'अगर संस्था को नुकसान हुआ है तो विचार करेंगे': सुप्रीम कोर्ट ने यतिन ओझा के अवमानना ​​मामले में आदेश सुरक्षित रखा

Shahadat

8 April 2026 11:01 AM IST

  • अगर संस्था को नुकसान हुआ है तो विचार करेंगे: सुप्रीम कोर्ट ने यतिन ओझा के अवमानना ​​मामले में आदेश सुरक्षित रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट यतिन ओझा की उस अपील पर आदेश सुरक्षित रखा, जो उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के 2020 के आदेश के खिलाफ दायर की थी। उस आदेश में उन्हें हाईकोर्ट पर न्याय प्रशासन में कुप्रबंधन के आरोप लगाने के लिए आपराधिक अवमानना ​​का दोषी ठहराया गया था।

    आदेश सुरक्षित रखते हुए जस्टिस जेके माहेश्वरी ने कहा कि कोर्ट इस घटना के वीडियो देखेगा और मामले की जांच "संस्था" (हाई कोर्ट) के नज़रिए से करेगा।

    जस्टिस माहेश्वरी ने कहा,

    "कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि नुकसान किसी व्यक्ति को हुआ है या संस्था को? अगर संस्था को नुकसान हुआ है तो हमें अलग तरीके से सोचना होगा।"

    जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल, डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल, अरविंद दातार और सी. आर्यमा सुंदरम ने ओझा के पक्ष में दलीलें दीं, जबकि सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने गुजरात हाई कोर्ट का प्रतिनिधित्व किया।

    सुनवाई के दौरान, सिब्बल ने इस मामले को खत्म करने का आग्रह किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि ओझा को काफ़ी सज़ा मिल चुकी है, क्योंकि उन्होंने 2 साल और 5 महीने तक सीनियर एडवोकेट का गाउन पहने बिना बिताए हैं। सीनियर वकील ने ज़ोर देकर कहा कि ओझा पहले ही माफ़ी मांग चुके हैं और पिछली सभी घटनाओं पर खेद व्यक्त कर चुके हैं।

    उन्होंने पूछा,

    "यह सिलसिला एक मिनट के लिए भी क्यों जारी रहना चाहिए?"

    सिंघवी ने अपनी तरफ से यह दलील दी कि ओझा को किसी न किसी मोड़ पर एक वकील के तौर पर सामान्य जीवन जीने का मौका वापस मिलना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि विरोधी पक्ष - यानी हाईकोर्ट - अपनी बात कह चुका है और उसे एक निश्चित सीमा से आगे विरोध नहीं करना चाहिए। सीनियर वकील ने विशेष रूप से ओझा के मामले में हाईकोर्ट द्वारा दायर की गई नवीनतम आपत्तियों पर सवाल उठाए, जिनमें 3 मुद्दे शामिल थे: (i) आदेश लिखवाए जाने के बाद भी बहस जारी रखना; (ii) ऐसे मामले में बहस करना जहां AoR (एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड) के पास वकालतनामा नहीं था; और (iii) किसी मामले में "फोरम शॉपिंग" (अपनी पसंद की अदालत चुनना) का आरोप लगाना।

    यह दलील दी गई कि जिस व्यवस्था का हिस्सा बार (वकील) और बेंच (जज) दोनों हैं, वहां कई बार आवेश में आकर कुछ बातें हो जाती हैं। हालांकि, कथित तौर पर अवमाननापूर्ण आचरण के लिए दी जाने वाली कोई भी सज़ा आनुपातिक होनी चाहिए। सिंघवी ने ज़ोर देकर कहा कि ओझा के ख़िलाफ़ मामला पुरानी बातों को फिर से उठाने का है, जिन पर पहले ही फ़ैसला हो चुका था और जिन्हें बंद कर दिया गया।

    हाईकोर्ट की आपत्तियों में उठाए गए 3 मुद्दों के संबंध में वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने "बेमतलब के मुद्दों" पर आपत्ति जताई है। वरिष्ठ वकील ने यह भी टिप्पणी की कि ओझा को काफ़ी अपमानित किया जा चुका है और उन्होंने बार-बार माफ़ी भी मांगी। उन्होंने आग्रह किया कि ओझा की माफ़ी सच्ची है और अब इस मामले को बंद कर देना चाहिए।

