तेलंगाना हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: 'पहले स्वतंत्र भारत का नागरिक था' में वर्तमान भारतीय नागरिक भी शामिल
Praveen Mishra
19 Jun 2026 2:33 PM IST

तेलंगाना हाईकोर्ट ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(f) की व्याख्या करते हुए कहा है कि "पहले स्वतंत्र भारत का नागरिक था" (was earlier citizen of independent India) वाक्यांश केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जिन्होंने भारतीय नागरिकता खो दी हो, बल्कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो आज भी भारतीय नागरिक हैं।
जस्टिस नागेश भीमापाका की एकल पीठ ने यह फैसला एक यमनी नागरिक और ओसीआई (OCI) कार्डधारक की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता की मां हैदराबाद में जन्मी भारतीय नागरिक हैं और उनके पास भारतीय पासपोर्ट है। याचिकाकर्ता ने नागरिकता अधिनियम की धारा 5(1)(f) के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था, लेकिन गृह मंत्रालय ने यह कहते हुए आवेदन पर आपत्ति जताई कि न तो वह और न ही उसके माता-पिता "पहले स्वतंत्र भारत के नागरिक" रहे हैं।
केंद्र सरकार का तर्क था कि धारा 5(1)(f) केवल उन मामलों पर लागू होती है जहां आवेदक या उसके माता-पिता पहले भारतीय नागरिक रहे हों और बाद में नागरिकता समाप्त हो गई हो। चूंकि याचिकाकर्ता की मां अब भी भारतीय नागरिक हैं, इसलिए वह "earlier citizen" नहीं मानी जा सकतीं।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि धारा में प्रयुक्त "earlier" शब्द केवल समय को दर्शाता है और इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति की नागरिकता समाप्त हो चुकी हो। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति आज भारतीय नागरिक है, वह भी किसी समय स्वतंत्र भारत का नागरिक था।
अदालत ने कहा कि केंद्र की व्याख्या स्वीकार करने पर असंगत परिणाम सामने आएंगे। ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिक के बच्चे को नागरिकता के लिए आवेदन का लाभ नहीं मिलेगा, जबकि उस व्यक्ति के बच्चे को लाभ मिल सकता है जिसने भारतीय नागरिकता छोड़ दी हो।
पीठ ने कहा कि धारा 5(1)(f) का उद्देश्य भारत से पारिवारिक संबंध रखने वाले व्यक्तियों को नागरिकता प्राप्त करने का अवसर देना है, इसलिए इसकी व्याख्या उदार और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता भारत में निर्धारित अवधि तक रह चुका है, ओसीआई कार्डधारक है और नागरिकता के लिए आवश्यक अन्य शर्तें भी पूरी करता है। इसके बाद हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
साथ ही अदालत ने गृह मंत्रालय को धारा 5(1)(f) के अलावा धारा 5(1)(g) के तहत भी याचिकाकर्ता की पात्रता पर विचार कर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया।

