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एफआईआर दर्ज होने पर स्वतः रूप से गिरफ्तारी का मामला : आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट से रिमांड के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगा

LiveLaw News Network
13 Nov 2020 4:30 AM GMT
एफआईआर दर्ज होने पर स्वतः रूप से गिरफ्तारी का मामला : आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट से रिमांड के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगा
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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एफआईआर दर्ज करने के बाद स्वतः रूप से गिरफ्तारी करने और सीआरपीसी की धारा 41ए (पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थिति का नोटिस) के तहत गिरफ्तारी के समय अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों की अनदेखी करने के मामले में पुलिस विभाग की खिंचाई की है। न्यायालय ने न्यायिक मजिस्ट्रेट से भी कहा है कि वह बताएं कि उन्होंने किस आधार पर गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को रिमांड पर भेज दिया और कैसे इस तरह के मामले में डिटेंशन को अधिकृत किया?

न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती की एकल पीठ ने आदेश दिया कि,

"माननीय शीर्ष न्यायालय द्वारा स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद, पुलिस के कुछ अधिकारी बिना उचित जांच के शिकायत दर्ज करने के तुरंत बाद, अंधाधुंध गिरफ्तारी कर रहे हैं।

वर्तमान मामले में, प्रथम दृष्टया इस न्यायालय का विचार है कि रिमांड रिपोर्ट में दिए गए कारण माननीय शीर्ष न्यायालय द्वारा अर्नेश कुमार के मामले में जारी किए गए दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। इसलिए, यह अदालत मजिस्ट्रेट से रिकॉर्ड के साथ एक रिपोर्ट मंगवाना चाहेगी ताकि यह पता चल सकें कि कैसे सीआरपीसी की धारा 41ए की विवेचना की गई और आरोपी को रिमांड पर भेज दिया गया था।''

कोर्ट याचिकाकर्ता की कथित मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता तेलुगु देश पार्टी का एक सदस्य है,जो अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी, घृणा और खराब-इच्छाशक्ति को बढ़ावा देने के लिए फेसबुक पर कुछ सामग्री पोस्ट करता है।

याचिकाकर्ता की तरफ से दलील दी गई कि उस पर लगाए गए आरोपों के लिए आवश्यक सामग्री पूरी नहीं थी। उसने यह भी बताया कि उसे सीआरपीसी की धारा 41 ए के तहत बिना किसी नोटिस के गिरफ्तार किया गया था।

अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, (2014) 8 एससीसी 273 मामले का भी हवाला दिया गया। जहां यह स्पष्ट रूप से आयोजित किया गया था कि सभी मामलों में जहां सीआरपीसी की धारा 41 (1)के तहत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है, पुलिस अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह आरोपी को एक निर्दिष्ट स्थान और समय पर उसके सामने पेश होने के लिए निर्देश जारी करें। कानून ऐसे आरोपी को पुलिस अधिकारी के सामने पेश करने के लिए बाध्य करता है और यह आगे कहता है कि यदि ऐसा कोई आरोपी नोटिस की शर्तों का अनुपालन करता है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, अन्यया वह कारण रिकॉर्ड किए जाएंगे,जिनके चलते पुलिस अधिकारी की यह राय न बनी हो कि गिरफ्तारी जरूरी है।

इस निर्णय के आलोक में, न्यायमूर्ति कन्नेगंती ने कहा कि,

"यदि पुलिस अधिकारी धारा 41-ए के तहत नोटिस के अनुसार काम कर रहा है और आरोपी को गिरफ्तार कर रहा है तो उसे विधिवत भरी हुई चेक सूची को अग्रेषित करना होगा और पुलिस के समक्ष अभियुक्त को पेश करते समय गिरफ्तारी को आवश्यक बनाने वाली सामग्री के साथ इसके कारणों को भी प्रस्तुत करना होगा। तत्पश्चात डिटेंशन को अधिकृत करते समय मजिस्ट्रेट को भी कारणों को दर्ज करना करेगा और निर्देशों का पालन करने में विफल होने पर संबंधित पुलिस अधिकारी विभागीय कार्रवाई के अलावा हाईकोर्ट के समक्ष शुरू की जाने वाली न्यायालय की अवमानना के लिए भी उत्तरदायी होगा। यहां तक कि मजिस्ट्रेट भी हाईकोर्ट द्वारा की जाने वाली विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होगा।''

वर्तमान मामले में, न्यायालय ने पाया कि आरोपी को नोटिस देने की पूर्वोचित प्रक्रिया का पालन करने के लिए याचिकाकर्ता को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था और न ही कोई ऐसा रिकाॅर्ड पेश किया गया,जो यह इंगित करता हो कि क्यों इस तरह का नोटिस जारी नहीं किया गया?

इसके अलावा, यह भी नोट किया गया कि मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड आदेश में बताए गए कारण भी अर्नेश कुमार के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं थे। इस प्रकार न्यायालय ने आदेश दिया किः

''पुलिस उप-निरीक्षक, मंगलगिरी टाउन पुलिस स्टेशन, गुंटूर अर्बन को निर्देशित किया जाता है कि वह अर्नेश कुमार के मामले में माननीय शीर्ष न्यायालय द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों/ निर्देशों (आरोपी की गिरफ्तार से संबंधित) के अनुपालन में उसके द्वारा उठाए गए कदमों पर एक विस्तृत हलफनामा दायर करे। इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर यह हलफनामा रिकॉर्ड के साथ दायर किया जाए।

अतिरिक्त जूनियर सिविल जज, मंगलगिरी, गुंटूर जिला, जिन्होंने रिमांड को अधिकृत किया है, को भी इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों /निर्देशों के अनुपालन के संबंध में एक रिपोर्ट इस अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। साथ में रिकाॅर्ड भी पेश करने के लिए कहा गया है।''

सीआरपीसी की धारा 41 ए में कहा गया है कि जहां किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी धारा 41 की उप-धारा (1) के प्रावधानों के तहत आवश्यक नहीं है, पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसके खिलाफ एक उचित शिकायत की गई है या विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई है या एक उचित संदेह मौजूद है, कि उसने एक संज्ञेय अपराध किया है, इसलिए वह उनके समक्ष पेश हो या उस स्थान पर पेश हो जैसा कि नोटिस में निर्दिष्ट किया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि अर्नब गोस्वामी के मामले में उपस्थिति के नोटिस का मुद्दा उठाया गया था। गोस्वामी के वकील ने तर्क दिया था कि वर्ष 2018 के आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में रायगढ़ पुलिस ने रिपब्लिक टीवी प्रमुख को गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तारी किया था क्योंकि उन्हें 4 नवंबर की सुबह गिरफ्तार करने से पहले एक बार भी पूछताछ के लिए नहीं बुलाया गया था।

जोगिंदर कुमार बनाम यूपी राज्य, 1994 एआईआर 1349 मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया था, जिसके तहत शीर्ष अदालत ने कहा था कि जघन्य अपराधों को छोड़कर, ''गिरफ्तारी से बचना चाहिए'',यदि कोई पुलिस अधिकारी स्टेशन हाउस में उपस्थित होने के लिए व्यक्ति को नोटिस जारी करता है और बिना अनुमति के स्टेशन न छोड़ने के लिए कह देता है।

केस का शीर्षक-जांगला सांबाशिवा बनाम एपी राज्य व अन्य ।

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