दुर्गा पूजा के दौरान बुक स्टॉल नहीं लगा पाएगी CPIM, हाईकोर्ट ने अनुमति वाले आदेश पर लगाई रोक

  • दुर्गा पूजा के दौरान बुक स्टॉल नहीं लगा पाएगी CPIM, हाईकोर्ट ने अनुमति वाले आदेश पर लगाई रोक

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने सिंगल जज के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें पुलिस को निर्देश दिया गया था कि वे दुर्गा पूजा के दौरान बोंगांव में CPIM (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया - मार्क्सवादी) को अपने पार्टी कार्यालय के पास बुक स्टॉल लगाने में आने वाली बाधाओं से बचाएं। कोर्ट ने पाया कि पार्टी ने स्टॉल लगाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई अनुमति नहीं ली थी।

    चीफ जस्टिस रवींद्र विट्ठलराव घुगे और जस्टिस मो. शब्बर रशीदी की डिवीजन बेंच ने 16 अक्टूबर को यह अंतरिम आदेश दिया। यह आदेश पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सिंगल जज के फैसले के खिलाफ दायर एक अपील की सुनवाई के दौरान आया।

    खंडपीठ ने गौर किया कि CPIM ने 6 अक्टूबर 2026 के ईमेल के जरिए केवल लोक निर्माण (सड़क) निदेशालय (Public Works (Roads) Directorate) को स्टॉल लगाने के अपने इरादे के बारे में सूचित किया था, लेकिन इसके लिए स्पष्ट रूप से कोई अनुमति नहीं मांगी थी।

    खंडपीठ ने कहा,

    "हम यह भी दर्ज करते हैं कि जो भी पक्ष कोर्ट में आता है, उसे सबसे पहले यह साबित करना होगा कि क्या उसके पास स्टॉल लगाने की अनुमति है या नहीं।"

    कोर्ट ने यह भी पाया कि यह ईमेल सिंगल जज के ध्यान में नहीं लाया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर यह दस्तावेज सिंगल जज के सामने होता तो उन्हें यह तय करने में मदद मिलती कि क्या PWD अधिकारियों से अनुमति लेने की आवश्यकता थी, और क्या यह रिट याचिका कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (रोस्टर) के तहत भूमि मामलों या पुलिस की निष्क्रियता से संबंधित है।

    खंडपीठ ने कहा कि ईमेल को छिपाना महत्वपूर्ण जानकारी को दबाने के समान है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब कोई पक्ष राहत पाने के लिए कोर्ट में आता है तो उसे सभी प्रासंगिक जानकारी का खुलासा करना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट के किशोर समरिटे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और भास्कर लक्ष्मण जाधव बनाम कर्मवीर काकासाहेब वाघ एजुकेशन सोसाइटी मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता चुनिंदा जानकारी नहीं दे सकते; उन्हें सारी जानकारी कोर्ट के सामने रखनी चाहिए ताकि कोर्ट कानून के अनुसार उसका मूल्यांकन कर सके।

    आदेश में कहा गया,

    "प्रथम दृष्टया, हमें लगता है कि 'X-1' एक ऐसा दस्तावेज है, जो सिंगल जज के सामने यह तय करने में मददगार साबित हो सकता था कि क्या उनके पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) है या नहीं।"

    बेंच ने यह भी कहा कि CPIM कार्यालय स्टेट हाईवे पर स्थित है। प्रथम दृष्टया पुलिस के पास वहां बुक स्टॉल लगाने की अनुमति मांगने वाले आवेदन पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां अंतरिम चरण में उपलब्ध सामग्री पर आधारित हैं।

    पुलिस को एक अन्य स्टॉल के लिए अनुमति की जांच करने को कहा गया

    सुनवाई के दौरान, CPIM ने यह भी तर्क दिया कि उसके कार्यालय के ठीक सामने एक और स्टॉल लगाया गया।

    बेंच ने गौर किया कि दूसरा स्टॉल चलाने वाला पक्ष सिंगल जज के समक्ष मौजूद नहीं था, क्योंकि उसे रिट याचिका की कोई सूचना (नोटिस) नहीं दी गई।

    राज्य के इस पक्ष पर ध्यान देते हुए कि स्टॉल पहले ही लगाया जा चुका है, अदालत ने एडिशनल एडवोकेट जनरल से कहा कि वे पुलिस के जरिए यह पता लगवाएं कि क्या इसके लिए कोई अनुमति ली गई।

    बेंच ने कहा कि अगर कोई अनुमति नहीं मांगी गई और न ही दी गई तो स्टॉल को हटाने के लिए तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए।

    अदालत ने यह भी कहा कि वह केवल इस तर्क से सहमत नहीं होगी कि शारदोत्सव या दुर्गा पूजा के दौरान सड़कों के किनारे बुक स्टॉल दशकों से बिना अनुमति के लगते आ रहे हैं।

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