले में 12 साल से कैद विचाराधीन को जमानत दी

LiveLaw News Network
6 Oct 2021 1:02 PM GMT
अदालतों को डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए और मरने से पहले अधिकारों को बचाना चाहिए: दिल्ली ‌हाईकोर्ट ने 2008 के सीरियल ब्लास्ट मामले में 12 साल से कैद विचाराधीन को जमानत दी
x

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2008 के सिलसिलेवार विस्फोटों के मामले में 12 साल से अधिक समय से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद एक व्यक्ति को जमानत दी। कोर्ट ने कहा कि अदालतों को डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए और संवैधानिक अधिकारों को मृत्यु से बचाना चाहिए।

जस्टिस अनूप जे भंभानी और जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल ने कहा,

"अदालतों को मृत्यु समीक्षक की भूमिका अदा नहीं करनी चाहिए और कानूनी या संवैधानिक अधिकारों की तभी सुनवाई नहीं करनी चाहिए, जब वे "मृत" हो जाएं। इसके बजाय हमें डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए, और ऐसे अधिकारों को मृत्यु से पहले उन्हें बचाना चाहिए। अदालतों को इस प्रकार के अधिकारों को खत्‍म करने और दफन होने से बचाने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाना चाहिए। "

कोर्ट ने फरवरी 2009 से हिरासत में रखे गए मोहम्‍मद हााकिम को जमानत देते हुए उक्‍त टिप्प‌ण‌ियां कीं। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पटियाला हाउस कोर्ट ने 20.03.2021 दिए आदेश में हााकिम की जमानत खार‌िज़ कर दी थी।

हााकिम पर पर आरोप था कि वह लखनऊ से दिल्ली तक निश्चित मात्रा में साइकिल बॉल बेयरिंग ले गया था, जिनका कथित तौर पर इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। 2008 में दिल्ली में हुए बम विस्फोटों में उनका इस्तेमाल हुआ था।

अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि हाकिम ने एक विचाराधीन कैदी के रूप में 12 साल से अधिक समय तक हिरासत में बिताया है और इन वर्षों में 256 गवाहों से पूछताछ की गई थी, जबकि 60 अभियोजन गवाहों की जांच अभी भी बाकी है।

यूएपीए पर कई फैसलों पर जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा,

"इसके बाद मुकदमे में कितना भी समय लगे, अपीलकर्ता को एक विचाराधीन कैदी के रूप में 12 साल से अधिक की कैद का सामना करना पड़ा, निश्चित रूप से सिस्टम के लिए यह स्वीकार करने के लिए एक लंबी पर्याप्त अवधि के रूप में योग्य होगा कि अपीलकर्ता के त्वरित परीक्षण के अधिकार को पराजित किया जा रहा है।"

राज्य के निवेदन पर कि चूंकि हाकीम पर यूएपीए की धारा 16 तहत अपराध का आरोप लगाया गया है, अदालत को इस धारणा पर आगे बढ़ना चाहिए कि उसे मौत की सजा दी जा सकती है। बेंच ने कहा कि उक्त सबमिशन विशुद्ध रूप से एक धारणा है।

महत्वपूर्ण रूप से कोर्ट ने कहा,

"दो विपरीत धारणाएं हैं: पहला, अगर अपीलकर्ता को बरी कर दिया जाता है तो क्या होगा। बरी होने की स्थिति में, राज्य अपीलकर्ता को उसके जीवन के सबसे अधिक उत्पादक और आवश्यक दशक बर्बाद की क्षतिपूर्ति कैसे करेगा? दूसरा, यह मानते हुए कि अपीलकर्ता को अंततः दोषी ठहराया गया हो, लेकिन उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई हो, राज्य उसे धारा 436ए सीआरपीसी सहपठित धारा 57 आईपीसी के तहत जमानत के अधिकार को नकारने के लिए कैसे मुआवजा देगा। हमें यकीन है कि राज्य ने इन विपरीत धारणाओं पर विचार नहीं किया है।"

यह देखते हुए कि हााकिम ने अपने जीवन के एक दशक से अधिक समय तक एक कथित अपराध के लिए सजा भुगत ली है, जिसके लिए उसे अभी तक दोषी नहीं पाया गया है, अदालत ने कहा कि उसने एक मामला बना दिया है कि उसके त्वरित परीक्षण के अधिकार को पराजित किया जा रहा था और अगर उसे जमानत नहीं दी गई तो उसका उल्लंघन जारी रहेगा।

शीर्षक: मो. हाकिम बनाम राज्य

आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story