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अनुच्छेद 350A का प्रयोग पाठ्यक्रम में किसी विश‌िष्ट भाषा को शामिल करने के लिए नहीं किया जा सकता, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उर्दू को स्कूली श‌िक्षा में शामिल करने की याचिका रद्द की

LiveLaw News Network
20 Jun 2020 8:34 AM GMT
Writ Of Habeas Corpus Will Not Lie When Adoptive Mother Seeks Child
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार उर्दू भाषा को एक विषय के रूप में स्कूली श‌िक्षा में शामिल करना सुनिश्चित नहीं कर रही है, क्योंकि लाखों भारतीयों की भाषा उर्दू है और उर्दू को आधिकारिक रूप से भारत की क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई है। याचिका में सभी स्कूलों में बारहवीं कक्षा तक के लिए उर्दू को अनिवार्य विषय बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

डिवीजन बेंच ने नोट किया कि अनुच्छेद 350A (प्राथमिक चरण में मातृभाषा में निर्देश के लिए सुविधाएं) संविधान (7 वां संशोधन) अधिनियम, 1956 के जर‌िए संविधान के अध्याय IV में डाला गया है, जिसमें 'विशेष निर्देश' शामिल किए गए थे।

न्यायालय ने कहा, "यह अनुच्छेद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों में से एक को लागू करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, ताकि राज्यों के पुनर्गठन के बाद भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा हो सके"।

कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 350A का उद्देश्य है कि राज्य की ओर से भाषाई अल्पसंख्यक समूहों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करने का प्रयास किया जाए।

"इसका मतलब है कि अनुच्छेद 350A कहता है कि विशिष्ट भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में निर्देश दिए जाते हैं। इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 350A का मकसद विशिष्ट भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को उन्हीं की मातृभाषा में ‌शिक्षा प्रदान कर कौशल का विकास करना है। यदि उनकी मातृभाषा में श‌िक्षा दी जाती है, तो यह उनके लिए अधिक ग्रहणशील होगा। उक्‍त अनुच्छेद यह निर्देश नहीं देता है कि प्राथमिक शिक्षा विशिष्ट भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों की मातृभाषा में दी जाए।

बेंच ने कहा, "इसका मतलब है कि यह अनुच्छेद 'निर्देश', न कि 'शिक्षा', शब्द को शामिल कर, अपने इरादे को सीमित करता है।"

अदालत को यह स्पष्ट था कि अनुच्छेद 350A के तहत किया गया प्रावधान, जिसे 'विशेष निर्देशों' के अध्याय में शामिल किया गया है, केवल राज्य के पुनर्गठन के बाद भाषाई अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा करने के लिए है। इसका इस्तेमाल इसे अनिवार्य बनाने, किसी भी विशिष्ट पाठ्यक्रम में किसी विशिष्ट भाषा को शामिल करने के लिए नहीं किया जा सकता है, अन्यथा संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य विफल हो जाएंगे।

कोर्ट ने कहा, "यह याचिकाकर्ता की ओर से पेश रिकॉर्ड, यानी अनुबंध 'ए' और 'बी', से स्पष्ट है कि उर्दू भाषा के शिक्षकों के लिए लोक शिक्षण संचालनालय, मध्य प्रदेश की ओर से विशिष्ट पदों को अनुमोदित किया गया है। इसका मतलब है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 350A के संबंध में सरकार की ओर से पहले से ही पर्याप्त प्रयास किए गए हैं और इस तरह से, अनुच्छेद 350A की अनिवार्यता और भावना को ध्यान में रखा गया है।

पीठ ने कहा कि संविधान क्षण‌िक कानूनी दस्तावेज नहीं है...। इसलिए, व्याख्या के लिए कठोर शाब्दिक दृष्टिकोण के बजाय उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

"...संवैधानिक प्रावधान को संकीर्ण और सीमित अर्थों में नहीं बल्कि व्यापक और उदार अर्थों में समझा जाना चाहिए। संविधान की प्रस्तावना ने बदलती हुई परिस्थितियों और उद्देश्यों के पूर्वानुमान और और उन्हें ध्यान में रखने का रास्ता दिया है ताकि संवैधानिक प्रावधान जीर्ण न हो जाए, बल्‍कि नई उभरती समस्याओं के लिए पर्याप्त रूप से लचीला हों। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि संविधान का उदार और उद्देश्यपूर्ण निर्माण प्रस्तावना का मूल उद्देश्य है।

पीठ ने कहा कि चूंकि संविधान का अनुच्छेद 350A भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के हितों की रक्षा करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 19 में शामिल नहीं है, इसलिए, अनुच्छेद 19 का लाभक को मौजूदा मामले तक नहीं बढ़ाया जा सकता है।

इस बिंदु पर, फैसले में अनुच्छेद 39 (f) का उल्लेख किया गया - "कि बच्चों को स्वस्थ तरीके से और स्वतंत्रता और गरिमा की स्थिति में विकसित होने के लिए अवसर और सुविधाएं दी जाती हैं और बचपन और युवाओं को शोषण के खिलाफ और नैतिक और भौतिक परित्याग के खिलाफ संरक्षित किया जाता है।"

अनुच्छेद 21A, जो शिक्षा के अधिकार की बात करता है, छह से चौदह वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करता है, बच्चों को नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, अनुच्छेद 21-ए के तहत परिकल्पित कानून का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें किए गए प्रावधान निर्देशक सिद्धांत हैं और उपरोक्त अधिनियम की सुरक्षा के लिए संबंधित अधिनियम बनाया गया है।

"यहां दिए गए कारणों और चर्चा के कारण, हमारा मानना है कि याचिका में न तो बोनाफाइड कारण शामिल हैं और न ही संविधान के उद्देश्य के अनुसार है। इसलिए इसे रद्द किया जाता है।"

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