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स्कूल चेयरमैन द्वारा "नालायक, झोपडपट्टी-छाप" कहे जाने के बाद लड़के ने फांसी लगाई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत से इनकार किया

Shahadat
17 May 2022 1:05 PM GMT
स्कूल चेयरमैन द्वारा नालायक, झोपडपट्टी-छाप कहे जाने के बाद लड़के ने फांसी लगाई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत से इनकार किया
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने छात्र को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में स्कूल चेयरमैन और अनुशासनात्मक प्राधिकारी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि उसने "कोमल दिमाग को चकनाचूर कर दिया" और "उसे गहरी निराशा में डाल दिया।"

जस्टिस विनय जोशी ने पिछले महीने आदेश में कहा था कि युवा छात्र ने आवेदक के कृत्य के कारण अपनी जान गंवा दी और उस मामले के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है, जहां जांच जारी है।

उन्होंने कहा,

"गवाहों के बयान के अनुसार, आवेदक ने मृतक नाबालिग लड़के को अनियंत्रित तरीके से डांटा। उसने लड़के के माता-पिता को भी स्कूल बुलाया था। शिक्षक और शिकायतकर्ता (दादा) की उपस्थिति में फिर से अशोभनीय शब्दों में उसे डांटा। इससे प्रथम दृष्टया पता चलता है कि आवेदक ने छात्र के मन में उसे गहरी निराशा में डालने के लिए छाप बनाई। यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि घटना के कुछ घंटों के भीतर आवेदक के कृत्य का सीधा संबंध है, बच्चे ने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।"

आवेदक के "अशोभनीय शब्द" मृतक को "नालायक" (बेकार), झोपडपट्टी-छाप (झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले की तरह) कहने के बारे में थे कि उसे जीने का कोई अधिकार नहीं है और वह दुनिया पर बोझ है। ये सभी शब्द कथित तौर पर आवेदक ने मराठी भाषा में कहे थे।

अदालत महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में सिम्बोलिक इंटरनेशनल स्कूल के चेयरमैन और अनुशासनात्मक प्राधिकारी गणपतराव पाटिल द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पाटिल की पत्नी स्कूल की प्रिंसिपल हैं।

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 305, 504, 506 और धारा 34 और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम की धारा 75 और 87 के तहत मामला दर्ज किया गया है। उसके खिलाफ 2 अप्रैल, 2022 को शिरोली एमआईडीसी पुलिस स्टेशन में 2015 दर्ज किया गया था।

मृतक के दादा की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत के मुताबिक मृतक स्कूल में छात्र कक्षा 10 में पढ़ता था। शिकायत में कहा गया कि एक अप्रैल, 2022 को उन्हें स्कूल से फोन आया, जिसमें उन्हें स्कूल आने के लिए कहा गया। जब वह स्कूल गया तो उसे अपने पोते (मृतक) को वापस घर ले जाने के लिए कहा गया।

पूछताछ करने पर पोते ने उसे बताया कि फुटबॉल खेलते समय एक लड़की से अनजाने में टकरा गया था, जिसके बाद पाटिल ने उसे गालियां दी थीं। जब दादा पाटिल से आगे की जांच करने के लिए मिले तो पाटिल ने उन्हें बताया कि पोते ने लड़की को चोट पहुंचाई, वह संस्कारी नहीं है, जिसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है और वह एक झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाला लड़का है।

पाटिल ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता को यह भी बताया कि स्कूल प्रिंसिपल ने उन्हें सूचित किया कि पोते ने पहले भी अभद्र व्यवहार किया और लड़के को स्कूल से निकाल दिया जाना चाहिए। तब पाटिल ने कथित तौर पर शिक्षक की उपस्थिति में अदालत द्वारा असंसदीय करार दिए गए सभी शब्दों का उच्चारण किया। दादा लड़के को घर ले गए जहां कुछ ही घंटों में उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

अदालत के समक्ष पाटिल के वकील ने तर्क दिया कि आरोप कहीं भी पर्याप्त कारण का खुलासा नहीं करते। पाटिल अध्यक्ष और अनुशासनात्मक प्राधिकारी होने के नाते छात्र को फटकारने के उनके कार्य को आत्महत्या करने के लिए पर्याप्त उकसाने के रूप में नहीं माना जा सकता।

यह तर्क दिया गया कि पाटिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई यह नहीं बताती कि वह इस तरह के कृत्य से मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाना चाहता था और जब तक पर्याप्त कारण न हो आईपीसी की धारा 107 के अर्थ में छात्र को गाली देने के कार्य को पर्याप्त "उकसाने" के रूप में नहीं कहा जा सकता है। तर्कों का समर्थन करने के लिए विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया गया।

अभियोजक ने यह कहते हुए याचिका का विरोध किया कि घटना के कुछ घंटों के भीतर छात्र ने आत्महत्या कर ली थी और पाटिल ने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी जिसके कारण लड़के ने अपना जीवन समाप्त कर लिया था और जांच जारी है।

अदालत ने अभियोजक द्वारा उद्धृत फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि यह अच्छी तरह से तय किया गया कि प्रत्येक मामला मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

अदालत ने कहा,

"क्या किसी व्यक्ति ने आत्महत्या के लिए उकसाया है, यह केवल विशेष मामले के तथ्यों से ही पता लगाया जा सकता है। आत्महत्या के लिए उकसाने का अप्रत्यक्ष कार्य हो सकता है।"

मामले के गुण-दोष पर अदालत ने कहा,

"जांच करने पर पता चलता है कि छात्रों के साथ दुर्व्यवहार के बारे में आवेदक के खिलाफ माता-पिता की कई शिकायतें हैं। जहां तक ​​मामले की बात है तो आवेदक के बयान आपत्तिजनक हैं। निस्संदेह, वह छात्रों को फटकार सकता है, लेकिन ऐसी भाषा में नहीं जो "कोमल दिमाग को चकनाचूर कर दे" और "उसे गहरी निराशा में डाल दे।"

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