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बॉम्बे हाईकोर्ट ने भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद जाति हिंसा मामले में आठ आरोपियों की ड‌िफॉल्‍ट जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा

LiveLaw News Network
2 Sep 2021 6:44 AM GMT
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद जाति हिंसा मामले में आठ आरोपियों की ड‌िफॉल्‍ट जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद जाति हिंसा मामले में आठ आरोपियों की ड‌िफॉल्‍ट जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया। आरोपियों ने पुणे स्‍थ‌ित एक सत्र न्यायाधीश द्वारा आरोप पत्र का संज्ञान लेने के खिलाफ याचिका दायर की थी और डिफॉल्ट जमानत की मांग की थी।

सत्र न्यायाधीश ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43-डी (2) के साथ पठित दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 (2) के तहत डिफॉल्ट जमानत आवेदन को खारिज कर दिया था।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने याचिकाकर्ताओं - सुधीर धवले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा के साथ-साथ सात अन्य पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आतंकी कृत्यों का आरोप लगाया है ।

एडवाकेट सुदीप पासबोला और आर सत्यनारायणन ने याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया कि एनआईए अधिनियम के तहत केवल एक विशेष अदालत के पास आरोप पत्र का संज्ञान लेने का अधिकार क्षेत्र है, न कि सत्र न्यायाधीश के पास। आरोप पत्र के संज्ञान का उल्लंघन किया गया क्योंकि यह अधिकार क्षेत्र के बिना था।

याचिका का विरोध करते हुए, महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 167 (2) के प्रावधान के तहत डिफॉल्ट जमानत के लिए, चार्जशीट का संज्ञान लेने के मामले में जज महत्वहीन है। एकमात्र मानदंड यह है कि चार्जशीट निर्धारित 180 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिए, यह देखते हुए कि पुलिस को दस्तावेज दाखिल करने के लिए 90 दिनों का विस्तार दिया गया था।

कुंभकोनी ने दावा किया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने चार्जशीट दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने के आदेश को चुनौती नहीं दी है। उन्होंने कहा, "एक बार जब आरोप पत्र समय की निर्धारित अवधि में दायर कर दिया गया है तो डिफॉल्ट जमानत का सवाल ही नहीं उठता।"

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कुंभकोनी की दलीलें मान लीं। उन्होंने कहा, "यह सही तर्क है कि डिफॉल्ट जमानत के लिए, जिसे अभी मांगा जा रहा है, संज्ञान महत्वहीन है।"

जवाबी तर्क में, पासबोला ने कहा कि आरोप पत्र दाखिल करने के विस्तार के आदेश को एक अलग कार्यवाही में चुनौती दी गई थी। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने आदेश को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने तर्क दिया कि मुख्य मुद्दा यह है कि जिस अदालत ने अंततः आरोपपत्र का संज्ञान लिया, उसे ऐसा करने का अधिकार था या नहीं।

अदालत ने कहा, "कृपया CrPCकी धारा 460 देखें। यह (विशेष अदालत के समक्ष आरोप पत्र दाखिल नहीं करना) कोई अनियमितता नहीं है, यह एक अवैधता है, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता।"

इसके बाद कोर्ट ने याचिका को आदेश के लिए सुरक्षित रख लिया। हाईकोर्ट सह-आरोपी सुधा भारद्वाज की इसी तरह की याचिका पर अपना फैसला सुना सकता है , जिस पर चार अगस्त को आदेश सुरक्षित रखा गया था।

केस शीर्षक: सुधीर धवले बनाम महाराष्ट्र राज्य


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