सिविल न्यायालयों को धारा 92 सीपीसी के क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से पहले 'ट्रस्ट' की धार्मिक/धर्मार्थ प्रकृति का पता लगाना चाहिए: कर्नाटक हाईकोर्ट

  • सिविल न्यायालयों को धारा 92 सीपीसी के क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से पहले ट्रस्ट की धार्मिक/धर्मार्थ प्रकृति का पता लगाना चाहिए: कर्नाटक हाईकोर्ट

    Karnataka High Court

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने के लिए सिविल कोर्ट को पहले रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री से तथ्यात्मक निष्कर्ष निकालना है कि ट्रस्ट एक सार्वजनिक धर्मार्थ या धार्मिक ट्रस्ट है और यह भी कि क्या न्यायालय से संपर्क करने वाले व्यक्तियों का ट्रस्ट में कोई हित है।

    जस्टिस आर नटराज की एकल पीठ ने आदर्श सुगम संगीता अकादमी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया और यहां प्रतिवादी वृंदा एस राव और पुष्पा एमके को उनके खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति देने के आदेश को रद्द कर दिया।

    ट्रायल कोर्ट के समक्ष, प्रतिवादी ने यहां दावा किया कि याचिकाकर्ता एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट था, जिसके राव अन्य प्रो-फॉर्मा प्रतिवादियों के साथ एक ट्रस्टी थे। प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट की बैठकें नियमित रूप से नहीं की जाती थीं और ट्रस्ट की एक भी वार्षिक आम सभा की बैठक नहीं हुई थी।

    उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्टियों में से एक श्री जीवाई भगवान बहुत पहले मर गए और उनका स्थान नहीं भरा गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने अनियमितताओं और धन की हेराफेरी देखी।

    दूसरी ओर ट्रस्ट ने दावा किया कि यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट नहीं है और ट्रस्ट डीड के अवलोकन से किसी भी धर्मार्थ गतिविधियों का खुलासा नहीं होता है। इसलिए, ट्रायल कोर्ट को याचिका पर विचार करने के अधिकार क्षेत्र के साथ नहीं पहना जा सकता है।

    यह भी प्रस्तुत किया गया था कि पुष्पा एमके ट्रस्ट के मामलों में दिलचस्पी रखने वाली व्यक्ति नहीं थीं और इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने उपरोक्त के आधार पर याचिकाकर्ताओं के मामले पर विचार किए बिना याचिका की अनुमति दी।

    परिणाम

    बेंच ने कहा, "सीपीसी की धारा 92 एक विशेष प्रावधान है जो आम जनता के हितों को सुरक्षित करने के लिए प्रदान करता है जो सार्वजनिक धर्मार्थ या धार्मिक ट्रस्ट या संस्थान में रुचि रखते हैं। सीपीसी की धारा 92 के तहत एक मुकदमा बरकरार रखने के लिए, आवेदन करने वाले व्यक्तियों को सार्वजनिक दान या धार्मिक ट्रस्ट या एक उद्देश्य के अस्तित्व को दिखाना चाहिए। ट्रस्ट की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन होना चाहिए। ऐसी याचिका ट्रस्ट के मामलों में रुचि रखने वाले दो व्यक्तियों द्वारा दायर की जा सकती है।"

    इसमें कहा गया है, "एक बार जब सीमा पूरी हो जाती है तो एकमात्र सवाल यह होगा कि क्या ट्रस्ट का उल्लंघन हुआ है और यदि हां तो कोर्ट अपनी देखरेख में ट्रस्ट के बेहतर और प्रभावी प्रशासन के लिए एक योजना के तौर-तरीकों का निर्धारण करेगा।"

    मौजूदा मामले में आक्षेपित आदेश के अवलोकन से हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट इस सवाल पर अपना दिमाग लगाने में विफल रहा कि क्या ट्रस्ट धर्मार्थ या धार्मिक था और क्या याचिकाकर्ता वास्तव में ट्रस्ट के मामलों में रुचि रखते थे।

    कोर्ट ने आक्षेपित आदेश को रद्द करते हुए और निचली अदालत को कानून के अनुसार याचिका पर विचार करने में तेजी लाने का निर्देश देते हुए कहा, "न्यायालय इस धारणा पर आगे बढ़ा है कि ट्रस्ट एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है और याचिकाकर्ता ट्रस्ट के मामलों में रुचि रखते हैं।"

    केस टाइटल: आदर्श सुगम संगीता अकादमी बनाम वृंदा एस राव और अन्य

    केस नंबर: WRIT PETITION NO.33264 OF 2016

    साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (कर) 324

    आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

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