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वकील ने फिजिकल सुनवाई के दौरान हटाया मास्‍क, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले को बोर्ड से हटाने का निर्देश दिया

LiveLaw News Network
28 Feb 2021 9:38 AM GMT
वकील ने फिजिकल सुनवाई के दौरान हटाया मास्‍क, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले को बोर्ड से हटाने का निर्देश दिया
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सुनवाई के दरमियान एक वकील ने अपना मास्क हटा लिया, जिस पर आपत्त‌ि दर्ज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने बोर्ड से उसके मामले को हटाने का निर्देश दिया।

जस्टिस पृथ्वीराज के चव्हाण की खंडपीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में फिजिकल हियरिंग की सुनवाई दोबारा शुरू करने के जारी की गई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का उल्लेख किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि हर समय फेस मास्क पहनना अनिवार्य है। मानक संचालन प्रक्रिया 11 जनवरी, 2021 से प्रभावी है।

उल्लेखनीय है कि मानक संचालन प्रक्रिया, जिसे फिजिकल हियरिंग को फिर से शुरू करने के लिए जारी किया गया है, के तहत, अदालत परिसर/कोर्ट रूम में सभी व्यक्तियों को हर समय मास्क पहनना अनिवार्य है।

सामान्य निर्देश में यह कहा गया है कि न्यायालय परिसर में प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से हर समय एक फेस मास्क पहनेगा और एमओएच / राज्य सरकार द्वारा जारी हालिया एसओपी का पालन करेगा।

अन्य संबंधित आदेश

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने सोमवार (15 फरवरी) को कोर्ट के समक्ष वर्चुअल मोड में बहस कर रहे एक वकील पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया। वकील ने नेकबैंड नहीं लगाया था।

जस्टिस एसके पाणिग्रही की पीठ ने कहा, "यह पेशा औपचारिक और गंभीर प्रकृति का है, और पोशाक इसकी गंभीरता का पूरक है। एक वकील होने के नाते, उनसे उचित पोशाक के साथ गरिमापूर्ण तरीके से अदालत में पेश होने की उम्मीद की जाती है, भले ही यह वर्चुअल मोड में हो।"

इसके अलावा, यह देखते हुए कि एक वकील खड़ी कार में, "लापरवाही भरे तरीके से" वर्चुअल सुनवाई में शामिल हुआ, मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार (03 फरवरी) को वकील के आचरण पर नाराजगी व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने, लापरवाही भरे तरीके से एक खड़ी कार में बैठकर मामले में प्रतिनिधित्व किया, जो कि उच्च न्यायालय द्वारा अधिसूचित वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग नियमों के मद्देनजर अनुमेय नहीं है।"

पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार (04 फरवरी) को कहा कि यह "आश्चर्यजनक" है कि वकील "सड़कों पर, पार्कों में बैठकर और सीढ़ियां चढ़ते हुए हुए वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मामलों की सुनवाई में भाग ले रहे हैं, जिससे अदालत के लिए कार्यवाही का संचालन करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि उन्हें सुनना मुश्किल होता है।

नवंबर 2020 में, पीठासीन अधिकारी DRT-I अहमदाबाद, विनय गोयल ने एक वकील विशाल गोरी पर 10,000 रुपए का जुर्माना लगाया था, जो अपनी कार के अंदर बैठकर वर्चुअल सुनवाई में शामिल हुए ‌थे।

ऐसी घटनाएं भी हुई हैं, जहां वकील अनुचित कपड़ों में वर्चुअल अदालत के लिए दिखाई देते हैं।

गुजरात हाईकोर्ट ने सितंबर 2020 में एक क्रिमिनल मिस्लेनियस एप्‍लिकेशन को लेते हुए देखा कि आवेदक-अभियुक्त नंबर 1, अजीत कुभभाई गोहिल, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के सामने पेश हुआ था, खुलेआम थूक रहा है।

आरोपी के आचरण की निंदा करते हुए जस्ट‌िस एएस सुफिया की खंडपीठ ने कहा, "यह अदालत आवेदक-अभियुक्त नंबर 1 के आचरण को देखते हुए आज मामला उठाने के लिए इच्छुक नहीं है।"

इसके अलावा, अदालत ने आवेदक-अभियुक्त नंबर 1 को सुनवाई की अगली तारीख को या उससे पहले उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री के पास 500 रुपए जुर्माना जमा करने का भी निर्देश दिया, और कहा कि जुर्माना जमा करने तक मामला सुनवाई के लिए पेश नहीं किया जाएगा।

हाल ही में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक वकील को फटकार लगाई, जो कार में बैठकर वीडियो कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही में भाग ले रहा था।

चीफ जस्ट‌िस अभय ओका और जस्टिस अशोक एस किन्गी की खंडपीठ ने कहा, "हालांकि असाधारण कारणों से, हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मामलों को सुनने के लिए मजबूर हैं। हम आशा करते हैं और बार के सदस्य भरोसे के साथ न्यूनतम डीकोरम का पालन करेंगे।"

जून के महीने में, सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील की माफी को स्वीकार कर लिया था, जो कोर्ट के सामने एक मामले में टी-शर्ट पहने हुए और बिस्तर पर पड़े हुए पेश हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान न्यूनतम अदालती शिष्टाचार बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक बार वीडियो कॉन्फ्रेंस सुनवाई के दौरान वकील के "बनियान" पहनकर पेश होने के मामले में जमानत याचिका स्थगित कर दी थी।

हाल ही में, उड़ीसा उच्च न्यायालय ने वीसी के दौरान वाहनों, गार्डन और भोजन करते समय आदि से बहस करने की वकीलों की प्रैक्टिस की निंदा की।

इसके अलावा, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के खिलाफ लिंक्डइन पर एक सुनवाई का स्क्रीन शॉट पोस्ट करने के कारण स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई का आदेश दिया था। हालांकि, अवमानना ​​कार्यवाही को बाद में वकील को इस चेतावनी के साथ कि भविष्य में इस तरह के आचरण को न दोहराया जाए, समाप्त कर दिया गया था।

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