    हाईकोर्ट की ओर से हंसारिया ने ओझा के मामले में कोर्ट से उदारता दिखाने की अपील का विरोध किया। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि ओझा ने हाईकोर्ट को "जुआखाना" कहा था। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हाईकोर्ट का ओझा के ख़िलाफ़ कोई निजी द्वेष नहीं है; बल्कि, यह संस्था के सम्मान का मामला है। सीनियर वकील ने आगे एक फ़ैसले में इस्तेमाल किए गए शब्दों "थप्पड़ मारो, माफ़ी मांगो और भूल जाओ" की ओर इशारा करते हुए कहा, "थप्पड़ मारो, माफ़ी मांगो और फिर वही दोहराओ" की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

    हंसारिया द्वारा हाईकोर्ट की ओर से दलीलें पेश करने के बाद, दातार ने बेंच को वह संदर्भ समझाने की कोशिश की, जिसमें ओझा ने वे विवादित टिप्पणियां की थीं। सबसे पहले उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि 2006 और 2016 की पिछली घटनाओं से जुड़े अवमानना ​​के मामलों को पहले ही बंद कर दिया गया, क्योंकि ओझा ने माफ़ी मांग ली थी और उनकी माफ़ी स्वीकार भी कर ली गई।

    उकसावे की वजहों को समझाते हुए दातार ने कहा कि 2006 में, संबंधित जज ने बार के सदस्यों को 300 से ज़्यादा अवमानना ​​नोटिस जारी किए। हद तो तब हो गई जब एक 70 वर्षीय वकील को अवमानना ​​का नोटिस जारी कर दिया गया (सिर्फ़ इसलिए कि कोर्ट की सुनवाई के दौरान उनके फ़ोन पर दिल की बीमारी की दवा लेने का रिमाइंडर बज गया)। उन्होंने दावा किया कि उस समय भी माफ़ी मांगी गई थी और मामला बंद कर दिया गया।

    दातार ने बताया कि 2016 में मुद्दा 2 में से 1 जज के तबादले के आदेश को लागू न करने का था, जिससे पूरा बार भड़क उठा था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसने ओझा की माफ़ी स्वीकार की और मामला बंद कर दिया गया।

    इसके बाद 2020 की प्रेस कॉन्फ्रेंस और ओझा की टिप्पणियों के संबंध में दातार ने कहा कि वे किसी भी तरह से उन टिप्पणियों को सही ठहराने की कोशिश नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने उस संदर्भ को समझाया जिसमें वे की गईं। उन्होंने दावा किया कि 2020 में (जब COVID-19 महामारी फैली थी), कुछ वकीलों के मामले ठीक अगले ही दिन लिस्ट हो रहे थे, लेकिन दूसरों के मामले लिस्ट नहीं हो रहे थे (भले ही वे ज़मानत के मामले थे)।

    बार के अध्यक्ष के तौर पर ओझा को बार-बार संदेश और शिकायतें मिल रही थीं। दो वकीलों के पास कोई काम नहीं था, इसलिए उन्हें वकालत छोड़नी पड़ी और गुज़ारा करने के लिए फ़ूड-डिलीवरी प्लेटफ़ॉर्म Swiggy/Zomato में सेल्सपर्सन के तौर पर काम करना पड़ा। इस भावनात्मक रूप से आवेशित माहौल में कुछ टिप्पणियां की गईं।

    इस मोड़ पर जस्टिस माहेश्वरी ने सवाल किया कि क्या इतनी गंभीर स्थिति भी उस तरह का बयान देने को सही ठहरा सकती है, जैसा कि दिया गया। दातार ने नकारात्मक में जवाब दिया, लेकिन जोड़ा, "हमने माफ़ी मांगी है और सज़ा भुगती है। ज़रा सोचिए, अगर 2026 से 2028 तक मेरी वकालत की पोशाक (gown) छीन ली जाती है तो बार में मेरी क्या स्थिति होगी?"

    दातार ने यह भी कहा कि "जुआ का अड्डा" शब्दों का इस्तेमाल अनुचित था और इसके लिए सज़ा ज़रूरी थी, लेकिन सवाल यह था कि "किस हद तक"। सुनवाई समाप्त हो गई और बेंच ने दोनों पक्षों से अपने लिखित बयान/संक्षिप्त नोट जमा करने को कहा।

    बता दें, दिसंबर, 2025 में ओझा 18वीं बार गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए।

    Case Title: YATIN NARENDRA OZA Versus SUO MOTU, HIGH COURT OF GUJARAT AND ANR., Crl.A. No. 669/2020

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