नया घर बनाने के लिए POCSO दोषी को पैरोल दी, नवी मुंबई एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए गिरा दिया गया था पुराना घर
Shahadat
22 May 2026 9:16 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम' (POCSO Act) के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को 25 दिनों की पैरोल दी। यह पैरोल उसे एक नया घर बनाने के लिए दी गई। उसका पिछला घर महाराष्ट्र सरकार ने नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन (जिस पर उसका घर बना था) का अधिग्रहण करने के बाद गिरा दिया था।
नागपुर पीठ में बैठी जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने गौर किया कि दोषी प्रदीप गायकवाड़ पहले ही जेल में नौ साल से ज़्यादा समय बिता चुका है। साथ ही यह भी कि उसका घर गिराए जाने के बावजूद, उसे अभी तक सरकार से मुआवज़ा नहीं मिला है।
जजों ने कहा,
"यहां तक कि प्रतिवादी अधिकारियों ने भी इस बात से इनकार नहीं किया कि याचिकाकर्ता का घर अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान पहले ही गिरा दिया गया। याचिकाकर्ता ने जो आधार उठाया है कि उसे मुआवज़ा नहीं मिला, हालांकि यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन अब याचिकाकर्ता एक नई जगह पर घर बनाना चाहता है। रिकॉर्ड से यह साफ़ है कि याचिकाकर्ता और उसकी माँ पहले वाले घर में रहते थे, जिसे पहले ही गिरा दिया गया। याचिकाकर्ता ने यह आधार भी उठाया कि उसका बेटा भी बीमार है, जिस पर भी कुछ विचार किया जाना चाहिए। इसके अलावा, जब उसे पहले पैरोल पर रिहा किया गया, तब उसके दुर्व्यवहार की कोई शिकायत नहीं मिली थी।"
गौरतलब है कि गायकवाड़ को नवी मुंबई के पनवेल की एक अदालत ने POCSO और भारतीय दंड संहिता (IPC) के कुछ प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था और उसे 14 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई थी। हालांकि, जब उसने हाईकोर्ट में इस सज़ा को चुनौती दी तो उसकी सज़ा घटाकर 10 साल कर दी गई।
खंडपीठ ने गौर किया कि 2021 से गायकवाड़ ने पैरोल के लिए हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की थीं, लेकिन उसे 2024 में ही रिहा होने की अनुमति मिली - वह भी हाईकोर्ट के दखल के बाद - और तब उसे 40 दिनों के लिए रिहा किया गया।
जजों ने आदेश दिया,
"याचिकाकर्ता के पिछले इतिहास को देखते हुए—जिसे कई मौकों पर आवेदन दाखिल करने पड़े, जिन पर इस न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अधिकारियों ने विचार नहीं किया, और जिसके कारण उसे कई बार दर-दर भटकना पड़ा—यह याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है। तथ्यात्मक स्थिति के साथ-साथ कानूनी प्रावधानों को भी ध्यान में रखते हुए हम याचिकाकर्ता को उसकी रिहाई की तारीख से 25 दिनों की पैरोल देने के इच्छुक हैं। हालांकि, यह इस शर्त पर होगा कि याचिकाकर्ता 25,000 रुपये का निजी मुचलका (Personal Bond) और उतनी ही राशि की एक ज़मानत (Surety) प्रस्तुत करे, और यह वचन दे कि वह अपनी शेष सज़ा काटने के लिए निर्धारित तारीख को या उससे पहले आत्मसमर्पण कर देगा।"
इन टिप्पणियों के साथ पीठ ने याचिका का निपटारा किया।
Case Title: Pradeep Rambhau Gaikwad vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 166 of 2026)

