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[167[(2)CrPC] एक ही अपराध में दो बार हिरासत में रह चुका अभियुक्त, हिरासत की दोनों अवधियों को जोड़कर "डिफ़ॉल्ट जमानत" का दावा कर सकता है

LiveLaw News Network
6 May 2020 9:10 AM GMT
[167[(2)CrPC] एक ही अपराध में दो बार हिरासत में रह चुका अभियुक्त, हिरासत की दोनों अवधियों को जोड़कर डिफ़ॉल्ट जमानत का दावा कर सकता है
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केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार को विचार किया कि क्या एक अभियुक्त, जिसे एक ही अपराध के लिए दो बार हिरासत में रखा जा चुका है, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 की उप-धारा (2) के प्रावधान (ए) (i) के तहत, दोनों बार की हिरासत अवधि को जोड़कर "डिफ़ॉल्ट जमानत" का दावा करने का हकदार है?

जस्टिस सीएस डायस ने कहा,

"... अगर ऐसी व्याख्या की अनुमति दी जाती है, संहिता की धारा 167 की उप-धारा (2) के प्रावधान के तहत वैधानिक समयावधि की समाप्ति से पहले, यदि एक और जांच एजेंसी को अपराध की जांच सौंपी जाती है , कोड की धारा 167 मृतप्राय हो जाएगी, जो विधायिका का उद्देश्य नहीं है।"

कोर्ट के समक्ष यह सवाल जमानत याचिका के एक मामले में उठा है, जिसमें याचिकाकर्ता पुलिस उप-निरीक्षक है, और उसने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बताया है।

उसे शुरू में 3 जुलाई 2019 को गिरफ्तार किया गया था और 14 अगस्त 2019 को जमानत पर रिहा किया गया। वह 43 दिनों की अवधि के लिए हिरासत में रहा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया, जिसके बाद उसे 16 फरवरी 2020 को फिर से गिरफ्तार किया गया और वह न्यायिक हिरासत में रखा गया।

उसने सत्र न्यायालय के समक्ष 2 अप्रैल 2020 को जमानत की अर्जी दायर की और सीआरपीसी की धारा 167 (2) तहत 'डिफ़ॉल्ट जमानत' के लाभ का दावा किया। उसने कहा कि हिरासत की दोनों अव‌‌ध‌ियों को जोड़कर वह 90 दिनों से हिरासत में है।

याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय, एर्नाकुलम के समक्ष जमानत की अर्जी दायर की, जिसमें धारा 167 की उप-धारा (2) के प्रावधान (a)(i) का हवाला देकर "अनिवार्य / 'डिफ़ॉल्ट जमानत" की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि पहली बार वह 43 दिनों तक हिरासत में रहा, सीबीआई को जांच सौंपे जाने के बाद वह दोबारा 47 दिनों के लिए हिरासत में रहा। चूंकि स्थानीय पुलिस या सीबीआई ने 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया, इसलिए याचिकाकर्ता 'डिफ़ॉल्ट जमानत' का हकदार है।

सत्र न्यायाधीश ने 08 अप्रैल 2020 को जमानत अर्जी खारिज कर दी और कहा कि याचिकाकर्ता स्‍थानीय पुलिस की जांच के दौरान की पुलिस/न्यायिक हिरासत की अवधि को सीबीआई द्वारा की गई गिरफ्तारी के बाद की पुलिस/न्यायिक हिरासत की अवधि के साथ जोड़ नहीं सकता है। इसलिए, 'डिफ़ॉल्ट जमानत' का दावा करने के लिए 90 दिनों की वैधानिक अवधि पूरी नहीं हुई है।

जस्टिस सीएस डायस ने कहा कि 2012 में विपुल शीतल प्रसाद अग्रवाल बनाम गुजरात राज्य और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कानून की स्पष्ट घोषणा के मद्देनजर, सीबीआई द्वारा ताजा प्राथमिकी का पंजीकरण स्थानीय पुलिस या फिर क्राइम ब्रांच की पुरानी जांच की निरंतरता है।

"प्रतिवादी द्वारा जारी की जा रही जांच, पहले की जांच एजेंसियों द्वारा की गई जांच को खत्म नहीं करती है। आगे की जांच पूरी होने पर, वर्तमान जांच एजेंसी को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास आगे की रिपोर्ट भेजनी होती है, हालांकि जांच के दौरान प्राप्त अन्य सबूतों के बारे में यह एक ताजा रिपोर्ट नहीं होती है।"

जस्टिस डायस ने कहा कि प्राथमिकी को दोबारा दर्ज करना और जांच करना, जांच को आगे बढ़ाने की प्रकृति ही है, और समान रूप से, अपराध का पुनः पंजीकरण नई प्राथमिकी नहीं माना जा सकता है, जैसा कि प्रदीप राम बनाम झारखंड और अन्य (2019) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है दूसरी एफआईआर की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

"इसलिए, सत्र न्यायाधीश का यह फैसला कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी नई थी, त्रुटिपूर्ण है।"

उन्होंने कहा‌,

"मेरी राय है कि कि याचिकाकर्ता 'अनिवार्य जमानत' का दावा करने के लिए हिरासत की दो अवधियों को जोड़ने का हकदार है।"

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