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"न्यायालय वादियों की सुविधा के लिए हैं, अधिवक्ताओं की नहीं" : बॉम्बे हाईकोर्ट ने वाई में कोर्ट स्थापित करने के खिलाफ दायर बार एसोसिएशन की याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
30 March 2022 3:45 PM GMT
न्यायालय वादियों की सुविधा के लिए हैं, अधिवक्ताओं की नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट ने वाई में कोर्ट स्थापित करने के खिलाफ दायर बार एसोसिएशन की याचिका  खारिज की
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के वाई शहर में एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत और एक सिविल जज की अदालत स्थापित करने के फैसले(हाईकोर्ट द्वारा) का विरोध करते हुए सतारा जिला बार एसोसिएशन की तरफ से दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है। एसोसिएशन ने कहा था कि इस फैसले से न्यायिक अधिकारियों, कर्मचारियों और वादियों को काफी परेशानी होगी।

रिट याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस जी.एस.पटेल और जस्टिस माधव जे जामदार की बेंच ने कहा,

''इस याचिका के साथ वास्तविक कठिनाई यह है कि इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि याचिकाकर्ता किस कानूनी अधिकार का दावा करते हुए यह कह रहा है कि इस हाईकोर्ट को वाई में एक न्यायालय स्थापित करने पर विचार नहीं करना चाहिए। ऐसा लगता है कि यह पूरी तरह से स्वयंभू है...हम इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि न्याय के प्रशासन में बार की भूमिका होती है। हालांकि हम जोर देकर कहते हैं कि वादियों का हित सर्वाेपरि होता है और न्यायालय और इसके कामकाज को सक्षम बनाने में अपनी भूमिका निभाने वाले, चाहे न्यायाधीश हो या वकील, केवल वादी को न्याय दिलाने में सहायता करने के लिए होते हैं।''

इस संबंध में, कोर्ट ने अहमद एम आब्दी बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य, 2019 एससीसी ऑनलाइन बीओएम 89 मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर ध्यान दिया, जिसमें यह माना गया था कि,''न्याय का उपभोक्ता वादी है और इसलिए, नए हाईकोर्ट परिसर के लिए आवंटित किए जाने वाले एक भूखंड का चयन करते समय अधिकांश वादियों की सुविधा एक प्रमुख और प्राथमिक विचार होना चाहिए। अधिकांश वादी दूर-दराज के जिलों से आते हैं। यदि नया हाईकोर्ट परिसर ऐसी जगह पर स्थापित किया जाता है जो अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में आने वाले वादियों के लिए सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से आसानी से सुलभ नहीं है तो यह न्याय तक पहुंच के उनके मौलिक अधिकार को प्रभावित करेगा।''

उपरोक्त अवलोकन पर विचार करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि उक्त मामले में भी वादियों की आसान पहुंच के सवाल पर विचार किया गया था और, न्यायालय ने 'अधिवक्ताओं की सुविधा' पर विचार करना आवश्यक नहीं समझा।

हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ की स्थापना से संबंधित महाराष्ट्र राज्य बनाम नारायण शामराव पुराणिक व अन्य, (1982) 3 एससीसी 519 के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें यह दोहराया गया था कि ''न्यायालय वादियों की सुविधा के लिए हैं।''

याचिकाकर्ता-एसोसिएशन ने तर्क दिया था कि हाईकोर्ट ने केवल वाई में लंबित मामलों की संख्या पर विचार किया और वाई में एक अदालत स्थापित करने के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इमारतों, बुनियादी ढांचे, दूरी, परिवहन और वादियों की सुविधा जैसे अन्य मानदंडों की अनदेखी की है।

इस तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा,

''यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने वाई में न्यायिक अधिकारियों के लिए आवास की पर्याप्तता जैसे अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा है और इस संबंध में संतुष्ट होने पर कि ये सभी संभावनाएं है,कोर्ट ने अपना प्रस्ताव तैयार किया था। इसलिए, यह कहना कि हाईकोर्ट ने लंबित मामलों के अलावा किसी अन्य कारक पर ध्यान नहीं दिया, तथ्यात्मक रूप से गलत है और रिकॉर्ड पर भी गलत साबित होता है।''

कोर्ट ने याचिकाकर्ता-एसोसिएशन द्वारा नक्सली आवाजाही, संचार में कठिनाई आदि के बारे में दिए गए कथन पर भी ध्यान दिया और कहा कि इन अन्य कारकों में से कोई भी प्रतिकूल कारक नहीं है। ''हम इसका काफी अतिशयोक्ति के रूप में खंडन करेंगे।''

इसके बाद, याचिकाकर्ता-संघ ने तर्क दिया था कि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की पूरी तरह से अनदेखी की है और उसे राज्य सरकार से परामर्श करना चाहिए था। यदि न्यायालय का दृष्टिकोण निर्णायक था, तो भी पहले राज्य सरकार से परामर्श किया जाना चाहिए था।

इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि,

''ऐसा कोई कठोर और तय नियम नहीं है। अपने प्रशासनिक पक्ष में हाईकोर्ट मुख्य रूप से न्याय के प्रशासन के लिए अपने व्यापक संभव अर्थों में चिंतित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हाईकोर्ट पहले एक प्रस्ताव तैयार करता है और फिर इसे राय के लिए सरकार के सामने रखता है या प्रस्ताव सरकार की तरफ से आता है। यह स्पष्ट है कि न तो हाईकोर्ट और न ही राज्य सरकार एक-दूसरे की भागीदारी के बिना अपने दम पर न्यायालयों की स्थापना कर सकते हैं। इस संबंध में बस इतना ही कहने की जरूरत है। किसी भी मामले में हाईकोर्ट के विचार को प्राथमिकता दी जाती है।''

पार्टुर एडवोकेट बार एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2016(4) एमएच.एलजे 498 मामले में दिए गए फैसले का भी संदर्भ दिया गया।

अंत में, हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और कहा,

''इसके दो महत्वपूर्ण पहलू हैं-जल्दी और समय पर न्याय देना और न्याय के लिए भौतिक पहुंच। निकटता में एक न्यायालय की स्थापना वास्तव में उन वादियों के लिए अवांछनीय बात नहीं कही जा सकती है जो प्रस्तावित न्यायालय के आसपास के क्षेत्र में रहते हैं। ऐसा कोई कारण नहीं है कि जिसके चलते याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर किसी वादी को वाई में एक न्यायालय में जाने की बजाय वाई से सतारा तक 35 किलोमीटर ; या खंडाला से वाई तक 27 किलोमीटर के बजाय खंडाला से सतारा तक 55 किलोमीटर या महाबलेश्वर से वाई तक 33 किलोमीटर के बजाय महाबलेश्वर से सतारा तक 60 किलोमीटर की यात्रा करने की आवश्यकता हो।''

केस का शीर्षक-सतारा जिला बार एसोसिएशन, सतारा बनाम महाराष्ट्र राज्य

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