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औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25एफ के तहत छंटनी की शर्तों का उल्लंघन बकाये वेतन के पूर्ण भुगतान के साथ बहाली के लिए अपरिहार्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
17 July 2021 4:16 AM GMT
औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25एफ के तहत छंटनी की शर्तों का उल्लंघन बकाये वेतन के पूर्ण भुगतान के साथ बहाली के लिए अपरिहार्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25एफ का उल्लंघन, [छंटनी की शर्तें] स्वत: पूर्ण बकाये वेतन के साथ बहाली में अपरिहार्य नहीं होगा।

इस मामले में पंचमलाल यादव नाम के एक व्यक्ति ने बुंदेलखंड क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के प्रबंधन द्वारा उनकी सेवाओं को समाप्त करने की कार्रवाई को केंद्र सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण (सीजीआईटी) के समक्ष चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने दावेदार के खिलाफ संदर्भ का जवाब दिया और माना कि वह एक नियमित कर्मचारी नहीं था, क्योंकि वह दैनिक मजदूरी पर कार्यरत था। इसने आगे कहा कि वह यह साबित नहीं कर सका कि उसने एक कैलेंडर वर्ष में लगातार 240 दिनों से अधिक काम किया है। बाद में, उनकी रिट याचिका को स्वीकार करते हुए, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रबंधन का दायित्व था कि वह अपने पास उपलब्ध सभी सामग्रियां पेश करे, जिससे यह साबित हो कि प्रतिवादी को दैनिक वेतन के आधार पर नियुक्त किया गया था और उसने एक कैलेण्डर वर्ष में लगातार 240 दिन से अधिक काम नहीं किया था।

बैंक ने यह तर्क देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था कि यह 'भारत संचार निगम लिमिटेड बनाम भुरुमल [(2014) 7 एससीसी 177]', 'दूरसंचार जिला प्रबंधक एवं अन्य बनाम केशब देब [(2008) 8 एससीसी 402]' और 'राजस्थान ललित कला अकादमी बनाम राधे श्याम [(2008) 13 एससीसी 248]' मामलों में दिये गये फैसलों पर भरोसा जताया है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25एफ के तहत छंटनी की शर्तों का उल्लंघन बकाये वेतन के पूर्ण भुगतान के साथ बहाली के लिए अपरिहार्य नहीं होगा।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने अपील मंजूर करते हुए कहा,

"पक्षकारों की ओर से दी गयी दलीलों पर विचार करने के बाद, हमारा मानना है कि प्रतिवादी इस न्यायालय द्वारा तय किए गए कानून के मद्देनजर बहाली का हकदार नहीं है। 'श्री कपूर' मामले में दिये गये फैसले पर आधारित निर्णय में यह स्पष्ट है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25एफ के तहत छंटनी की शर्तों का उल्लंघन बकाये वेतन के पूर्ण भुगतान के साथ बहाली के लिए अपरिहार्य नहीं होगा। राहत व्यक्तिगत मामलों के तथ्यों पर आधारित होगा।"

पीठ ने हालांकि बैंक को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

कानून को जानें

धारा 25एफ कामगारों की छंटनी से पहले की शर्तों को सूचीबद्ध करता है।

यह इस प्रकार है:

किसी उद्योग में नियोजित कोई भी कामगार, जो किसी नियोक्ता के अधीन कम से कम एक वर्ष तक निरंतर सेवा में रहा हो, उस नियोक्ता द्वारा तब तक छटनी नहीं की जाएगी जब तक कि-

(ए) कामगार को लिखित में एक महीने का नोटिस दिया गया है जिसमें छंटनी के कारणों का संकेत दिया गया है और नोटिस की अवधि समाप्त हो गई है, या इस तरह के नोटिस के बदले कामगार को नोटिस अवधि के लिए मजदूरी का भुगतान किया गया है;

(बी) कामगार को छंटनी के समय, मुआवजे का भुगतान किया गया है, जो पंद्रह दिनों के औसत वेतन [निरंतर सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के लिए] या छह महीने से अधिक के किसी भी हिस्से के बराबर होगा; तथा

(सी) उपयुक्त सरकार या ऐसे प्राधिकरण को निर्धारित तरीके से नोटिस दिया जाता है जो सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उपयुक्त सरकार द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है।

बीएसएनएल बनाम भुरुमल मामले में, यह कहा गया था,

"जब औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एफ के तहत अनिवार्य रूप से अपेक्षित छंटनी मुआवजे और नोटिस अवधि के भुगतान करने के कारण बर्खास्तगी अवैध पाई जाती है, तो यहां तक कि बहाली के बाद भी, प्रबंधन के लिए यह हमेशा खुला रहता है कि वह उस कर्मचारी को छँटनी के मुआवजे का भुगतान करके उसकी सेवाओं को समाप्त कर सकता है। चूंकि ऐसा कामगार दैनिक वेतन के आधार पर काम कर रहा था और बहाल होने के बाद भी, उसे नियमितीकरण की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है (देखें: कर्नाटक सरकार बनाम उमा देवी (2006) 4 एससीसी 1)। इस प्रकार जब वह नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकता है और उसे दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में भी जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है, ऐसे कामगार को बहाल करने में कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला है और हो सकता है अदालत द्वारा ही उसे मौद्रिक मुआवजा दिया जाये। चूंकि बहाली के बाद उसे फिर से बर्खास्त कर दिया जाता है, तो उसे केवल छंटनी मुआवजे और नोटिस अवधि के वेतन के रूप में मौद्रिक मुआवजा मिलेगा। ऐसी स्थिति में, सेवा में बहाली के माध्यम से दी गयी राहत, वह भी लंबे अंतराल के बाद, किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगी।"

मामला: मध्य भारत ग्रामीण बैंक बनाम पंचमलाल यादव [सीए 9792 / 2010]

कोरम : न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस

साइटेशन : एलएल 2021 एससी 299

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