पश्चिम बंगाल SIR की समयसीमा बढ़ाने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे TMC सांसद डेरेक ओ'ब्रायन

Praveen Mishra

6 Jan 2026 7:15 PM IST

  • पश्चिम बंगाल SIR की समयसीमा बढ़ाने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे TMC सांसद डेरेक ओब्रायन

    तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने पश्चिम बंगाल में हो रही विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रियाओं को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया है।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग बूथ स्तर अधिकारियों (BLOs) और अन्य कर्मियों को औपचारिक चैनलों के बजाय अनौपचारिक माध्यमों जैसे व्हाट्सऐप के जरिए निर्देश जारी कर रहा है, जिससे पूरे प्रक्रिया का ऑडिट ट्रेल असंभव हो जाता है और लोकतांत्रिक अधिकारों पर असर पड़ता है। याचिका में कहा गया है कि क्षेत्रीय स्तर पर इस व्यवस्था को “व्हाट्सऐप कमीशन” कहा जा रहा है, जहां महत्वपूर्ण निर्देश और चेतावनियां केवल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से दी जा रही हैं, जो जवाबदेही खत्म करने वाली व्यवस्था है।

    यह भी कहा गया है कि कई अनौपचारिक निर्देश न केवल ईसीआई के औपचारिक आदेशों के विपरीत हैं, बल्कि संवैधानिक व वैधानिक ढांचे के बाहर हैं। साथ ही आरोप है कि ईसीआई बूथ लेवल एजेंट्स को मतदाताओं की सहायता करने से रोक रही है, जबकि बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सहायता की अनुमति दी थी।

    याचिका में यह भी दावा किया गया है कि आयोग मतदाताओं के “मैपिंग” के लिए एक अप्रकाशित सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर रहा है और 2002 की मतदाता सूची को डिजिटल प्रारूप में बदलने के दौरान बड़े पैमाने पर त्रुटियां हो रही हैं। 29.12.2025 के एक मेमो का हवाला देते हुए कहा गया है कि पुराने पीडीएफ रिकॉर्ड को CSV में बदलने की प्रक्रिया बिना पर्याप्त सत्यापन के की गई, जिसके कारण डेटा मिलान में व्यापक गलतियाँ हुई हैं। बिहार में यह प्रक्रिया BLO की निगरानी में की गई थी, जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हुआ — यह अंतर भी रेखांकित किया गया है।

    याचिका में ईसीआई द्वारा अपनाई गई एक नई श्रेणी “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” को भी चुनौती दी गई है, जिसके आधार पर लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को नोटिस भेजे जाने की संभावना बताई गई है। यह श्रेणी डेटा मिलान में पाई गई छोटी-छोटी विसंगतियों — जैसे स्पेलिंग अंतर, अभिभावक/उम्र संबंधी भिन्नता आदि — पर आधारित है, जिनके कारण मतदाताओं को अर्ध-न्यायिक सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है, जबकि इसके लिए कोई लिखित दिशा-निर्देश मौजूद नहीं हैं।

    याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई प्रमुख राहतें

    दावों और आपत्तियों की समय-सीमा (15.01.2026) बढ़ाई जाए और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशन टाला जाए।

    व्हाट्सऐप जैसे अनौपचारिक माध्यमों से जारी सभी निर्देश अवैध घोषित किए जाएं और ऐसी प्रथाओं पर रोक लगे।

    गलत “मैपिंग” के कारण किसी मतदाता को बाहर न किया जाए तथा थर्ड-पार्टी एजेंसियों की भूमिका समाप्त की जाए।

    “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” जैसी अतिरिक्त-वैधानिक श्रेणी समाप्त की जाए और उसके आधार पर नाम न हटाए जाएं।

    बूथ लेवल एजेंट्स को सुनवाई और दावे/आपत्तियों की प्रक्रिया में मतदाताओं की सहायता करने की अनुमति दी जाए।

    प्रवासी मतदाताओं के लिए वर्चुअल सुनवाई/परिवार के सदस्य द्वारा प्रतिनिधित्व की अनुमति दी जाए।

    60 वर्ष से अधिक आयु के बीमार वरिष्ठ नागरिकों के लिए डोर-स्टेप या डिजिटल/टेलीफोनिक सत्यापन उपलब्ध कराया जाए।

    सत्यापन के दौरान स्थायी निवास प्रमाणपत्र, पंचायत प्रमाणपत्र, फैमिली रजिस्टर आदि स्वीकृत किए जाएं।

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