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सेवानिवृत्ति की आयु घटाने का बैंक का निर्णय अतार्किक; प्रभावित कर्मचारी सेवा से बाहर अवधि के लिए वेतन के हकदार: राजस्थान हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
19 Jan 2022 10:27 AM GMT
सेवानिवृत्ति की आयु घटाने का बैंक का निर्णय अतार्किक; प्रभावित कर्मचारी सेवा से बाहर अवधि के लिए वेतन के हकदार: राजस्थान हाईकोर्ट
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राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय सहकारी बैंक के आयु को कम करने के बाद के 'अतार्किक' निर्णय के कारण सेवा से बाहर रहने वाले सेवानिवृत्ति कर्मचारी उक्त अवधि के लिए वेतन के हकदार हैं।

बैंक ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसमें सेवानिवृत्ति की आयु 60 से घटाकर 58 वर्ष कर दी गई।

जस्टिस रेखा बोराना ने कहा,

"याचिकाकर्ता उस अवधि के लिए वेतन के हकदार होंगे जिसके दौरान वे सेवा से बाहर रहे। उन्हें इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर भुगतान किया जाए।"

याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने फैसला सुनाया कि यदि उक्त अवधि के भीतर वेतन का भुगतान नहीं किया जाता तो यह 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ देय होगा।

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम दयानंद चक्रवर्ती और अन्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोते किया गया, जहां यह माना गया कि यदि किसी कर्मचारी को अपने कर्तव्यों का पालन करने से नियोक्ता द्वारा रोका जाता है तो कर्मचारी को काम नहीं करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे कर्मचारी पर 'नो पे नो वर्क' का सिद्धांत लागू नहीं होगा।

पृष्ठभूमि

वर्तमान मामले में प्रतिवादी बैंक ने दिनांक 25.05.2010 को एक प्रस्ताव पारित किया। इसके तहत कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष कर दी गई। हालांकि, एक रिट याचिका दायर करने के बाद बैंक को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया।

इसके बाद 18.07.2011 को एक और प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष निर्धारित करने के पहले के निर्णय को दोहराया गया। उसी को फिर से चुनौती दी गई और अदालत के समक्ष एक बयान दिया गया कि सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष से बढ़ाकर 60 वर्ष की जाएगी। तदनुसार, याचिकाओं को निष्फल होने के कारण खारिज कर दिया गया।

बाद में याचिकाकर्ताओं को उस अवधि के वेतन से वंचित कर दिया गया, जिस दौरान वे बैंक द्वारा प्रस्तावों को पारित किए जाने के कारण सेवा से बाहर रहे।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि यह केवल बैंक द्वारा किए गए प्रस्तुतीकरण के आधार पर है कि पहले की रिट याचिका को निष्फल के रूप में प्रस्तुत किया गया, क्योंकि बैंक ने प्रस्ताव के अनुसरण में परिणामी लाभ का भी वादा किया था।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि कैलाश चंद्र शोत्रिया और हरीश चंद्र जोशी नाम के दो कर्मचारियों को बैंक द्वारा विवादित अवधि के वेतन के बकाया का भुगतान किया गया और वर्तमान याचिकाकर्ताओं को बिना किसी प्रशंसनीय कारण के इसे अस्वीकार कर दिया गया।

प्रतिवादी-बैंक के वकील ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ताओं ने इस अवधि के दौरान काम नहीं किया, इसलिए वे 'नो पे नो वर्क' के सिद्धांत पर वेतन के हकदार नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने याचिकाकर्ताओं द्वारा नामित अन्य दो कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करने के तथ्य पर विवाद नहीं किया, लेकिन प्रस्तुत किया कि यह चिकित्सा आधार पर है।

जाँच - परिणाम

अदालत ने कहा कि प्रतिवादी बैंक ने बिना किसी तर्क या कारण के दिनांक 25.05.2010 और 18.07.2011 के प्रस्तावों को पारित किया। इसमें बाद में न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। अदालत ने कहा कि बैंक ने 16.12.2013 को स्व-हित के लिए प्रस्ताव पारित किया और इस स्पष्ट समझ के साथ कि लाभ उन कर्मचारियों को भी दिया जाएगा जो उस समय तक सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

कोर्ट ने कहा,

"माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दयानंद चक्रवर्ती के मामले (सुप्रा) में निर्धारित अनुपात के मद्देनजर, यह माना जाता है कि वर्तमान याचिकाकर्ता उस अवधि के लिए वेतन के हकदार होंगे, जिसके दौरान वे सेवा से बाहर रहे।"

केस शीर्षक: कैलाश चंद्र अग्रवाल बनाम राजस्थान राज्य और अन्य, जुड़े मामलों के साथ

प्रशस्ति पत्र: 2022 लाइव लॉ (राज) 21

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