स्वतंत्र भारद्वाज को अंतरिम ज़मानत देते हुए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच में कमियां बताईं, मीडिया में केस पर बात करने पर रोक

Shahadat

15 Sept 2026 7:30 PM IST

  • स्वतंत्र भारद्वाज को अंतरिम ज़मानत देते हुए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच में कमियां बताईं, मीडिया में केस पर बात करने पर रोक

    दिल्ली कोर्ट ने स्वतंत्र भारद्वाज को तीन हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत देते हुए उसे सोशल मीडिया पर केस से जुड़ी कोई भी चीज़ पोस्ट या शेयर करने से रोक दिया, जिसमें उनके बचाव में कही गई बातें भी शामिल हैं।

    भारद्वाज पर जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की टीनएजर एक्टिविस्ट के पिता के साथ कथित मारपीट का आरोप है।

    भारद्वाज को अंतरिम राहत देते हुए पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज सौरभ प्रताप सिंह लालर ने दिल्ली पुलिस की जांच में कमियों और खामियों की ओर इशारा किया और संबंधित जांच अधिकारी (IO) से इन मुद्दों पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।

    विस्तृत आदेश में जज ने कहा कि डिजिटल युग में पीड़ित को डराने-धमकाने के लिए शारीरिक रूप से पास होना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर कथित मारपीट के बारे में सार्वजनिक बयान और डींगें ज़्यादा लोगों तक और लंबे समय तक पीड़ितों और गवाहों तक पहुँच सकती हैं।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतरिम ज़मानत की अवधि के दौरान भारद्वाज किसी भी सार्वजनिक मंच पर केस, अपने बचाव, या शिकायतकर्ता और उसेके परिवार से संबंधित कोई भी बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट न तो बनाएगा, न प्रकाशित करेगा, न अपलोड करेगा और न ही शेयर करेगा।

    कोर्ट ने अब उनकी रेगुलर ज़मानत की अर्ज़ी पर 6 अक्टूबर को सुनवाई तय की है, जिसमें रेगुलर ज़मानत देने या खारिज करने या अंतरिम ज़मानत बढ़ाने पर विचार किया जाएगा।

    यह FIR पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 126(2) और 351(3) के साथ धारा 3(5) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता 23 जून को अपनी बेटी और एक दोस्त के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जंतर-मंतर गए। कथित तौर पर तब बहस हुई जब एक व्यक्ति ने शिकायतकर्ता के वीडियो रिकॉर्ड करने पर आपत्ति जताई।

    अभियोजन पक्ष का आरोप है कि भारद्वाज और उनके साथियों ने शिकायतकर्ता को घेर लिया और घूंसे तथा कड़े जैसी कठोर चीज़ से उन पर हमला किया। शिकायतकर्ता के सिर पर दो गहरे घाव हुए। शुरुआत में BNS की धाराओं 115(2) और 126(2) के तहत ज़मानत-योग्य अपराधों के लिए FIR दर्ज की गई। उस समय भारद्वाज को गिरफ़्तार नहीं किया गया था और वह BNSS की धारा 35(3) के तहत मिले नोटिस के बाद जांच में शामिल हुआ।

    हालांकि, 4 सितंबर को शिकायतकर्ता ने अतिरिक्त बयान दिया, जिसमें दावा किया गया कि वह अनुसूचित जाति (SC) से है और आरोप लगाया कि उसके और उसकी नाबालिग बेटी के ख़िलाफ़ जाति-आधारित अपमानजनक टिप्पणी की गई। इसके बाद SC/ST Act और BNS की धारा 351(3) के प्रावधान जोड़े गए। इसके बाद भारद्वाज को गिरफ़्तार कर लिया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

    दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री और एक पॉडकास्ट का सहारा लिया, जिसमें भारद्वाज ने कथित तौर पर घटना के बारे में बात की थी।

    मंगलवार को उसे अंतरिम ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसके लिए सबसे अहम बात घटना के बाद आरोपी का कथित व्यवहार है।

    कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया "डराने-धमकाने का एक नया ज़रिया" बन गया है, लेकिन यह भी साफ़ किया कि शिकायतकर्ता और उसकी नाबालिग बेटी को कई नंबरों से भेजे गए कथित तौर पर गाली-गलौज वाले और यौन रूप से अश्लील संदेशों का संबंध, कोर्ट के सामने मौजूद सामग्री के आधार पर, भारद्वाज से नहीं जोड़ा जा सका।

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसे संदेश दिखाते हैं कि कैसे किसी लंबित मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी पीड़ित और उसके परिवार के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा कर सकती है।

    कोर्ट ने आगे कहा कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी असीमित नहीं है और उस पर कुछ पाबंदियां लागू होती हैं। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक मंचों का इस्तेमाल "पीड़ित को डराने-धमकाने या जनता के सामने लंबित मामले की सुनवाई करने" के लिए किया जाए।

    जज ने कहा,

    “आवेदक को इस मामले से जुड़ी बातों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने से रोकने वाली शर्त का सीधा संबंध पीड़ित की सुरक्षा और कार्यवाही की निष्पक्षता से है। यह उस मकसद के हिसाब से सही है और यह कानूनी अभिव्यक्ति पर कोई सामान्य रोक नहीं है।”

