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चेक बाउंस मामलों में अपील सीआरपीसी की धारा 378 (4) के तहत केवल हाईकोर्ट के समक्ष दायर की जा सकती हैः मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का फैसला

LiveLaw News Network
29 May 2020 5:00 AM GMT
चेक बाउंस मामलों में अपील सीआरपीसी की धारा 378 (4) के तहत केवल हाईकोर्ट के समक्ष दायर की जा सकती हैः मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का फैसला
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मद्रास हाईकोर्ट ने माना है कि चेक बाउंस मामले में अभियुक्तों को बरी होने के खिलाफ अपील केवल सीआरपीसी की धारा 378 (4) के तहत हाईकोर्ट के समक्ष दायर की जा सकती है।

हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ, जिसमें जस्टिस एमएम सुंदरेश, वी भारतीदासन और एन आनंद वेंकटेश शामिल थे, ने कहा कि एस गणपति बनाम एन सेंथिलवेल ((2016) 4 सीटीसी 119) मामले में एक अन्य पूर्ण पीठ का निर्णय कानून के अनुरूप नहीं है।

बेंच ने कहा-

"मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ ‌शिकायत होने पर हाईकोर्ट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 378 (4) के तहत ही अपील होगी। ऐसे मामलों में, शिकायतकर्ता को धारा 378 (5) सीआरपीसी के तहत विशेष छूट की मांग करनी होगी। एस गणपति मामले में दिया गया निर्णय कानून सम्‍मत नहीं है, क्योंकि यह निर्णय दामोदर एस प्रभु और सुभाष चंद में बाध्यकारी प्राधिकरण के संदर्भ के बिना लिया गया है। "

एस गणपति मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 का प्रयोग करके बरी के आदेश के खिलाफ शिकायत की अपील सेशन कोर्ट के समक्ष की जा सकती है।

इस दृष्टिकोण की शुद्धता पर संदेह करते हुए, एक एकल पीठ ने मुद्दे को बड़ी पीठ को संदर्भित कर दिया कि क्या मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए बरी के आदेश के खिलाफ ‌शिकायत दिया गया उपाय अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के तहत है या आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 378 (4) के तहत है?

पीठ ने दामोदर एस प्रभु बनाम सैयद बाबालाल एच (2010) 5 सुप्रीम कोर्ट केस 663) [सुभाष चंद बनाम राज्य (दिल्ली प्रशासन)] 2013 2 SCC 17 और मल्लिकार्जुन कोडागली (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रतिनिधित्व बनाम कर्नाटक राज्य ((2019) 2 सुप्रीम कोर्ट केस 752) के मामलो में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को देखा और कहा कि एस गणपति मामले में दिया गया निर्णय कानून के अनुरूप नहीं है ।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बीच की अवधि में सत्र न्यायालय द्वारा तय किए गए मामलों पर इस फैसले का क्या प्रभाव पड़ा?

(एस गणपति मामले में पूर्ण पीठ के निर्णय के बाद रजिस्ट्री ने सभी लंबित अपीलों को सत्र न्यायालय को स्थानांतरित कर दिया था।)

-इस अदालत के समक्ष लंबित एक अपील, जिसे एस गणपति (सुप्रा) के अनुसार सत्र न्यायालय को भेजा गया और वह लंबित है, उसे वापस हाईकोर्ट की फाइल में स्थानांतरित किया जाना चाहिए और हाईकोर्ट के समक्ष लंबित माना जाना चाहिए। उन मामलों के लिए पर भी यह आदेश लागू होगा, जिनमें सत्र न्यायालय के समक्ष मूल अपील दायर की गई थी और लंबित है।

- ऐसे मामलों में, जहां सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट द्वारा पारित बरी के आदेश की पुष्टि की है और शिकायतकर्ता द्वारा इस न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की गई है और वह लंबित है, सत्र न्यायालय के आदेश की अवहेलना होनी चाहिए और इस कोर्ट के समक्ष दायर संशोधन याचिका को सीआरपीसी की धारा 401 (5) के आधार पर अपील माना जाना चाहिए। उन पुनरीक्षण याचिकाओं को रजिस्ट्री द्वारा क्रिमिनल अपीलों के रूप में दर्ज किया चाहिए।

-ऐसे मामलों में, जहां, सत्र न्यायालय द्वारा बरी करने के आदेश की पुष्टि की गई है और यह फाइनल नहीं हुआ है या पक्षकारों द्वारा कार्रवाई नहीं की गई है और शिकायतकर्ता इसे चुनौती देना चाहता है, वह इस अदालत के समक्ष, मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ, सत्र न्यायालय द्वारा पारित आदेश की अवहेलना कर, अपील दायर करने के लिए निर्धारित सीमा अवधि के भीतर और जिसकी गणना उस तारीख से की जाएगी जिस दिन सत्र न्यायालय का आदेश तैयार किया गया था, एक आपराधिक अपील दायर करेगा। ऐसे मामलों में, शिकायतकर्ता को सीआरपीसी की धारा 378 (5) के तहत विशेष छूट की मांग करनी होती है।

-ऐसे मामलों में, जहां सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट द्वारा पारित बरी के आदेश को उलट दिया है और उसी को आरोपी द्वारा इस अदालत के समक्ष पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है और वही लंबित है, उसी को अपील के रूप में लंबित माना जाना चाहिए। उन सभी मामलों में, शिकायतकर्ता को एक याचिका दायर करनी होगी और रजिस्ट्री को शिकायतकर्ता को अपीलकर्ता और अभियुक्त को प्रतिवादी के रूप में दिखाकर आपराधिक अपील के रूप में परिवर्तित करना होगा।

-ऐसे मामलों में, जहां सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए बरी के आदेश को पलट दिया है और अभियुक्तों को दोषी ठहराया है और यह आदेश फाइनल नहीं हुआ है या उस पर कार्रवाई नहीं की गई है, आरोपी व्यक्ति को उक्त आदेश को चुनौती देते हुए इस पूर्ण पीठ के फैसले के हवाले का हवाला देते हुए न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण दायर करना होगा।

जस्टिस आनंद वेंकटेश ने मिलताजुलता फैसला सुनाया और कहा कि 13 हाईकोर्टों ने माना है कि शिकायतकर्ता सीआरपीसी की धारा 378 (4) के तहत हाईकोर्ट के समक्ष बरी के के आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकता है।

केस टाइटल: के राजलिंगम बनाम आर सुगांतलक्ष्मी

केस नं: Crimanal Appeal Nos.89 and 90 of 2020

कोरम: जस्टिस एमएम सुंदरेश, वी भारतीदासन और एन आनंद वेंकटेश

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