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तलाक की डिक्री की उम्मीद करने वाली उम्मीदवार 'तलाकशुदा महिला' श्रेणी के तहत आरक्षण की मांग नहीं कर सकतीः राजस्थान हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
28 Jan 2022 3:12 PM GMT
तलाक की डिक्री की उम्मीद करने वाली उम्मीदवार तलाकशुदा महिला श्रेणी के तहत आरक्षण की मांग नहीं कर सकतीः राजस्थान हाईकोर्ट
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राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि कानून में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जो एक उम्मीदवार को 'तलाकशुदा महिला' श्रेणी के तहत इस उम्मीद में आवेदन करने की अनुमति देता हो कि अदालत द्वारा उसे तलाक की डिक्री दी जाएगी।

जस्टिस विनोद कुमार भरवानी और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा,

''उक्त श्रेणी में आवेदन करने वाले व्यक्ति के लिए, तलाकशुदा होने का स्टे्टस अनिवार्य है। कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक उम्मीदवार को उक्त श्रेणी के तहत इस उम्मीद में आवेदन करने की अनुमति देता हो कि उसे एक डिक्री दी जाएगी।''

याचिकाकर्ता ने एक रिट याचिका दायर कर उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई थी। उसने जिला न्यायालय और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में स्टेनोग्राफर ग्रेड- III (हिंदी और अंग्रेजी) के पद के लिए ऑनलाइन आवेदन पत्र जमा किया था,परंतु उसकी उम्मीदवारी को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि आवेदन दायर करने की अंतिम तिथि के समय उसके पास तलाक की डिक्री नहीं थी।

अदालत ने कहा कि विचाराधीन भर्ती अधिसूचना, बिना किसी अनिश्चित शर्तों के, यह निर्धारित करती है कि आरक्षण ''तलाकशुदा महिला'' श्रेणी को दिया जा रहा है।

अशोक कुमार सोनकर बनाम भारत संघ (2007) 3 एससीसी 956, के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि के समय 'तलाकशुदा महिला' नहीं थी। इसलिए वह उक्त श्रेणी में आवेदन करने की हकदार नहीं थी और इसी के परिणामस्वरूप, प्रतिवादी तलाकशुदा महिला की श्रेणी में उसकी उम्मीदवारी को अस्वीकार करने के लिए पूरी तरह से सही हैं।

अशोक कुमार सोनकर में, सुप्रीम कोर्ट ने आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि तक अपेक्षित शैक्षणिक योग्यता नहीं रखने वाले उम्मीदवार के पहलू पर विचार कर किया था। जिसमें यह माना गया था कि यदि नियम और भर्ती अधिसूचना मौन है, तो योग्यता पर विचार करने की अंतिम तिथि आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि ही होगी।

वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता का विवाह श्री विकास नाम के एक व्यक्ति से 06.07.2018 को हुआ था और उन्होंने 17.09.2018 को सोसायटी पंचायत में प्रथागत तलाक ले लिया। बाद में 12.07.2019 को उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत एक आवेदन दायर किया था और 13.08.2020 को तलाक की डिक्री पारित की गई थी।

चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी के तहत आवेदन भर्ती प्रक्रिया में आवेदन पत्र जमा करने की तारीख से बहुत पहले ही दायर कर दिया गया था,इसलिए याचिकाकर्ता ने तलाकशुदा महिला की श्रेणी में आवेदन किया था।

अंतिम परिणाम 15.12.2021 को घोषित किया गया, जिसमें एक नोट संलग्न किया गया था कि याचिकाकर्ता के पास ऑनलाइन आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि यानी 28.02.2020 को तलाक की डिक्री नहीं थी,इसलिए उसे तलाकशुदा महिला श्रेणी का लाभ नहीं दिया जा सकता है। इसी से व्यथित होकर वर्तमान रिट दायर की गई।

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता राकेश अरोड़ा ने तर्क दिया कि तलाकशुदा महिला श्रेणी में याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को ठुकराने में प्रतिवादी पूरी तरह से अनुचित थे क्योंकि उसके पास पहले से ही एक प्रथागत तलाक समझौता था।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन भी भर्ती अधिसूचना जारी होने से काफी पहले ही दायर कर दिया था,परंतु मौजूदा कोरोना महामारी के कारण कोर्ट उस पर अपना निर्णय नहीं सुना पाई थी। इसलिए, याचिकाकर्ता को उनकी मैरिट के अनुसार तलाकशुदा महिला श्रेणी में नियुक्ति दी जानी चाहिए थी।

कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है,इसलिए इसे खारिज किया जाता है।

केस का शीर्षक- पारुल खुराना बनाम रजिस्ट्रार जनरल,राजस्थान हाईकोर्ट व अन्य

केस नंबर- डी.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 1004/2022

केस उद्धरण- 2022 लाइव लॉ (राज) 37

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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