बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लिए जाने पर सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी का सवाल, पूछा- 'क्या अघोषित इमरजेंसी लगी है?'
Shahadat
12 Oct 2026 8:54 AM IST

CEC के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के मामले की सुनवाई के दौरान, सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने आज पुलिस अधिकारियों पर कई मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया और सवाल किया कि क्या सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से अघोषित इमरजेंसी लागू कर दी है।
सीनियर वकील ने कोर्ट को दशकों पुराने ADM जबलपुर फैसले की याद दिलाई और दूसरे न्यायिक फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि आर्टिकल 19 के तहत मिलने वाले अधिकारों (जैसे बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी) पर सिर्फ़ इमरजेंसी के दौरान ही रोक लगाई जा सकती है।
गुरुस्वामी ने जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने कहा,
"संविधान के आर्टिकल 358 में कहा गया है कि आर्टिकल 19 के अधिकारों पर तभी रोक लगाई जा सकती है जब इमरजेंसी लागू हो। क्या सरकार यह कह रही है कि उसने बिना घोषित किए ही इमरजेंसी लागू कर दी है? पहले भी ऐसे फैसले आए हैं, जिनमें कहा गया कि सिर्फ़ इमरजेंसी की स्थिति में ही आर्टिकल 19 के अधिकारों को सस्पेंड किया जा सकता है। आप लोग आज यहां इसलिए जमा हुए हैं क्योंकि मामला बहुत गंभीर है - नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को सस्पेंड किया जा रहा है। पिछली बार कोर्ट को ऐसी चुनौतियों पर इमरजेंसी के समय विचार करना पड़ा था। अब हम 50 साल बाद उसी स्थिति में हैं - आपके सम्माननीय पूर्ववर्तियों ने (तब) ADM जबलपुर का फैसला सुनाया था।"
वह दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों (खासकर राजनीतिक नेताओं) के मामले में उनके द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर बहस कर रही थीं। ये गिरफ्तारियां मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान की गईं।
ADM जबलपुर मामले में 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय लगाई गई इमरजेंसी के दौरान 'हेबियस कॉर्पस' की रिट को सस्पेंड करने की इजाज़त दी गई। उस दौरान, राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को MISA (मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत हिरासत में लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से यह फैसला सुनाया कि इमरजेंसी के दौरान, किसी भी व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए कोर्ट जाने का अधिकार (locus standi) नहीं है। जस्टिस एचआर खन्ना, जो इस मामले में अपनी असहमति वाली राय के लिए जाने जाते हैं, का मानना था कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार एक स्वतंत्र अधिकार है, जिसे कानून के अधिकार के बिना छीना नहीं जा सकता। कहा जाता है कि इसी असहमति के कारण जस्टिस खन्ना को चीफ जस्टिस का पद नहीं मिल पाया।
अन्य बातों के अलावा, गुरुस्वामी ने कहा कि राज्य का मेट्रो सेवाओं को रोकना (जिससे शहर में आने-जाने पर असर पड़ा), इंटरनेट बंद करना, बिना आधिकारिक आंकड़े दिए लगभग 7000 लोगों को हिरासत में लेना आदि 'उचित' नहीं है। उन्होंने उन रिपोर्टों की ओर इशारा किया, जिनमें कहा गया कि विरोध प्रदर्शन से पहले राजधानी में लगभग 45 डिटेंशन सेंटर बनाए गए, जबकि कम-से-कम 3 पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके घरों से उठाया गया और कई सांसदों को उनके घरों में ही रोक दिया गया।
उन्होंने कहा,
"युवाओं ने कानूनी तरीके से विरोध करने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें लगता है कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष नहीं है। ऐसे मामलों में 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) ही सबसे अच्छा उपाय है। जब हमने याचिका दायर की, तो हमें हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या का अंदाजा नहीं था, क्योंकि इंटरनेट काम नहीं कर रहा था।"
आखिरकार, कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में उनके द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर नोटिस जारी किया, ताकि सभी के अधिकारों की रक्षा की जा सके - न कि सिर्फ़ "जाने-माने लोगों" के।
Case Title : MENAKA GURUSWAMY v. UNION OF INDIA AND ANR.