    SC/ST Act के तहत लगे आरोपों पर कोर्ट ने गौर किया कि मूल FIR में जाति-आधारित दुर्व्यवहार का कोई आरोप नहीं थहै हालांकि शिकायतकर्ता ने बाद में घटना की शुरुआत में ऐसी बातें कहे जाने का आरोप लगाया।

    कोर्ट ने ध्यान दिया कि यह आरोप घटना के लगभग दस सप्ताह बाद पहली बार सामने आया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि देर से लगाया गया आरोप ज़रूरी नहीं कि झूठा ही हो।

    कोर्ट ने कहा,

    “सिर्फ़ इसलिए कि आरोप देर से लगाया गया, वह झूठा नहीं हो जाता; और न ही यह कोर्ट शुरुआती दौर में ही उसकी सच्चाई तय कर सकती है। फिर भी यह ऐसी स्थिति है, जो ज़मानत के सीमित मकसद के लिए आरोप को कितना महत्व दिया जाए, इस पर असर डालती है।”

    जज ने कहा कि सहयोग न करने के जो उदाहरण बताए गए, उनमें केवल भारद्वाज के मोबाइल फ़ोन और उसके साथियों की जानकारी न देना शामिल है। ऐसी बातों को उन्हें जांच में शामिल होने और सहयोग करने की शर्त लगाकर ठीक से निपटाया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “रिकॉर्ड में जिस एक आशंका को बल मिलता है, वह यह है कि शिकायतकर्ता और गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है। यह जोखिम शारीरिक रूप से संपर्क करने से नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंचों के इस्तेमाल से पैदा होता है। यह एक वास्तविक चिंता है, लेकिन इसे सख्त, खास तौर पर तय की गई शर्तों और निगरानी की अवधि के ज़रिए हल किया जा सकता है। इसके लिए विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने की ज़रूरत नहीं है।”

    कोर्ट ने सोशल मीडिया पर भारद्वाज के व्यवहार पर भी ध्यान दिया और हत्या के मामले में ज़मानत मिलने के बाद कथित तौर पर जश्न मनाने वाले आरोपी से जुड़ी 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की हालिया खबर का ज़िक्र किया।

    कोर्ट ने कहा कि इस तरह का सार्वजनिक प्रदर्शन, चाहे सड़क पर हो या सोशल मीडिया पर, “समाज या कानून-व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है” और इससे न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा कम होता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “ज़मानत कोर्ट के भरोसे का प्रतीक है और यह दिखाने के लिए कोई ट्रॉफी नहीं है।”

    जांच में कमियों और खामियों की ओर इशारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने ज़मानत का विरोध करने के लिए जिस पॉडकास्ट का हवाला दिया, वह बहुत अहम है। हालांकि, जांच एजेंसी ने यह नहीं बताया कि क्या चैनल चलाने वाले व्यक्ति से पूछताछ की गई, क्या ओरिजिनल फुटेज मंगाई गई या क्या इलेक्ट्रॉनिक मटीरियल को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पुलिस का जवाब जंतर-मंतर विरोध स्थल के CCTV फुटेज, वहां तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा की गई रिकॉर्डिंग, भारद्वाज के कॉल-डिटेल रिकॉर्ड और लोकेशन डेटा आदि के बारे में चुप है।

    इस तरह की जांच में इन कदमों को "बुनियादी कदम" बताते हुए कोर्ट ने जांच एजेंसी को "मकसद और तेज़ी" के साथ जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने खास तौर पर जांच अधिकारी (IO) को निर्देश दिया कि वे CCTV फुटेज, पुलिस रिकॉर्डिंग, कॉल-डिटेल रिकॉर्ड और टावर-लोकेशन डेटा इकट्ठा करें; सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अकाउंट और अपलोड की जानकारी लें; पॉडकास्ट चैनल ऑपरेटर से पूछताछ करें; और संबंधित इलेक्ट्रॉनिक मटीरियल को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजें ताकि यह पता चल सके कि वह असली है, मॉर्फ्ड है या आर्टिफ़िशियल रूप से बनाया गया।

    कोर्ट ने कहा कि जिन अपराधों का आरोप है, उनमें अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है और भारद्वाज से हिरासत में पूछताछ पहले ही पूरी हो चुकी है।

    पीड़ित के सुरक्षा के कानूनी अधिकार और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी की व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए कोर्ट ने भारद्वाज को तीन हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत दी।

    सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की पाबंदी के अलावा, भारद्वाज को यह भी निर्देश दिया गया कि वह शिकायतकर्ता, उनकी नाबालिग बेटी, परिवार के सदस्यों या अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क न करें।

    जज ने उन्हें सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करने, ज़रूरत पड़ने पर जांच में शामिल होने और बिना पूर्व अनुमति के देश न छोड़ने का भी निर्देश दिया।

    उसे अंतरिम ज़मानत की अवधि खत्म होने पर सरेंडर करने का भी निर्देश दिया गया।

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