सुप्रीम कोर्ट की मनन कुमार मिश्रा से दो टुक: आप लोकतांत्रिक रूप से चुने गए चेयरमैन नहीं, बल्कि BCI के प्रो-टेम चेयरमैन हैं
Shahadat
2 Sept 2026 2:45 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को याद दिलाया कि वह केवल प्रो-टेम (अस्थायी) चेयरमैन हैं, न कि लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पदाधिकारी। इसलिए वह केवल BCI के रोज़मर्रा के कामकाज को ही संभाल सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय लेने से पहले BCI को अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल करना होगा, जो BCI के स्थायी पदेन (ex-officio) सदस्य होते हैं।
ये टिप्पणियां उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गईं, जिनमें BCI नियमों के तहत निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय तक मिश्रा के BCI चेयरमैन बने रहने को चुनौती दी गई थी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि हालांकि नई काउंसिल के गठन तक BCI के रोज़मर्रा के कामकाज के लिए मिश्रा का बने रहना स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन उनके पद की तुलना लोकतांत्रिक रूप से चुने गए चेयरमैन से नहीं की जा सकती।
BCI का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्णकुमार से बात करते हुए जस्टिस बागची ने कहा,
"आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जब तक स्टेट बार काउंसिल में हुए चुनावों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नए चुनाव नहीं हो जाते, तब तक आप एक प्रो-टेम चेयरमैन की तरह हैं। इसलिए यह ऐसी स्थिति नहीं है, जहां वह लोकतांत्रिक रूप से चुने गए हों और बने हुए हों। उनका कार्यकाल उन चुनावों तक ही है, जो जल्द ही होने वाले हैं, क्योंकि नई बार काउंसिल का गठन होने वाला है। ऐसी स्थिति में हम आम तौर पर यह करते हैं कि रोज़मर्रा का कामकाज प्रो-टेम चेयरमैन पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब भी कोई नीतिगत निर्णय लिया जाता है तो अटॉर्नी जनरल जैसे स्थायी पदेन सदस्य को शामिल किया जाना चाहिए।"
बेंच ने आगे सुझाव दिया कि भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, जो कानूनी व्यवस्था के तहत BCI के सदस्य हैं, काउंसिल की बैठकों में भाग ले सकते हैं, जब महत्वपूर्ण नीतिगत असर वाले मामलों पर विचार किया जा रहा हो।
जस्टिस बागची ने कहा,
"उन्हें काउंसिल के रोज़मर्रा के कामकाज में शामिल होने की ज़रूरत नहीं है। हालाँकि, जब भी महत्वपूर्ण नीतिगत असर वाले किसी निर्णय पर विचार किया जाता है तो अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।"
जस्टिस बागची ने कहा कि जब तक एक चुनी हुई BCI नहीं बन जाती, तब तक रोज़मर्रा के कामकाज के लिए एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(3) के प्रावधान के तहत मिश्रा का बने रहना जारी रखा जा सकता है, लेकिन "हर पॉलिसी फ़ैसले में अटॉर्नी जनरल को शामिल करना ज़रूरी है।"
जस्टिस बागची ने साफ़ किया कि कोर्ट किसी तरह की "दिखावटी लड़ाई" को बढ़ावा नहीं दे रहा है, लेकिन संस्था की अखंडता बनाए रखने की ज़रूरत है।
जस्टिस बागची ने कहा,
"इसलिए जब तक बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) का चुनाव नहीं हो जाता, तब तक रोज़मर्रा के कामकाज के लिए धारा 4(3) के प्रावधान के तहत काम जारी रखना ठीक रहेगा, लेकिन जब पॉलिसी फ़ैसलों की बात आएगी, तो वे अटॉर्नी जनरल की मौजूदगी में ही होने चाहिए।"
सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह और गुरु कृष्ण कुमार, BCI के फ़ैसलों में AG और SG को शामिल करने के कोर्ट के सुझाव से सहमत थे।
मिश्रा के कार्यकाल को चुनौती देने वाली याचिकाएं BCI चेयरमैन से जुड़े NALSAR विवाद के बाद दायर की गई थीं। इस विवाद में उन्होंने NALSAR के ग्रेजुएट के एनरोलमेंट के ख़िलाफ़ निर्देश जारी किए, क्योंकि उन्होंने यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को गेस्ट के तौर पर बुलाने पर आपत्ति जताई थी। बाद में काफ़ी आलोचना होने पर मिश्रा ने माफ़ी मांगी थी।
बेंच ने नई स्टेट बार काउंसिलों के नोटिफिकेशन की प्रक्रिया तेज़ करने के निर्देश दिए, ताकि वे तय समय में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के लिए अपने प्रतिनिधि चुन सकें। कोर्ट के निर्देशों का मकसद जल्द से जल्द नई चुनी हुई BCI का गठन करना है। कोर्ट ने BCI की ओर से दिए गए इस आश्वासन को भी रिकॉर्ड पर लिया कि किसी भी पॉलिसी फ़ैसले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल किया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान, चंदर उदय सिंह, शोभा गुप्ता, संजय हेगड़े और गोपाल शंकरनारायणन ने दलीलें पेश कीं।


