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''16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की दूसरी शादी अमान्य, बाल विवाह निषेध अधिनियम लागू'' : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने लड़की को नारी निकेतन में रखने का निर्देश दिया

LiveLaw News Network
2 Jun 2021 7:45 AM GMT
16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की दूसरी शादी अमान्य, बाल विवाह निषेध अधिनियम लागू : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने लड़की को नारी निकेतन में रखने का निर्देश दिया
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कथित रूप से अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध शादी करने वाले एक कपल द्वारा दायर संरक्षण की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा किः

''(चूंकि लड़की नाबालिग है इसलिए) बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 12 में निहित निषेध लागू होता है और यह भी सही है कि मुस्लिम लड़की की दूसरी शादी अमान्य है।''

जस्टिस सुधीर मित्तल की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता नंबर 2 (मुस्लिम लड़की) की उम्र 16 साल बताई गई है और इस तरह वह नाबालिग है।

कोर्ट ने कहा, ''यह भी देखा गया है कि यह शादी (अगर इसे ऐसा माना जा सकता है) उसकी दूसरी शादी है।''

कोर्ट ने मोहम्मद शमीम के फैसले को स्वीकार करने से इनकार किया

महत्वपूर्ण रूप से, जब कपल के वकील ने मोहम्मद शमीम बनाम हरियाणा राज्य(सीआरडब्ल्यूपी संख्या 532/2018) व जकार व अन्य बनाम हरियाणा राज्य व अन्य (सीआरडब्ल्यूपी संख्या 9956/ 2020) के मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों का हवाला देने की कोशिश की तो कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि वह पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा मोहम्मद शमीम बनाम हरियाणा राज्य व अन्य के मामले में दिए गए फैसले से सहमत नहीं थी।

महत्वपूर्ण रूप से, शमीम मामले में, कोर्ट ने माना था कि मुस्लिम कानून के तहत, यौवन और व्यस्कता एक समान हैं और एक अनुमान है कि एक व्यक्ति 15 वर्ष की आयु में वयस्कता प्राप्त करता है।

उस मामले में, कोर्ट ने टिप्पणी की थी किः

''अकिल अहमद की मोहम्मडन लॉ पर लिखी पाठ्य पुस्तक के अनुसार, मुस्लिम कानून में ''यौवन और व्यस्कता'' एक ही बात है। अनुमान यह है कि जब कोई व्यक्ति 15 वर्ष की आयु में वयस्कता प्राप्त करता है, तो यह आयु यौवन की है और अभिभावक की सहमति के बिना नाबालिग का विवाह तब तक अमान्य है जब तक कि वयस्कता प्राप्त करने के बाद इसकी पुष्टि नहीं की जाती है। एक लड़का या लड़की, जिसने यौवन प्राप्त कर लिया है, उसे अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने की स्वतंत्रता है और अभिभावक को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।''

जकार के फैसले के बारे में, कोर्ट ने कहा कि यह मामला भी बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का उल्लेख नहीं करता है।

कोर्ट का आदेश

अदालत ने राज्य प्रशासन को याचिकाकर्ता नंबर 2 (मुस्लिम लड़की) को हिरासत में लेने और उसे उसके आवास के नजदीक नारी निकेतन में रखने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया है कि नारी निकेतन में रहते हुए, उसकी याचिकाकर्ता नंबर 1 (मुस्लिम लड़का) और उनके संबंधित माता-पिता/ रिश्तेदारों की उपस्थिति में काउंसलिंग की जाए।

अदालत ने कहा, ''इसकी एक रिपोर्ट सुनवाई की अगली तारीख को या उससे पहले इस अदालत को भेजी जाए। इस बीच, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को कोई नुकसान न पहुंचे।''

संबंधित समाचार में, जनवरी 2021 में, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम लड़की (17 वर्ष की आयु) को सुरक्षा प्रदान की थी, जिसने मुस्लिम व्यक्ति (36 वर्ष) से ​​विवाह किया था। कोर्ट ने माना था कि दोनों मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह योग्य आयु के हैं।

न्यायालय ने सर दिनशाह फरदुनजी मुल्ला की पुस्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ' के आर्टिकल 195 का हवाला देते हुए कहा था कि,

''याचिकाकर्ता नंबर दो 17 वर्ष से अधिक की होने के कारण अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह का अनुबंध करने के लिए सक्षम थी।''

यह ध्यान दिया जा सकता है कि 'सर दिनशाह फरदुनजी मुल्ला की पुस्तक प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ' के आर्टिकल 195 के अनुसार, स्वस्थ दिमाग का प्रत्येक मुसलमान, जिसने यौवन प्राप्त कर लिया है, विवाह के अनुबंध में प्रवेश कर सकता है और पन्द्रह वर्ष की आयु पूरी करने के बाद साक्ष्य की अनुपस्थिति में यह माना लिया जाता है कि उसने यौवन प्राप्त कर लिया है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में, लड़कियों के लिए विवाह की कानूनी आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है।

यह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 द्वारा शासित है।

हालांकि, मुस्लिम कानून के तहत शादी या निकाह एक अनुबंध है। मुस्लिम कानून वयस्कों को अपनी मर्जी से शादी करने के अधिकार को मान्यता देता है। एक वैध मुस्लिम विवाह की शर्तें निम्न हैंः

-दोनों व्यक्तियों को इस्लाम कबूल करना चाहिए

-दोनों यौवन की आयु के होने चाहिए

-एक प्रस्ताव और स्वीकृति होनी चाहिए और दो गवाह मौजूद होने चाहिए

-डोवर और मेहर

-रिश्ते की निषिद्ध डिग्री का अभाव।

यह ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हदिया मामले (शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. व अन्य) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक वयस्क महिला की शादी की पसंद की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

वर्ष 2019 में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस सवाल की जांच करने के लिए सहमति व्यक्त की थी कि क्या एक मुस्लिम नाबालिग लड़की को यौवन प्राप्त करने के बाद उसकी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की अनुमति दी जानी चाहिए?

केस का शीर्षक - साहिब व अन्य बनाम हरियाणा राज्य व अन्य

आदेश/निर्णय डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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