न्यायपालिका आलोचना से परे नहीं हो सकती: CJI सूर्यकांत, “जन विश्वास के लिए पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रक्रिया जरूरी”
Praveen Mishra
15 Sept 2026 1:28 PM IST

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि न्यायपालिका जनता का विश्वास हासिल करने के लिए खुद को जांच-पड़ताल से ऊपर नहीं रख सकती। न्यायपालिका को अपने कामकाज पर सवाल, जांच और आवश्यक आलोचना के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित 6वें राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में “Justice Seen to Be Done: Transparency and Public Trust as Pillars of the Legal System” विषय पर बोल रहे थे।
रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि न्यायिक कार्यप्रणाली की निष्पक्ष, सूचित और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की वैध और आवश्यक विशेषता है। इससे संस्थागत जवाबदेही और खुद को सुधारने की प्रक्रिया मजबूत होती है।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका एक संस्था के रूप में आलोचना से बचने वाली नहीं है। अदालत जनता का भरोसा तभी हासिल कर सकती है, जब वह जांच, सवाल और जरूरत पड़ने पर आलोचना के लिए तैयार रहे।
सिर्फ फैसला नहीं, उसकी वजह भी पारदर्शी हो
चीफ़ जस्टिस ने न्यायिक पारदर्शिता को केवल खुली अदालतों और सार्वजनिक सुनवाई तक सीमित मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि किसी फैसले का परिणाम ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की reasoning और तर्क भी जांच के लिए खुले होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि खास तौर पर उस व्यक्ति को भी फैसले के पीछे की वजह समझने और उसकी जांच करने का अवसर होना चाहिए, जिसके खिलाफ फैसला आया है।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि यदि कोई अदालत अपना फैसला तो सुनाती है लेकिन उसके पीछे की reasoning को सामने नहीं रखती, तो उसे वास्तविक अर्थों में पारदर्शी नहीं कहा जा सकता।
जनता की पसंद का फैसला नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया जरूरी
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने Public Trust और Public Approval के बीच अंतर भी बताया। उन्होंने कहा कि अदालत का भरोसा केवल इसलिए नहीं बनता कि लोग उसके फैसले को पसंद करते हैं या फैसला उनकी इच्छा के मुताबिक आया है।
उन्होंने कहा कि असली भरोसा तब पैदा होता है जब केस हारने वाला व्यक्ति भी यह मानकर अदालत से बाहर निकले कि उसके साथ अपनाई गई प्रक्रिया निष्पक्ष थी।
कानूनी विद्वान Tom R. Tyler के शोध का हवाला देते हुए चीफ़ जस्टिस ने कहा कि लोगों के लिए जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता होती है।
उनके अनुसार, “Winning” अदालत की वैधता का आधार नहीं है, बल्कि “fairness of process” है।
'Justice Seen to Be Done' का सिद्धांत
चीफ़ जस्टिस ने न्याय के केवल किए जाने ही नहीं, बल्कि होते हुए दिखाई देने के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए 1924 के अंग्रेजी मामले R v. Sussex Justices का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत के तहत किसी फैसले की शुद्धता के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि आम लोगों को वह फैसला निष्पक्ष दिखाई दे और न्यायिक प्रक्रिया में किसी संभावित हित-संघर्ष की आशंका भी सार्वजनिक विश्वास को प्रभावित न करे।
हालांकि, चीफ़ जस्टिस ने यह भी स्पष्ट किया कि पारदर्शिता का अर्थ अदालत की कार्यवाही को केवल मीडिया के सामने खोल देना नहीं है। उन्होंने राम जेठमलानी द्वारा लड़े गए नानावती मुकदमे का संदर्भ देते हुए कहा कि अत्यधिक मीडिया कवरेज के बावजूद किसी मुकदमे की सार्वजनिक धारणा निष्पक्ष नहीं हो सकती।
“Public Trust Judiciary की एकमात्र करेंसी”
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायपालिका की शक्ति और उसके अधिकार को जन विश्वास से जोड़ते हुए कहा कि न्यायपालिका के पास न तो “तलवार” की शक्ति है और न ही “धन” की—उसके पास केवल निर्णय देने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का अधिकार तभी तक कायम रहता है, जब तक लोग स्वेच्छा से यह मानते हैं कि उसके आदेशों का पालन किया जाना चाहिए।
चीफ़ जस्टिस ने Public Trust को Judiciary की “एकमात्र करेंसी” बताते हुए कहा कि यह भरोसा एक बार हासिल करके हमेशा के लिए नहीं रखा जा सकता। इसे लगातार कायम और नवीनीकृत करना पड़ता है।
आम नागरिक तक न्याय पहुंचाना भी जरूरी
चीफ़ जस्टिस ने Access to Justice पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल अदालत का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। आम नागरिक के लिए जरूरी है कि वह न्याय व्यवस्था तक पहुंच सके, वहां चल रही प्रक्रिया को समझ सके और अदालत तक पहुंचना उसके लिए “आधी लड़ाई” न बन जाए।
उन्होंने eCourts Project के तहत सिंगल साइन-ऑन पोर्टल, इलेक्ट्रॉनिक समन और जेल-कचहरी रिकॉर्ड के एकीकरण जैसे कदमों का उल्लेख किया। इसके अलावा, ई-समिति द्वारा शुरू किए गए e-Sewa Kendra मोबाइल वैन के जरिए न्यायिक सेवाओं और कानूनी सहायता को नागरिकों के दरवाजे तक पहुंचाने की पहल का भी जिक्र किया।
अंत में चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने राम जेठमलानी की पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति प्रतिबद्धता को याद करते हुए कहा कि कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता को आधार बनाया जाना चाहिए और जनता के विश्वास को लगातार मजबूत किया जाना चाहिए।
न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि “होता हुआ दिखाई” भी देना चाहिए।


