'पैकेज्ड फ़ूड के पैकेट पर लेबल लगाने के लिए एक साल की ज़रूरत क्यों?' : सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से पूछा, फ़ैसला सुरक्षित रखा

  • पैकेज्ड फ़ूड के पैकेट पर लेबल लगाने के लिए एक साल की ज़रूरत क्यों? : सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से पूछा, फ़ैसला सुरक्षित रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर) को एक PIL पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। यह PIL उन पैकेज्ड फ़ूड प्रोडक्ट्स पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग' (FoPL) लागू करने की मांग कर रही है, जिनमें चीनी, फ़ैट और नमक जैसे चिंताजनक पोषक तत्व ज़्यादा मात्रा में होते हैं। साथ ही कोर्ट ने चेतावनी-लेबल सिस्टम लागू करने के लिए प्रस्तावित समय-सीमा को लेकर 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया' (FSSAI) से सवाल भी किए।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने सवाल किया कि FSSAI को अपने नए प्रस्ताव के तहत एक साल की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि (Voluntary Compliance Period) की ज़रूरत क्यों है और हितधारकों की आपत्तियों को शामिल करने वाली नई रेगुलेटरी प्रक्रिया क्यों ज़रूरी है, जबकि यह प्रक्रिया 2022 में ही शुरू हो गई।

    जस्टिस पारदीवाला ने FSSAI से पूछा,

    "एक साल तक स्वैच्छिक अनुपालन क्यों? आपको इतना समय क्यों चाहिए? आप सुनवाई और आपत्तियां मांगने की प्रक्रिया नए सिरे से क्यों शुरू करना चाहते हैं? आपने 2022 में शुरुआत की थी, पिछले 4 सालों में आपने क्या किया?"

    FSSAI की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने कहा कि 2022 में शुरू की गई प्रक्रिया पूरी तरह से अलग मानदंडों पर आधारित स्टार-रेटिंग सिस्टम से संबंधित है।

    इस पर जस्टिस पारदीवाला ने सवाल किया,

    "जब हम स्वास्थ्य के मुद्दे को लेकर इतने चिंतित हैं तो आप इतना समय क्यों बर्बाद करना चाहते हैं?"

    उन्होंने कहा कि हालांकि कोर्ट रेगुलेटर द्वारा अब तक उठाए गए कदमों की सराहना करता है, लेकिन फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल शुरू करने के उद्देश्य को सार्थक रूप से पूरा करने के लिए अभी और बहुत कुछ करने की ज़रूरत है।

    जस्टिस पारदीवाला ने कहा,

    "हम अब तक आपके द्वारा किए गए कार्यों और आपकी पहल की सराहना करते हैं, लेकिन जो हम हासिल करना चाहते हैं और जहां हम पहुंचना चाहते हैं, उसे सार्थक रूप से पूरा करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है।"

    उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोर्ट का आने वाला आदेश रेगुलेटर पर बाध्यकारी होगा और उम्मीद जताई कि FSSAI निर्देशों को पूरी ईमानदारी और उनकी सही भावना के साथ लागू करेगा।

    उन्होंने कहा,

    "अब हम जो भी आदेश देंगे, वह आप पर लागू होगा और हम उम्मीद करते हैं कि आप इसे समझेंगे और पूरी सख्ती से लागू करेंगे। हम यह पूरी कवायद देश और नागरिकों के भले के लिए कर रहे हैं।"

    जस्टिस पारदीवाला ने रेगुलेटर को चेताया कि निर्देशों का पालन न करने पर कार्रवाई हो सकती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "अब हम अंतिम आदेश सुनाएंगे। हम कुछ समय बाद यह देखने के लिए सुनवाई रखेंगे कि हर निर्देश का ठीक से पालन हुआ है या नहीं। जिस दिन पालन की रिपोर्ट देने के लिए मामला सामने आए, उस दिन हमें निराश न करें।"

    बाद में उन्होंने कहा कि बेंच शुरू में रेगुलेटर से यह कहना चाहती थी कि वे उसे "नाराज़" न करें, लेकिन इसके बजाय उन्होंने "हमें निराश न करें" शब्द का इस्तेमाल किया।

    याचिकाकर्ता की ओर से वकील राजीव शंकर द्विवेदी ने FSSAI के संशोधित प्रस्ताव के बारे में कई चिंताएं जताईं, जिनमें एडेड शुगर और कुल शुगर के बीच अंतर शुरू से ही FoPL को अनिवार्य रूप से लागू करना, नई रेगुलेटरी प्रक्रिया के कारण होने वाली देरी और पैक्ड फूड के मौजूदा स्टॉक का निपटान शामिल है।

    याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की परिभाषा तय होने तक वॉर्निंग लेबल लागू करने में देरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इन दोनों मुद्दों पर अलग-अलग काम किया जा सकता है।

    पक्षकारों को तीन दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद कोर्ट अपना आदेश सुनाएगा।

    Case: 3S and Our Health Society v. Union of India | MA 1177/2025 in W.P.(C) No. 437/2024

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