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जिस आर्बिट्रल अवार्ड में एनएचए के तहत अधिग्रहित भूमि पर वैधानिक मुआवजा नहीं दिया गया, वह विकृत: मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
4 May 2022 9:50 AM GMT
जिस आर्बिट्रल अवार्ड में एनएचए के तहत अधिग्रहित भूमि पर वैधानिक मुआवजा नहीं दिया गया, वह विकृत: मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने माना है कि एक मध्यस्थ निर्णय जो राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत अधिग्रहित भूमि के संबंध में अनिवार्य वैधानिक मुआवजे के भुगतान का प्रावधान नहीं करता है, विकृत है।

जस्टिस पीटी आशा ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले मध्यस्थ को यह सुनिश्चित करने में अधिक सतर्क रहना होगा कि मध्यस्थ निर्णय उचित हो और भूमि मालिक को उसके कानूनी अधिकार के अनुसार पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।

न्यायालय ने जिला जज के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने मध्यस्थ निर्णय को रद्द कर दिया था और सक्षम प्राधिकारी को कानून के तहत प्रदान किए गए अनुसार भूमि मालिक को मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया था।

राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत एक निर्दिष्ट भूमि का अधिग्रहण किया गया था और पहले प्रतिवादी/भूमि मालिक टी पलानीसामी को मुआवजा दिया गया था।इसके बाद, कुछ विवाद उत्पन्न हुए जिन्हें मध्यस्थता के लिए संदर्भित किया गया था।

प्रथम प्रतिवादी ने मुआवजे में वृद्धि की मांग करते हुए और अधिग्रहित कुछ भवनों के संबंध में मुआवजे का भुगतान न करने के लिए दावे किए। जिसके बाद विशेष जिला राजस्व अधिकारी द्वारा दिए गए मुआवजे को संशोधित किया गया और मध्यस्थ सह जिला कलेक्टर ने संशोधित मुआवजे की पुष्टि की।

प्रथम प्रतिवादी/भूमि मालिक ने मध्यस्थ सह जिला कलेक्टर द्वारा पारित अवॉर्ड को रद्द करने के लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत एक याचिका दायर की और सक्षम प्राधिकारी को प्रथम प्रतिवादी/भूमि स्वामी को उपलब्ध वैधानिक लाभों को मंजूरी देने का निर्देश दिया। ए एंड सी एक्ट की धारा 34 के तहत याचिका को अनुमति दी गई और प्रधान जिला न्यायाधीश ने मध्यस्थ निर्णय को रद्द कर दिया। जिला जज ने एक आदेश पारित किया जिसमें सक्षम अधिकारियों को पहले प्रतिवादी को अतिरिक्त बाजार मूल्य के साथ छूट और ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

अपीलकर्ता परियोजना निदेशक, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष ए एंड सी एक्ट की धारा 37 के तहत जिल जज आदेश के खिलाफ अपील दायर की।

अपीलकर्ता NHAI ने मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया कि ए एंड सी एक्ट की धारा 34 के प्रावधानों के तहत, न्यायालय की शक्ति प्रतिबंधित है और न्यायालय के पास मध्यस्थ द्वारा पारित अवॉर्ड को संशोधित करने या बदलने की शक्ति नहीं है। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि न्यायालय केवल ए एंड सी एक्ट की धारा 34 (2) में निर्धारित आधार पर अवॉर्ड को रद्द कर सकता है।

प्रथम प्रतिवादी/भूमि के मालिक ने प्रस्तुत किया कि सोलैटियम का अवॉर्ड एक वैधानिक अधिकार है और मध्यस्थ द्वारा इसके इनकार को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। प्रथम प्रतिवादी ने तर्क दिया कि प्रधान जिला जज ने मध्यस्थ द्वारा पारित अवॉर्ड को रद्द नहीं किया, बल्कि केवल उस राहत को शामिल करने के लिए संशोधित किया जिसका पहला प्रतिवादी वैधानिक रूप से हकदार था। इस प्रकार, प्रथम प्रतिवादी ने कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष ए एंड सी एक्ट की धारा 37 के तहत कोई अपील नहीं हो सकती है।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 23(1-ए) में प्रावधान है कि न्यायालय भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अर्जित भूमि पर 12% का अतिरिक्त बाजार मूल्य प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, धारा 23 (2) में प्रावधान है कि अधिग्रहण की अनिवार्य प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ऐसे बाजार मूल्य पर 30% की राशि प्रदान करेगा। धारा 28 के प्रावधान में भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत निर्दिष्ट अतिरिक्त मुआवजे पर 15% की दर से ब्याज का प्रावधान है।

राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3 जे में प्रावधान है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 में कुछ भी राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिग्रहण पर लागू नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम तरसेम सिंह और अन्य (2019) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3 जे के प्रावधान असंवैधानिक हैं क्योंकि यह धारा 23(1-ए), धारा 23 (2) से संबंधित है और भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 28 के नियम से संबंध‌ित है।

हाईकोर्ट ने पाया कि पहला प्रतिवादी/भूमि मालिक मुआवजे की राशि से दुखी नहीं था, लेकिन भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत देय वैधानिक मुआवजे को देने में चूक से व्यथित था, जिसमें 12% पर अतिरिक्त बाजार मूल्य, 30% पर सोलेटियम शामिल था।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नारायण दास जैन बनाम आगरा नगर महापालिका (1991) के मामले में फैसला सुनाया था कि कोर्ट के पास सोलेटियम नहीं देने का कोई विवेक नहीं है और यह स्वचालित रूप से अधिग्रहित भूमि के बाजार मूल्य का अनुसरण करता है।

हाईकोर्ट ने इस प्रकार माना कि अतिरिक्त बाजार मूल्य 12%, सोलेटियम 30% और ब्याज अवॉर्ड का एक अभिन्न अंग है, जिसे भूमि मालिक द्वारा उसे भुगतान करने के लिए अनुरोध करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उक्त राशि को आर्बिट्रेटर द्वारा भूमि मालिक को देने के लिए छोड़ दिया गया है और प्रधान जिला न्यायाधीश द्वारा ए एंड सी एक्ट की धारा 34 के तहत दायर याचिका में चूक को ठीक कर दिया गया है।

कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत मध्यस्थता की कार्यवाही पार्टियों के बीच आम सहमति से नहीं की जाती है, लेकिन यह एक भूमि मालिक पर थोपी गई व्यवस्था है। न्यायालय ने कहा कि एक भूमि मालिक के मामले में जिसकी भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिग्रहित की गई है और मध्यस्थ मुआवजे के भुगतान के लिए आदेश पारित करने में विफल रहता है, भूमि मालिक के पास धारा 34 याचिका के जरिए अवॉर्ड को सही करने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा है।

"एक भूमि मालिक जिसकी भूमि भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अधिग्रहित की गई है, उस कार्यवाही में चूक को सुधारा जा सकता है जो वह भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा पारित निर्णय के खिलाफ या अपीलीय न्यायालय में आगे की अपील में सिविल कोर्ट में फाइल करता है।

हालांकि, एक भूमि मालिक के मामले में जिसकी भूमि एनएच अधिनियम के तहत अधिग्रहित की गई है और मध्यस्थ सोलैटियम आदि के भुगतान के लिए एक आदेश पारित करने में विफल रहता है, उसके पास धारा 34 याचिका में निर्णय को सही करने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा है।"

न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले एक मध्यस्थ को यह सुनिश्चित करने में अधिक सतर्क रहना होगा कि अवॉर्ड उचित हो और व्यक्ति को उसके कानूनी अधिकार के अनुसार पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।

कोर्ट ने दोहराया कि सोलेटियम का भुगतान अनिवार्य है और यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम तरसेम सिंह अन्य (2019) के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार भूमि मालिक द्वारा एक विशिष्ट याचिका या सबूत के अभाव में भी देय है।

न्यायालय ने इस प्रकार माना कि प्रथम प्रतिवादी/भूमि मालिक भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 23(1-ए), धारा 23(2) और धारा 28 के प्रावधान के लाभों का हकदार था।

कोर्ट ने कहा कि डायना टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम क्रॉम्पटन ग्रीव्स लिमिटेड (2019) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार, मध्यस्थ अवॉर्डों में आकस्मिक तरीके से हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि न्यायालय इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता कि निर्णय मामले की जड़ तक जाता है और वैकल्पिक व्याख्या की कोई संभावना नहीं है जो मध्यस्थ अवॉर्ड को बनाए रख सके। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर द्वारा पारित आर्बिट्रेशन अवार्ड इस बात में विकृत था कि भूमि मालिक को अनिवार्य मुआवजे की राशि प्रदान नहीं की गई थी।

अदालत ने इस प्रकार माना कि प्रधान जिला न्यायालय द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था।

इस तरह कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

केस शीर्षक: परियोजना निदेशक (एलए), एनएचएआई बनाम टी पलानीसामी और अन्य


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