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यूथ बार एसोसिएशन ने देश भर में मुक़दमा-पूर्व मध्यस्थता के लिए एसओपी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की

LiveLaw News Network
17 July 2020 3:45 AM GMT
यूथ बार एसोसिएशन ने देश भर में मुक़दमा-पूर्व मध्यस्थता के लिए एसओपी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की
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यूथ बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (YBAI) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर देश भर में मुक़दमा दायर करने से पहले आवश्यक रूप से मध्यस्थता की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए दिशानिर्देश जारी करने का आग्रह किया है।

ऐसा अनुरोध अदालतों में लंबित मामलों की भीड़ से निपटने के लिए किया गया है। याचिका में कोर्ट से एसओपी बनाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है ताकि मुक़दमादारों को मुक़दमा से पहले मध्यस्थता के लिए ज़रूरी सलाह दी जा सके। ऐसा मामूली क़िस्म के मुक़दमों में कमी लाने के उद्देश्य से भी किया गया है ताकि अदालतों में मुक़दमों की भीड़ कम हो।

YBAI ने नेशनल जूडिशल डाटा ग्रिड (NJDG) से प्राप्त होने वाले आंकड़ों को उद्धृत करते हुए कहा है कि देश की अदालतों में 24 मई 2020 तक 32.45 मिलियन मामले लंबित हैं। याचिककर्ता ने कहा कि 71.06% मामले अपने 'ओरिज़िनल जूरिडिक्शन' में ही लंबित हैं और अगर स्तरवार डाटा पर ग़ौर किया जाए तो पता चलता है कि 24.2% मामले मामलों को दायर करने की स्थिति पर ही लंबित हैं।

इसके आधार पर YBAI ने कहा है कि पक्षकार अपने मामलों को आगे ले जाने के लिए पूरी तरह से कतई इच्छुक नहीं हैं। सबसे ज़्यादा लंबित मामले इसी श्रेणी के हैं जिसमें दोनों पक्ष के लोग एक-दूसर को जानते हैं। इसे देखते हुए अगर मुक़दमा से पूर्व मध्यस्थता की व्यवस्था हो तो ऐसे विवादों को अदालत में आने से पहले हल किया जा सकता है।

वैकल्पिक विवाद निपटान (एडीआर) के उद्देश्यों, जो कि सरकार के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 और नागरिक प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत आता है, के बारे में यह कहा गया है कि इन प्रावधानों को लागू करने के बाद सिविल कोर्ट्स पर यह आवश्यक ज़िम्मेदारी आ गई है कि वह एडीआर प्रक्रिया की मदद से विवाद को निपटाने की ओर पक्षकारों को ले जाएं।

कोर्ट का ध्यान उसके खुद के एक फ़ैसले (के श्रीनिवास राव बनाम डीए दीपा) की ओर खींचा गया है, जिसमें देश भर में मध्यस्थता केंद्र खोले जाने का निर्देश दिया गया था ताकि वैवाहिक विवादों को अदालत में जाने से पहले ही सुलझाने की कोशिश की जा सके। इस निर्देश के बावजूद कुल 25 हाइकोर्टों में से सिर्फ़ 3 ने ही इस पर अमल किया है।

यह भी कहा गया कि शीर्ष अदालत ने वैवाहिक विवादों को अदालत में जाने से पहले मध्यस्थता से सुलझाने के प्रति रुझान दिखाया है, लेकिन इस तरह की सेवाओं के लिए कोई व्यापक फ़्रेमवर्क नहीं है। इसे देखते हुए अदालत में मुक़दमा को ले जाने से पहले इसको सुलझाने के लिए एक मध्यस्थता मॉडल को संस्थानिक रूप देने के लिए आवश्यक निर्देश का आग्रह किया गया है।

याचिका डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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