गायों के वध पर रोक लगाने वाले आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार

Shahadat

1 July 2026 11:13 AM IST

  • गायों के वध पर रोक लगाने वाले आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार

    तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसमें राज्य में गायों और बछड़ों के वध पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।

    राज्य सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट का आदेश 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958' के खिलाफ है। यह कानून सक्षम अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण-पत्र के आधार पर 10 साल से अधिक उम्र की उन गायों के वध की अनुमति देता है, जो काम और प्रजनन के लिए अनुपयुक्त हैं। इस कानून के अलावा, अन्य लागू कानून जैसे 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960', 'पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम, 2001', 'तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998' और 'तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम, 2023' उन शर्तों को नियंत्रित करते हैं, जिनके तहत जानवरों का वध किया जा सकता है, लेकिन वे पूरी तरह से रोक नहीं लगाते हैं। राज्य सरकार के अनुसार, पूरी तरह से रोक का आदेश देकर हाईकोर्ट ने वैधानिक कानून की जगह न्यायिक कानून लागू कर दिया।

    जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायण की हाईकोर्ट बेंच ने यह आदेश 27 मई को - बकरीद से ठीक पहले - 'हिंदू मक्कल काची' के महासचिव के. सूर्या प्रशांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ता की मांग यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने की थी कि वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही हो, लेकिन हाईकोर्ट ने किसी भी दिन और कहीं भी गायों और बछड़ों के वध पर पूरी तरह से रोक लगाने का आदेश दे दिया।

    आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए गायों के वध पर रोक जरूरी है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया कि बकरीद के जश्न के लिए गायों का वध कोई अनिवार्य प्रथा नहीं है।

    हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने तर्क दिया कि जब कानून निर्धारित स्थानों पर गायों की एक विशेष श्रेणी के वध की अनुमति देता है, तो वैधानिक प्रावधान के विपरीत कोई न्यायिक निर्देश मान्य नहीं हो सकता।

    राज्य सरकार ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने सरकारी आदेश संख्या 1715 का सहारा लिया, जबकि अदालत के सामने उसकी वैधता या लागू होने का मुद्दा कभी उठाया ही नहीं गया। इसमें तर्क दिया गया कि एग्जीक्यूटिव इंस्ट्रक्शन (सरकारी आदेश), तमिलनाडु में जानवरों के वध को नियंत्रित करने वाले कानूनों या नियमों से ऊपर नहीं हो सकता।

    अपनी स्पेशल लीव पिटिशन में राज्य ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के सामने दायर रिट पिटिशन का दायरा सीमित था - यह सिर्फ़ कोयंबटूर में बकरीद के दौरान सार्वजनिक जगहों पर गायों के वध को रोकने तक ही सीमित था। हालांकि, डिवीज़न बेंच ने इस मुद्दे का दायरा बढ़ा दिया और गाय के वध पर "पूरी तरह से और हर जगह रोक" (absolute and blanket ban) लगाई, यहां तक कि तय स्लॉटरहाउस (वधशालाओं) में भी, जबकि याचिकाकर्ता ने ऐसी कोई राहत नहीं मांगी थी। इस तरह ऐसी राहत दी गई, जिसके लिए न तो कोई दलील दी गई और न ही कोई प्रार्थना की गई।

    राज्य ने कहा कि हालाँकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले के एक हिस्से में सही कहा था कि जानवरों का वध केवल तय स्लॉटरहाउस में ही हो सकता है, लेकिन साथ ही उसने यह भी निर्देश दिया कि बकरीद या किसी अन्य दिन किसी भी गाय या बछड़े का वध नहीं किया जाना चाहिए। सरकार के अनुसार, इससे फैसला आपस में विरोधाभासी हो जाता है।

    याचिका में हाईकोर्ट की इस बात पर भी आपत्ति जताई गई कि अधिकारियों ने असल में यह मान लिया था कि सार्वजनिक जगहों पर गायों का वध किया जा रहा था या किया जाएगा। सरकार के अनुसार, पुलिस ने अपने काउंटर एफिडेविट (जवाब) में लगातार यह कहा कि सार्वजनिक जगहों पर कोई वध न हो, यह पक्का करने के लिए पहले ही एहतियाती कदम उठाए जा चुके थे और कोई भी धार्मिक बलि बंद, सार्वजनिक न होने वाली जगहों तक ही सीमित रहेगी। उसका कहना है कि हाई कोर्ट का निष्कर्ष राज्य के पक्ष के विपरीत है।

    सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, राज्य की याचिका 9 जून को दायर की गई और अभी यह फाइलिंग में हुई कमियों को ठीक करने के लिए 'डिफेक्ट लिस्ट' में है।

    यह याचिका राज्य की स्टैंडिंग काउंसिल, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड जयश्री नरसिम्हन ने दायर की।

    Case : The Secretary to the Government v. K Surya alias K Surya Prasanth | Diary No.36054/2026

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