'अनिल अंबानी को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया?' याचिकाकर्ता ने पूछा; 'X या Y को क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया, इसका जवाब नहीं दे सकते', ED ने कहा
Shahadat
30 April 2026 5:35 PM IST

अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप की कंपनियों द्वारा कथित धोखाधड़ी की जांच की मांग करने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह याचिकाकर्ता के इस सवाल का जवाब नहीं दे सकते कि अंबानी को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया।
SG ने कहा,
"मैं इस बात का जवाब नहीं दे पाऊंगा कि किसी X को क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया या Y को क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया... यह उचित नहीं है..."
साथ ही उन्होंने बताया कि कुछ और सबूत मिलने के बाद एजेंसियों ने 2 नई FIR दर्ज की हैं।
यह टिप्पणी याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण की इस दलील के जवाब में आई कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले के सिलसिले में कुछ जूनियर कर्मचारियों को तो गिरफ़्तार किया है, लेकिन अनिल अंबानी को नहीं, जिन्हें SEBI ने अपनी रिपोर्ट में "धोखाधड़ी का मुख्य सरगना" बताया था।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और इसे 8 मई के लिए टाल दिया। उस दिन बेंच जाँच के संबंध में ED और CBI द्वारा दायर नई स्टेटस रिपोर्ट पर विचार करेगी।
बेंच ने कहा कि वह आगे के निर्देश जारी करने से पहले एजेंसियों की रिपोर्ट पर विचार करना चाहेगी।
सुनवाई के दौरान बेंच को यह भी बताया गया कि जांच, जिसे पिछली सुनवाई में 4 हफ़्तों के भीतर पूरा करने का प्रस्ताव था, पूरी नहीं हो सकी क्योंकि एजेंसियों को कुछ और सबूत मिले और उन्हें दो नई FIR दर्ज करनी पड़ीं।
संक्षेप में मामला
यह याचिका अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) की कंपनियों द्वारा 40,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कथित ऋण धोखाधड़ी की जांच की मांग करती है। इससे पहले, इस मामले की जाँच में एजेंसियों की ओर से हुई "अकारण देरी" पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कोर्ट ने ED और CBI को इस मामले की तेज़ी से जाँच करने का निर्देश दिया था।
मार्च में, एजेंसियों ने जांच पूरी करने के लिए 4 हफ़्तों का समय मांगा था। कोर्ट ने ED की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अनिल अंबानी ग्रुप की कुछ कंपनियों पर बकाया 2983 करोड़ रुपये के कर्ज़ को दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान महज़ 26 करोड़ रुपये में निपटा दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये सभी अधिग्रहण 8 नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंस कंपनियों (NBFC) द्वारा "प्रोजेक्ट हेल्प" के ज़रिए किए गए।
उससे पहले, CJI कांत ने भी दिवालिया हो चुकी कंपनियों द्वारा IBC प्रक्रिया के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताई थी। CJI ने उन मामलों को उठाया जिनमें कंपनियाँ अपनी संपत्तियों की नीलामी अपने परिवार के सदस्यों या दोस्तों को कम कीमत पर कर देती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में एक लेनदार के वकील ने, जिसने एक अर्जी दाखिल की, आज एक खास मामले का ज़िक्र किया, जिसमें ऐसा लगता है कि IBC की कार्यवाही मिलीभगत से की गई। उन्होंने गुज़ारिश की कि इस मामले की जाँच CBI और ED से करवाई जाए।
उन्होंने कहा,
"एक पूरी तरह से सक्षम कंपनी हर महीने 8.5 करोड़ रुपये का टोल वसूल रही है। फिर IBC के तहत एक याचिका दायर की जाती है। इसे CIRP के तहत ले लिया जाता है। फिर कोई SRA आता है और इसे बहुत कम कीमत पर खरीद लेता है, जहाँ लगभग 584 करोड़ रुपये का कर्ज़ सिर्फ़ 85 करोड़ रुपये में चुका दिया जाता है। वह प्लान दाखिल किया जाता है, सब सहमत हो जाते हैं, और उसे मंज़ूरी मिल जाती है। इसके बाद सभी लेनदारों को नुकसान उठाना पड़ता है। कंपनी पूरी तरह से पाक-साफ़ होकर बाहर निकल आती है।"
जहां जस्टिस बागची ने यह बताया कि अर्जी देने वाले लेनदार के पास समाधान योजना (Resolution Plan) की मंज़ूरी को चुनौती देने का विकल्प मौजूद है, वहीं CJI कांत ने टिप्पणी की कि नेकनीयत जनहित याचिका (PIL) में अदालत इस तरह के आपसी विवादों को हल नहीं कर सकती।
जब वकील ने इस मामले को जांच एजेंसियों के सामने रखने की इजाज़त मांगी तो पीठ ने राय दी कि उन्हें ऐसी किसी इजाज़त की ज़रूरत नहीं है।
CJI ने SG मेहता से कहा,
"अगर कोई ऐसी जानकारी या सामग्री है जिसका उन मुद्दों की जांच से सीधा संबंध है, जिनकी आप जांच कर रहे हैं तो उसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।"
Case Title: EAS Sarma v. Union of India and Others, W.P.(C) No. 1217/2025

