'करौली शंकर बाबा' पर की गई टिप्पणियों से जुड़ी FIR में YouTuber गौतम खट्टर को मिली अंतरिम सुरक्षा
Shahadat
14 May 2026 9:31 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को YouTuber गौतम खट्टर को गिरफ़्तारी से अंतरिम सुरक्षा दी। खट्टर पर यूपी पुलिस ने 'श्री करौली शंकर महादेव बाबा' (जिन्हें 'करौली सरकार' के नाम से भी जाना जाता है) के ख़िलाफ़ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करने के आरोप में FIR दर्ज की।
खट्टर की FIR रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने सरकारी वकील को निर्देश लेने के लिए 1 हफ़्ते का समय दिया और आदेश दिया कि अगली सुनवाई की तारीख़ 19 मई तक याचिकाकर्ता को गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा।
संक्षेप में मामला
यह FIR कानपुर की रहने वाली प्रियंका द्विवेदी ने दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि खट्टर ने 'सनातन महासंघ' के स्व-घोषित संस्थापक के तौर पर काम करते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स का इस्तेमाल करके भड़काऊ और नफ़रत भरा संदेश फैलाया।
FIR में आरोप लगाया गया कि खट्टर ने 'श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन (निर्वाण), कनखल, हरिद्वार' के महामंडलेश्वर के तौर पर 'श्री श्री 1008 पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर दास जी महाराज' के 'पट्टाभिषेक' (राज्याभिषेक) का एक वीडियो अपलोड किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि खट्टर ने उनकी छवि धूमिल करने और उनके अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से अभद्र टिप्पणियां कीं।
FIR में आगे आरोप लगाया गया कि खट्टर ने बच्चों का नाम राम, श्याम और शिव जैसे देवी-देवताओं के नाम पर रखने की प्राचीन हिंदू परंपरा की आलोचना की। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जो लोग देवी-देवताओं जैसा व्यवहार करते हैं, उन्हें चौराहे पर जूतों से पीटा जाना चाहिए।
शिकायतकर्ता ने खट्टर पर महामंडलेश्वर के ख़िलाफ़ वैश्विक स्तर पर धार्मिक नफ़रत भड़काने और जनता में अशांति फैलाने का इरादा रखने का भी आरोप लगाया।
इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए कानपुर पुलिस ने खट्टर के ख़िलाफ़ BNS की धारा 299, 196, 192, 353, 45 और 302, तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया।
खट्टर की ओर से पेश होते हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने हाई कोर्ट में दलील दी कि कथित भाषण में बस इतना ही कहा गया कि किसी को भी ख़ुद को भगवान नहीं बताना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यह महज़ एक राय की अभिव्यक्ति है, जो किसी भी क़ानून के तहत कोई अपराध नहीं है। जैन ने दलील दी कि FIR को पढ़ने से ऐसा कुछ भी सामने नहीं आता, जिससे यह साबित हो सके कि खट्टर का कोई जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादा था कि वे भारत के नागरिकों के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को, चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों के माध्यम से, ठेस पहुंचाएं।
जैन ने आगे तर्क दिया कि खट्टर के बयान संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को दी गई बोलने की आज़ादी के अधिकार के तहत सुरक्षित हैं। वे अनुच्छेद 19 के खंड (2) से (6) के तहत उचित प्रतिबंधों के संदर्भ में बनाए गए किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं।
उन्होंने यह भी दलील दी कि विचाराधीन FIR में धर्म, नस्ल, जन्म स्थान, निवास या भाषा के आधार पर लोगों के दो अलग-अलग समूह शामिल नहीं हैं। इसलिए उन्होंने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि BNS की धारा 196 के अर्थ के अनुसार, भावनाओं को ठेस पहुँचाई गई या उनके बीच वैमनस्य या शत्रुता को बढ़ावा दिया गया।
अंत में यह भी दलील दी गई कि शत्रुता को बढ़ावा देने से संबंधित अपराधों को लागू करने के लिए कम-से-कम दो समूहों या समुदायों का शामिल होना ज़रूरी है। इसमें शांति और सौहार्द को भंग करने का तत्व भी होना चाहिए, जो कि इस मामले में मौजूद नहीं था।
इन दलीलों पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने AGA को निर्देश लेने के लिए 1 सप्ताह का समय दिया और यह निर्देश दिया कि इस मामले में याचिकाकर्ता को 19 मई तक गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

