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अत्याचार मात्र शारीरिक यातना नहीं है, किसी को मामूली कारणों से सलाखों के पीछे रखना भी अत्याचार है:ज‌‌स्टिस दीपक गुप्ता

LiveLaw News Network
4 July 2020 9:43 AM GMT
अत्याचार मात्र शारीरिक यातना नहीं है, किसी को मामूली कारणों से सलाखों के पीछे रखना भी अत्याचार है:ज‌‌स्टिस दीपक गुप्ता
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"अत्याचार सिर्फशारीरिक यातना नहीं है। यदि आप किसी व्यक्ति को मामूली कारणों से सलाखों के पीछे रखते हैं, तो यह भी अत्याचार है", सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने लाइवलॉ की ओर से आयोजित एक वेबिनार में यह टिप्पणी की। वेब‌िनार का विषय ‌था- हिरासत में मौतें: अत्याचार-रोधी कानून की आवश्यकता

वेबिनार में जस्टिस दीपक गुप्ता, पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री डॉ अश्विनी कुमार और हिंदुस्तान टाइम्स के राष्ट्रीय राजनीतिक मामलों की संपादक सुनेत्रा चौधरी शामिल हुईं ‌‌थीं। संचालन एडवोकेट अव‌नि बंसल ने किया।

वेब‌िनार की शुरुआत में तमिलनाडु के थूथुकुडी में पिता-पुत्र की हिरासत में हुई मौत पर चर्चा हुई, जिसमें दोनों को पुलिस ने कर्फ्यू की अव‌ध‌ि में 15 मिनट तक अपनी दुकान खुली रखने के कारण पकड़ ‌लिया था। दोनों को हिरासत में बेरहमी से पीटा गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने एक बयान जारी करके कि दोनों की दिल की बीमारियों के कारण मौत हुई है, मामले को छुपाने का प्रयास किया।

इस संदर्भ में, बंसल ने ज‌स्टिस दीपक गुप्ता से पूछा कि डीके बसु बनाम पश्च‌िम बंगाल राज्य में कैदी के अधिकारों के संबंध में दिशानिर्देशों के जारी होने के बावजूद, क्रियान्वयन क्यों एक चुनौती है?

ज‌स्टिस गुप्ता ने कहा कि हालांकि यातना-विरोधी कानून की आवश्यकता के बारे में कोई सवाल नहीं है, ऐसा कानून केवल संसद ला सकती है न की सुप्रीम कोर्ट। (डॉ अश्विनी कुमार द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में, जिसमें अत्याचार विरोधी कानून की मांग की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था)।

जस्टिस गुप्ता ने कहा, "न्यायालय केवल यह तय कर सकता है कि कानूनी क्या है और गैर कानूनी क्या है। मुझे एक एक्टिविस्ट जज कहा जाता रहा है, और मैं इसकी खुशी है। लेकिन, हम केवल कानून के दायरे के भीतर ही एक्टि‌विस्‍ट हो सकते हैं।"

जस्ट‌िस गुप्ता ने कहा, मौजूदा कानूनों को लागू करना समय की जरूरत है।

"डीके बसु मामले में, कोर्ट ने सोचा कि हम संसद को कुछ सुझाव दे सकते हैं। तमिलनाडु में, ऐसे नियम हैं, जिनमें तय किया गया है कि कि आरोपी को रिमांड पर देने से पहले उसे शारीरिक रूप से पेश किया जाना चाहिए। आपके पास यह नियम है, लेकिन इसका उल्लंघन किया गया था।"

"पहले उन कानूनों को लागू करें, जो हमारे पास हैं। जांच और अभियोजन उचित नहीं हैं; पहले इन्हें ठीक किया जाना चाहिए।"

जस्टिस गुप्ता ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि अधिकांश मामले गरीबों के खिलाफ होते हैं, न कि विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों के खिलाफ। उन्होंने कहा कि पहले जांच और अभियोजन की प्र‌क्रिया में सुधार की जरूरत है, और मौजूद कानूनों को लागू करने की जरूरत है।

पुलिस की ज्यादती के मामले में मजिस्ट्रेटों की भूमिका और जवाबदेही के मुद्दे पर ज‌स्टिस गुप्ता ने कहा कि अत्याचार-रोधी कानून लाने से पहले मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। हैदराबाद एनकाउंटर मामले का जिक्र करते हुए, जहां बलात्कार और हत्या के आरोपियों को पुलिस ने भागने की कथ‌ित कोशिश के आरोप में गोली मार दी ‌‌थी, जस्टिस गुप्ता ने कहा, "हमने कसाब का निष्पक्ष ट्रायल किया था, फिर उनका ट्रायल क्यों नहीं हुआ?"

ज‌स्टिस गुप्ता ने कहा कि कोर्ट लोगों को जमानत देने के मामलों में अनिच्छुक रहते हैं, उन्होंने लगता है कि "ये तो अपराधी हैं, इसे जेल में ही रहने दो।"

उन्होंने कहा, "अत्याचार सिर्फ शारीरिक यातना नहीं है। यदि आप किसी व्यक्ति को मामूली कारणों से सलाखों के पीछे रखते हैं, तो यह भी यातना है। मुझे यह भी लगता है कि बात जब उच्च पदों की होती है तो कुछ जवाबदेही भी होनी चाहिए।"

जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हैदराबाद एनकाउंटर मामले में काफी गड़बड़‌ियां हुई थीं। वेबिनार के अंत में उन्होंने कहा कि कानूनों में व्यापक सुधार से पहले पुलिस अधिकारियों को बेहतर प्रशिक्षण की की जरूरत है।

उन्होंने अपराधों की जांच के लिए पुलिस को बेहतर प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर भी बात की, ताकि पुलिसकर्मी अभियुक्तों के खिलाफ थर्ड डिग्री का प्रयोग न करें।

वेबिनार का वीडियो देखने के लिए क्लिक करें


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