'अनचाही गर्भधारण की घटनाएं बढ़ रही हैं': AIIMS के खिलाफ अवमानना कार्यवाही खत्म करते हुए बोला सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
4 May 2026 7:36 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही खत्म की। कोर्ट को बताया गया कि एक नाबालिग लड़की के 30 हफ्ते के गर्भ को खत्म करने की अनुमति देने वाले उसके आदेश का पालन कर लिया गया।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच नाबालिग की मां द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि कोर्ट के पिछले निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा,
"सम्मानित एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने हमारे संज्ञान में 2 मई 2026 और 4 मई 2026 की दो रिपोर्टें लाई हैं। उन्होंने बताया कि इस कोर्ट द्वारा जारी निर्देश का पालन कर लिया गया, क्योंकि गर्भ को खत्म करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। हमें इस अवमानना याचिका पर आगे विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता। इसलिए प्रतिवादियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही खत्म की जाती है।"
आदेश लिखवाने के बाद जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि ऐसे मामले मुश्किल हालात पैदा करते हैं, जहां बिना किसी भावना के फैसले लेने पड़ते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसे हालात दोबारा पैदा नहीं होंगे।
उन्होंने कहा,
"हमारे लिए भी यहां यह आसान नहीं है। इसमें न कोई जीत रहा है और न ही कोई हार रहा है। फिर भी हमें बिना किसी भावना के फैसला लेना पड़ता है। मुझे उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं आएगी। मेरा मतलब है कि हम नहीं चाहते कि अनचाहे गर्भधारण के ऐसे और मामले गर्भपात के लिए हमारे सामने आएं।"
अवमानना की यह कार्यवाही कोर्ट के 24 अप्रैल 2026 के उस आदेश से शुरू हुई, जिसमें 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट' के तहत तय कानूनी सीमा से अधिक समय बीत जाने के बावजूद नाबालिग के गर्भ को खत्म करने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर नाबालिग लड़की गर्भ को जारी रखने के लिए तैयार नहीं है तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना उसके अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
पिछले हफ्ते कोर्ट ने AIIMS, नई दिल्ली के निदेशक और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रधान सचिव व सचिव को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि अगर 4 मई 2026 तक उसके आदेश का पालन नहीं किया गया तो वह उनके खिलाफ अवमानना के आरोप तय करने की कार्यवाही शुरू करेगा।
सुनवाई की शुरुआत में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की गई और नाबालिग लड़की को अस्पताल से छुट्टी देने के लिए वह पूरी तरह से स्वस्थ है। उन्होंने कोर्ट को आगे बताया कि लड़की ने एक लड़के को जन्म दिया है, जो अभी नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (NICU) में है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जो भी मेडिकल मदद ज़रूरी हो, वह ज़रूर दी जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान, बेंच और ASG ने 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट' के तहत आने वाले मुद्दों पर चर्चा की।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर AIIMS ऐसे मामलों में MTP (गर्भपात) करने की ज़िम्मेदारी नहीं लेता है तो महिलाएं बिना क्वालिफिकेशन वाले डॉक्टरों के पास जाएंगी और उनकी जान को खतरा हो सकता है।
जस्टिस भुइयां ने इस बात पर ज़ोर दिया कि महिलाओं का बिना क्वालिफिकेशन वाले डॉक्टरों के पास जाना ही वह बुराई है, जिसे 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट' रोकना चाहता है।
जस्टिस नागरत्ना ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत के उस सुझाव को दोहराया कि MTP Act में बदलाव किया जाए ताकि अगर किसी नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भ ठहर जाए तो उस पर समय-सीमा लागू न हो।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अनचाहे गर्भधारण के मामले—जिनमें आपसी सहमति से बने रिश्तों से हुए गर्भधारण भी शामिल हैं—बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई मामलों में नाबालिग लड़की को लगे सदमे और परिवार वालों को बताने में हुई देरी की वजह से फ़ैसला लेने में देर हो जाती है। इसके बाद प्राइवेट क्लीनिक मदद करने से मना कर देते हैं। आखिर में मरीज़ को AIIMS का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थितियों में, नाबालिग लड़की का खास ख्याल रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"आजकल समाज में अनचाहे गर्भधारण की समस्या बढ़ती जा रही है। आप देखिए क्या होता है—वे किसी को बताते नहीं हैं; इस मामले में (नाबालिग लड़की की) माँ ने इस बात का पता लगाया। जब तक परिवार में कोई फ़ैसला लिया जाता है, तब तक 7 महीने बीत चुके होते हैं। आप देखिए, यह कितना मुश्किल है। एक नाबालिग और अविवाहित लड़की का गर्भवती हो जाना—यह उसके लिए कितना बड़ा सदमा होता है। फिर परिवार का यह फ़ैसला कि अब क्या किया जाए... यह एक गंभीर समस्या है। या तो यह कानून में कोई कमी है, या फिर समाज की सोच में कोई गड़बड़ है। किसी न किसी को तो इसका जवाब देना ही होगा।"
भाटी ने कोर्ट को बताया कि 2021 में हुए संशोधन के ज़रिए कानून में तय समय-सीमा को पहले के 10 और 12 हफ़्तों से बढ़ाकर 24 हफ़्ते किया गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि ऐसे मामलों में जहां गर्भ काफी बढ़ चुका होता है, कोर्ट को बच्चे के अधिकारों पर भी विचार करना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया,
"किसी दिन, आप सभी जजों को इस बात पर भी विचार करना होगा कि ऐसे बच्चों का भविष्य क्या होगा। इस बच्चे के बचने की संभावना तो 80% है, लेकिन क्या वह किसी शारीरिक कमी (Disability) के साथ बचेगा? क्या उसे ज़िंदगी भर किसी कमी के साथ जीना पड़ेगा?"
उन्होंने आगे कहा कि पेशेवर और चिकित्सा निकाय मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर कार्य करते हैं। यह भी जोड़ा कि परिवारों और समाज के भीतर यौन शिक्षा की आवश्यकता है।
अदालत ने कहा कि अवमानना याचिका पर आगे विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
Case Title – S [Mother of N] v. Punya Salila Srivastava

