पुरुषों-महिलाओं के लिए शिक्षण पदों की रिक्तियां अलग-अलग क्यों निकाली जाती हैं? सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर उम्मीदवार की याचिका पर दिल्ली सरकार से पूछा
Shahadat
20 Oct 2026 3:06 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए शिक्षण रिक्तियों को अलग-अलग अधिसूचित करने के औचित्य पर सवाल उठाया। कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा है कि लिंग के आधार पर इस तरह के बंटवारे का कानूनी आधार क्या है और सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कैसे शामिल किया जाएगा।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह सवाल तब उठाए, जब वे जेन कौशिक और प्रवीण सिंह द्वारा दायर याचिकाओं पर नोटिस जारी कर रहे थे। इन याचिकाओं में दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा जारी रिक्तियों की अधिसूचनाओं से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बाहर रखने का मुद्दा उठाया गया।
कोर्ट ने पूछा कि सरकारी भर्तियों के लिए अधिसूचनाएं अभी भी 'जेंडर-बाइनरी' (केवल पुरुष और महिला श्रेणियों तक सीमित) क्यों हैं। कोर्ट ने दिल्ली सरकार (NCT of Delhi) को आदेश दिया है कि वह बताए कि लिंग के आधार पर रिक्तियां निकालने का संवैधानिक या कानूनी आधार क्या है।
गौरतलब है कि यह याचिका एक ट्रांसजेंडर महिला, जेन कौशिक से जुड़ी है। उन्होंने दिल्ली शिक्षा निदेशालय और दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा शिक्षण पदों के लिए जारी उन अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी, जिनमें केवल पुरुष या महिला (बाइनरी) व्यक्तियों को ही आवेदन करने की अनुमति थी। सुप्रीम कोर्ट में यह उनकी दूसरी याचिका थी।
अपनी पहली याचिका में उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें शिक्षण के अवसर से वंचित रखा गया और उनकी लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव किया गया। कोर्ट ने उनके इस दावे को माना और उन्हें मुआवजा दिया। बेंच ने नीतिगत सुधारों के लिए जस्टिस आशा मेनन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
उन्होंने शिक्षण नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग रिक्तियां न होने और दिल्ली सरकार (NCT of Delhi) द्वारा रोजगार की न्यूनतम शर्तों में छूट न दिए जाने के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी रिट याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें संबंधित समिति के पास जाने का निर्देश दिया।
इसके खिलाफ, वह फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट से गलती हुई और निर्देश दिया कि उन्हें DSSSB के ऑनलाइन एकेडमिक रजिस्ट्रेशन सिस्टम (OARS) पोर्टल पर एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में पंजीकरण करने की अनुमति दी जाए। हालांकि, इसके बाद भी यह समस्या बनी रही, क्योंकि भर्ती अधिसूचनाएं अभी भी 'जेंडर-बाइनरी' ही बनी रहीं। 16 अक्टूबर को जब जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि एक और याचिका दायर की गई है, जो उम्र सीमा (ओवर-एज) से जुड़ी है।
कौशिक के वकील ने कोर्ट को याद दिलाया कि ट्रांसजेंडर-विशिष्ट भर्ती नोटिफिकेशन के साथ-साथ याचिकाकर्ता ने न्यूनतम योग्यता और उम्र में छूट (एज रिलैक्सेशन) की भी मांग की थी।
यह सुनकर जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने एक आदेश जारी किया जिसमें कुछ सवाल पूछे गए:
1. DSSSB द्वारा जारी किए गए वेकेंसी नोटिफिकेशन (जैसे कि जेन कौशिक की याचिका में 'एनेक्सचर P-7' के रूप में संलग्न नोटिफिकेशन) किस भर्ती नियम (Recruitment Rules) के तहत आते हैं?
2. क्या ये भर्ती नियम किसी संवैधानिक प्रावधान, कानूनी अधिनियम या राज्य सेवा नियमों (State Service Rules) से जुड़े हैं? दूसरे शब्दों में, DSSSB को विशिष्ट विषयों के लिए शिक्षण पदों की रिक्तियों का नोटिफिकेशन जारी करने की शक्ति कहाँ से मिलती है?
3. क्या उपर्युक्त भर्ती नियमों, कानूनी अधिनियमों या राज्य सेवा नियमों में यह अनिवार्य है कि शिक्षण पदों की रिक्तियों का नोटिफिकेशन लिंग (Gender) के आधार पर जारी किया जाए?
4. यदि उपरोक्त सवाल का जवाब 'नहीं' है, तो DSSSB द्वारा जारी नोटिफिकेशन में पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच रिक्तियों को बांटने का आधार क्या है? दूसरे शब्दों में, पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग रिक्तियां जारी करने के पीछे क्या उद्देश्य है?
5. यदि दूसरे सवाल का जवाब 'हाँ' है, तो सार्वजनिक भर्ती में रिक्तियों के नोटिफिकेशन के लिए लिंग (Gender) को आधार बनाने का क्या कारण है?
6. क्या दोनों ही याचिकाओं में, प्रतिवादी (Respondents) DSSSB के माध्यम से जारी होने वाले नोटिफिकेशन में 'तीसरे लिंग' (Third Gender) को शामिल करने का प्रस्ताव रखते हैं? दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को किस तरह से जगह दी जाएगी?
प्रवीण सिंह की याचिका में उम्र में छूट (एज रिलैक्सेशन) के सवाल पर हाईकोर्ट ने 'दिल्ली हाईकोर्ट एस्टेब्लिशमेंट (नियुक्ति और सेवा की शर्तें) नियम, 1972' के नियम 12 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित क्यों नहीं समझा? जबकि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक-आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो उन्हें उम्र में छूट क्यों नहीं दी गई?
अदालत ने कहा कि इन सवालों के जवाब 15 दिनों के भीतर एक हलफनामे के जरिए दाखिल किए जाएं। इसे याचिकाकर्ता के साथ साझा किया जाए ताकि वे अपना जवाब (रीजोइंडर) दाखिल कर सकें।
Case Title : JANE KAUSHIK v LIEUTENANT GOVERNOR, NCT OF DELHI & ORS

