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इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश, लॉकडाउन में बिना माइक्रोफोन के मस्जिदों की मिनारों से मुअज़्ज‌िन दे सकते हैं अज़ान

LiveLaw News Network
15 May 2020 12:36 PM GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश, लॉकडाउन में बिना माइक्रोफोन के मस्जिदों की मिनारों से मुअज़्ज‌िन दे सकते हैं अज़ान
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को यह कहते हुए कि अजान इस्लाम धर्म का अभिन्न अंग है, राज्य की विभिन्न मस्जिदों के मुअज़्ज़िनों को लॉकडाउन में भी अज़ान की इजाज़त दे दी। हालांकि, कोर्ट ने माइक्रोफोन के इस्तेमाल पर सख्त आपत्त‌ि की।

जस्टिस शशि कांत गुप्ता और जस्टिस अजीत कुमार की पीठ ने कहा, "अज़ान निश्चित रूप से इस्लाम का आवश्यक और अभिन्न अंग है, लेकिन अज़ान के लिए माइक्रोफोन और लाउड-स्पीकर का इस्तेमाल आवश्यक और अभिन्न अंग नहीं है।

... मुअज्ज़‌िन किसी भी प्रवर्धक उपकरण का इस्तेमाल किए बिना अपनी आवाज़ में मस्जिदों की मीनारों से को अज़ान दे सकता है और ऐसे पाठ को राज्य द्वारा COVID 19 की रोकथाम के लिए जारी दिशानिर्देशों के उल्लंघन का बहाना बनाकर रोका नहीं जा सकता है।"

उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष लॉकडाउन के दरमियान दिशा‌निर्देशों का हवाला देकर अज़ान पर रोक लगाने के कथित आदेशों के खिलाफ कई जनहित याचिकाओं और पत्र याचिकाओं दायर की गई थीं, पीठ ने उन्हीं पर सुनवाई करते हुए ये टिप्‍प‌‌ण‌ियां कीं।

याचिकाकर्ताओं में सांसद अफ़ज़ल अंसारी, पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और वरिष्ठ अधिवक्ता एस वसीम ए कादरी शामिल थे, उन्होंने ध्वनि-प्रवर्धक उपकरणों का इस्तेमाल करके मुअज्ज़‌िन के जर‌िए अज़ान दिए जान की अनुमति मांगी थी।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रशासन द्वारा अज़ान पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से "मनमाना और असंवैधानिक" है।

उनकी दलील थी कि, ध्वनि-प्रवर्धक यंत्रों के जर‌िए अज़ान पर प्रतिबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दिए गए एक मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि अज़ान एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि "समागम की प्रथा नहीं है", बल्‍कि यह केवल एक व्यक्ति द्वारा किया गया सस्वर पाठ है, जिसके जर‌िए एक आस्तिकों को सूचना दी जाती है कि वे अपेन घरों पर नमाज अदा करें, इसलिए लॉकडाउन की शर्तों का उल्लंघन नहीं करता है।

याचिकाकर्ताओं ने आगे कहा कि अधिकांश मामलों में अज़ान एक व्यक्ति देता है, जो आमतौर पर मस्जिद में ही रहता है और उसकी देखभाल करता है। अन्य मामलों में, अज़ान देने की जिम्‍मेदारी मस्जिद के नज़दीक रहने वाले व्यक्ति को सौंपी जाती है। इसलिए, दोनों मामलों में मस्जिद में अज़ान पढ़ रहा व्यक्ति लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन नहीं करता है।

सीनियर एडवाकेट सलमान खुर्शीद ने अदालत को बताया कि फर्रुखाबाद की कई मस्जिदों के दरवाजों पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने "अहस्ताक्षरित नोटिस" चिपका दिए हैं। जिला प्रशासन से की गई सभी अपीलें निरर्थक रही हैं।

राज्य की दलील

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने दलील दी कि अज़ान, मस्जिद में नमाज़ अदा करने के लिए भीड़ जुटाने का आह्वान है और इसलिए यह महामारी को रोकने के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।

राज्य सरकार ने कहा,

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दिए गए अधिकार, सार्वजनिक आदेश, नैतिकता, स्वास्थ्य और भारत के संविधान के भाग III के अधीन है।"

उत्तर प्रदेश सरकार ने मस्जिद के दरवाजों पर अहस्ताक्षरित नोटिस चिपकाने के आरोपों का खंडन किया और कहा कि 24 मार्च, 2020 के बाद से म‌‌स्जिदों में स्वेच्छा से अज़ान नहीं दी जा रही है, इसलिए, ऐसा कोई मौका ही नहीं आया, कि ऐसे आदेश या निर्देश जारी किए जाएं।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अज़ान ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के नियम 5 के ख़‌िलाफ़, जिसमें कहा गया है कि प्राधिकरण की लिखित अनुमति के बिना लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि प्रवर्धक प्रणाली का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

नतीजे

अदालत ने दो सवालों के जवाब देकर अपना फैसला सुनाया,

(1) क्या ध्वनि-प्रवर्धित यंत्रों के जर‌िए दी जाने वाली अज़ान पर प्रतिबंध लगाने के लिए जारी किया गया कोई भी आदेश, संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है?

