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यदि पक्षद्रोही गवाह मानते हैं कि वे कानून के शासन से परे हैं तो यह न्याय वितरण प्रणाली के लिए कैंसर जैसा होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
4 Feb 2021 8:35 AM GMT
यदि पक्षद्रोही गवाह मानते हैं कि वे कानून के शासन से परे हैं तो यह न्याय वितरण प्रणाली के लिए कैंसर जैसा होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने हाल के एक आदेश में कहा है कि अदालतें "पक्षद्रोही गवाहों के संकट को नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं।" कोर्ट ने पांच गवाहों के खिलाफ ट्रायल कोर्ट को कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की, जिनके सबूतों के आधार पर एक 75 साल की महिला को बरी कर दिया गया।

जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस बीयू देबद्वार की खंडपीठ ने कहा कि भले ही कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर कानून के प्रति सम्मान पैदा नहीं किया जा सकता है, लेकिन समाज को "जोर से और स्पष्ट" संदेश देना आवश्यक है कि पक्षद्रोही गवाहों को क्षमा नहीं किया जाएगा।

पीठ ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह गवाहों के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत कार्रवाई करे, और सर्कुलेशन के लिए आदेश की कॉपी प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीशों को भेजी जाए, और अधीनस्थ न्यायपालिका को उन कार्रवाइयों के बारे में अवगत कराएं, जिन्हें उन्हें उचित मामलों में लेने के लिए सशक्त बनाया गया है।

पीठ ने कहा कि यह "बड़ी चिंता" की बात है, यदि गवाह "बाहरी विचारों" के कारण पक्षद्रोही होंगे, क्योंकि वे तब मानना ​​शुरू कर देंगे कि वे कानून की पहुंच से परे हैं। पीठ ने कहा, "यह न केवल न्याय व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या/ बीमारी होगी, बल्कि कानून के शासन और न्याय वितरण प्रणाली के लिए भी कैंसर हो सकती है।"

अदालत ने कहा, "हम व्यावहारिक रूप से प्रत्येक मामलों में, दिन-ब-दिन देख रहे हैं, पक्षद्रोही गवाहों की सूची बढ़ रही है और गवाह निडर होकर ऐसे कारणों से पक्षद्रोही हो रहे हैं, जिन्हें अनुमान लगाया जा सकता है, और समझा जा सकता है।"

मुकदमा

अदालत 75 वर्षीय सरस्वती गणपत लांडगे की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसे 11 सितंबर, 2014 को बीड की अंबजोगाई सत्र न्यायालय कुछ एकड़ जमीन के लिए पति की निर्मम हत्या के दोष में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। पति का जमीन को दान देने का इरादा था।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि लांडगे ने पति के चेहरे को 8 किग्रा के पत्थर कुचल दिया था, उसके गुप्तांगों को कुचल दिया था और फिर यह सुनिश्चित करने के लिए पति मर चुका है, उसे बिजली का करंट दिया था। लांडगे ने कथित घटना के तुरंत बाद पति को मारने की बात पुल‌िस के समक्ष कबूल की थी।

ट्रायल के दौरान सात गवाहों में से पांच पक्षद्रोही हो गए, इसके बाद भी लांडगे को दोषी ठहराया गया। इन गवाहों में दंपति का बेटा (शिकायतकर्ता) भी शामिल था, जो उनके साथ रहता था, एक पड़ोसी और एक अन्य औपचारिक गवाह (पंच) शामिल था।

हाईकोर्ट ने लांगडे को बरी कर दिया और कहा कि यह काफी संदेहास्पद है कि एक वरिष्ठ नागरिक इतना भारी पत्थर उठा सकती है या आदमी के गुप्तांग को चोटिल कर सकती है। इसके अलावा, भले ही जांच अधिकारी ने कहा कि हत्या का हथियार उसके बयान के आधार पर बरामद किया गया है, लेकिन पक्षद्रोही गवाहों ने भ्रम पैदा किया कि क्या हत्या की रात दंपति कमरे में अकेले थे?

अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने एफआईआर को सबूतों के बड़े हिस्से के रूप में इस्तेमाल करने की गलती की। "इसलिए, हम पाते हैं कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष कि अपीलकर्ता और मृतक के बीच झगड़े को एफआईआर के आधार पर साबित किया गया था, अस्वीकार्य है। एफआईआर को सबूत के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।"

मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा खराब निष्पादन पर टिप्पणी करते हुए, अदालत ने कहा, "यह ध्यान में रखते हुए कि अभियोजन पक्ष ने आकस्मिक और आधे-अधूरे तरीके से मुकदमा चलाया है, सात गवाहों में से पांच ने पक्ष द्रोही हो गए हैं और जैसा कि भौतिक गवाहों की जांच नहीं की गई है, हम अपीलकर्ता/ आरोपी और को संदेह का लाभ देने के लिए विवश हैं और उसे बरी करने का आदेश देते हैं।"

अदालत ने गवाहों के खिलाफ टिप्पणियों के लिए निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा किया-

महाराष्ट्र राज्य बनाम कृष्ण सीताराम पवार, आपराधिक पुष्टि प्रकरण संख्या 2/2020

रामजी डूडा मकवाना बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1994 Cri.L.J. 1987 (बॉम्बे हाई कोर्ट) और

पीएस लोधी कॉलोनी, नई दिल्ली के माध्यम से राज्य बनाम संजीव नंदा, (2012) 8 एससीसी 450

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