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यह दावा कि अज्ञात बदमाशों ने कॉर्पस का अपहरण किया है, बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
5 Oct 2021 11:20 AM GMT
यह दावा कि अज्ञात बदमाशों ने कॉर्पस का अपहरण किया है, बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि केवल एक दावा है कि कॉर्पस का अज्ञात शरारती तत्वों ने अपहरण किया है, बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी करने की मांग के लिए पर्याप्त नहीं है।

जस्टिस एसए धर्माधिकारी की खंडपीठ ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट स्थापित करने के लिए पूर्व शर्त यह है कि जिस व्यक्ति की रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट मांगी गई है, वह हिरासत में होना चाहिए और उसे अधिकारियों या किसी न‌ीजि व्यक्ति द्वारा हिरासत में रखा जाना चाहिए।

संक्षेप में मामला

छाया गुर्जर ने हाईकोर्ट के समक्ष एक बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि कुछ बदमाशों ने उसकी भाभी आरती और उनकी बेटी काजल का हाईकोर्ट परिसर से अपहरण कर लिया है।

याचिका में आरोप लगाया गया हे कि प्रतिवादी-प्राधिकारियों के पास दोनों के संबंध में जानकारियां है, लेकिन वो दे नहीं रहे हैं। आरोप यह भी है कि थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बावजूद आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।

दूसरी ओर, सरकारी वकील ने कहा कि इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी नहीं की जा सकती क्योंकि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि कॉर्पस और उसकी बेटी किसी निजी प्रतिवादी के अवैध कारावास में हैं। यह भी प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्ता ने पार्टी प्रतिवादी के रूप में किसी भी संदिग्ध को फंसाया नहीं है।

न्यायालय की टिप्पणियां

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में विवाद इस बात को लेकर था कि क्या लापता व्यक्ति के संबंध में किसी अज्ञात अपहरणकर्ता के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण का रिट जारी किया जा सकता है?

शुरुआत में, कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण के रिट के तहत मौलिक अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा तभी की जानी चाहिए, जब राज्य या किसी निजी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखा गया हो।

इस बात पर बल देते हुए कि ऐसे मामलों में अवैध हिरासत होनी चाहिए या कम से कम संदेह के संबंध में कुछ पुष्ट आधार होने चाहिए, न्यायालय ने आगे कहा,

" इस तरह के किसी भी तर्क की अनुपस्थिति में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण एक आदेश की प्रकृति में एक रिट है जो उस व्यक्ति को बुलाती है, जिसने दूसरे को हिरासत में लिया है कि वह बाद वाले को पेश करे; न्यायालय को यह बताने के लिए कि उसे किस आधार पर बंद किया गया है और कारावास के लिए कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र नहीं होने पर उसे मुक्त करने के लिए कहती है।"

अंत में, सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला, "केवल यह दावा कि कुछ अज्ञात बदमाशों द्वारा कॉर्पस का अपहरण कर लिया गया है, बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी करने के लिए इस न्यायालय के असाधारण अधिकार क्षेत्र को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।"

याचिका को तदनुसार खारिज कर दिया गया था, हालांकि, इस न्यायालय ने प्रतिवादियों / पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे लापता व्यक्ति की रिपोर्ट के अनुसार जांच को उसके तार्किक अंत तक यथासंभव शीघ्रता से लाएं।

संबंधित समाचारों में, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि लापता व्यक्ति के मामले बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (अवैध हिरासत के मजबूत संदेह के बिना) के दायरे में नहीं आएंगे, लेकिन ऐसे मामलों को भारतीय दंड संहिता के नियमित प्रावधानों के तहत दर्ज करने की आवश्यकता है।

केस का शीर्षक - श्रीमती छाया गुर्जर बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य

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