चर्च ऑफ गॉड (फुल गॉस्पेल) ऑफ इंडिया बनाम केकेआर मैजेस्टिक, (2000) 7 एससीसी 282 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा, अज़ान इस्लाम का अभिन्न अंग है, यह उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

हाईकोर्ट ने कहा, "अज़ान इस्लाम का एक अनिवार्य और अभिन्न अंग हो सकता है मगर लाउड-स्पीकर या अन्य ध्वनि प्रवर्धक यंत्रों के जर‌िए अज़ान देना धर्म का अभिन्न अंग नहीं कहा जा सकता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकार के जर‌िए संरक्षित किय जाए, बल्‍कि यह सार्वजनिक आदेश, नैतिकता या स्वास्थ्य और भारत के संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन है।

इस प्रकार, यह नहीं कहा जा सकता है कि एक नागरिक को ऐसा कुछ भी सुनने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए जो उसे पसंद नहीं है या जिसकी उसे आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अन्य व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को छीनने के बराबर है।"

मौलाना मुफ्ती सैयद मोहम्मद नूरुर रहमान बरकती और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य MANU/WB/ 0211/1998 के मामले में अज़ान देने के लिए ध्वनि प्रवर्धक यंत्रों का इस्तेमाल किए जाने के मुद्दे पर फैसला देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने ऐसी ही‌ ‌टिप्पणी की थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा ‌था कि पैगंबर मुहम्मद के जमाने में माइक्रोफोन मौजूद नहीं थे, बल्कि यह मौजूदा तकनीकी युग की देन है। इसलिए यह माना गया कि माइक्रोफोन के जर‌िए अज़ान देना आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने कहा था,

"यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि अतीत में जब लाउड-स्पीकर का आविष्कार नहीं किया गया था, अज़ान मनुष्य की आवाज़ में ही दी जाती थी। माइक्रोफोन का इस्तेमाल पैगंबर या उनके प्रमुख शिष्यों ने नहीं शुरु किया गया, क्योंकि तब यह था नहीं। इसका प्रयोग किसी और ने विकसित किया थायह नहीं कहा जा सकता है कि इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि माइक्रोफोन और लाउड-स्पीकर का उपयोग अज़ान का आवश्यक और अभिन्न अंग है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि ध्वनि प्रदूषण नियमों के अनुसार, अधिकारियों की अपेक्षित अनुमति के बिना लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जा सकता है।

(2) क्या मुअज़्ज‌िन/ अधिकृत व्यक्ति द्वारा अज़ान देना COVID 19 की रोकथाम के लिए जारी किए गए आदेश का उल्लंघन है?

कोर्ट ने कहा कि सरकार यह नहीं बता पाई कि मनुष्य की अवाज़ के जर‌िए दी गई अज़ान से कैसे कानून के किसी प्रावधान या COVID 19 के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ताओं की दलील उचित है कि एक व्यक्ति द्वारा दी गई अज़ान लॉकडाउन के निर्देशों का उल्लंघन नहीं करता है।

"हम यह समझने में विफल हैं कि मस्जिद में मुअज्ज‌िन/ इमाम या किसी अन्य अधिकृत व्यक्ति द्वारा, किसी भी प्रवर्धित यंत्र का उपयोग किए बिना मानवीय आवाज़ में दी गई अज़ान कैसे...किसी भी दिशा-निर्देश का उल्लंघन कर सकती है।"

कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुअज्‍़ज‌िन मस्जिदों की मीनारों से, बिना प्रवर्धक यंत्रों का इस्तेमाल किए बिना, अज़ान दे सकता है।

मामले का विवरण:

केस टाइटल: अफ़ज़ल अंसारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य।

केस नं : PIL No. 570/2020

कोरम : जस्टिस शशि कांत गुप्ता और जस्टिस अजीत कुमार

प्रतिनिधित्व : एडवोकेट सैयद सफदर अली काज़मी और फ़ज़ल हसनैन (याचिकाकर्ताओं के लिए); एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल (राज्य के लिए)

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