सुप्रीम कोर्ट पहुंचा स्वतंत्र भारद्वाज का मामला, कहा गया- कबूलनामे से पता चलता है कि पुलिस ने हिंसक लोगों को छात्र-प्रदर्शन में घुसने दिया

Shahadat

8 Sept 2026 9:03 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट पहुंचा स्वतंत्र भारद्वाज का मामला, कहा गया- कबूलनामे से पता चलता है कि पुलिस ने हिंसक लोगों को छात्र-प्रदर्शन में घुसने दिया

    छात्र विरोध प्रदर्शन के मामले में याचिकाकर्ता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। इसमें कहा गया कि स्वतंत्र भारद्वाज ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के एक प्रदर्शनकारी के पिता पर हमला किया था। इससे यह साफ होता है कि हिंसक सोच वाले लोगों को जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों में घुसने दिया गया।

    हलफनामे में कहा गया कि 20 जुलाई को संसद तक निकाला गया विरोध मार्च सरकारी नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध के लिए था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने "अराजक" तत्वों को शामिल करके और ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल करके कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ दिया और मार्च को जबरन रोक दिया।

    हलफनामे में कहा गया,

    "...पुलिस ने जानबूझकर शांतिपूर्ण जुलूस में अराजक तत्वों - जैसे स्वतंत्र भारद्वाज और अन्य, जो हिंसा भड़काने के इरादे से लाठी और डंडे लिए हुए थे - को घुसने दिया ताकि अशांति फैलाई जा सके। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लाठीचार्ज, पैलेट गन, आंसू गैस और वॉटर कैनन जैसे ज़बरदस्ती वाले कदम उठाने का बहाना बनाया जा सके। इसका एकमात्र मकसद सरकार की गलत शिक्षा नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलना था।"

    CJP प्रदर्शनकारी के पिता पर हमला करने के बारे में स्वतंत्र भारद्वाज के सार्वजनिक कबूलनामे पर याचिकाकर्ता का कहना है,

    "...इस घुसपैठ की बुरी नीयत तब और साफ़ हो जाती है, जब स्वतंत्र भारद्वाज ने खुद पत्रकार नेहा सिंह राठौर के एक सार्वजनिक पॉडकास्ट में यह स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शनकारी (निशु आज़ाद के पिता) का सिर फोड़ दिया। उनकी अपनी आवाज़ में और सार्वजनिक रूप से की गई यह स्वीकारोक्ति दिखाती है कि जुलूस में शामिल किए गए लोग शांतिपूर्ण प्रतिभागी नहीं थे, बल्कि हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोग थे। उनकी मौजूदगी का इस्तेमाल ऐसी स्थितियां पैदा करने के लिए किया गया, जिनका हवाला देकर बाद में पुलिस ने ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल करने को सही ठहराया।"

    याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों (जिन्हें "स्पॉटर" कहा गया है) की तैनाती के बारे में दिल्ली पुलिस के तर्क का भी विरोध किया गया। इसमें दावा किया गया कि दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978, BNSS या पुलिस की शक्तियों को नियंत्रित करने वाले किसी अन्य कानून के तहत इसके लिए कोई कानूनी आधार नहीं था।

    "वर्दीधारी बल को सादे कपड़ों में तैनात करना - खासकर तब जब वे लाठियों से लैस हों और भीड़ को काबू करने के काम में शामिल हों - पूरी तरह से गैर-कानूनी, अपारदर्शी और पहचान-योग्य व जवाबदेह पुलिसिंग के सिद्धांत के खिलाफ है। कोई प्रशासनिक तरीका, चाहे वह कितना भी व्यापक क्यों न हो, ऐसी कोई शक्ति नहीं बना सकता जो कानून द्वारा न दी गई हो।"

    हाल ही में, दिल्ली की एक अदालत ने CJP प्रदर्शनकारी के पिता पर हमले के मामले में स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ उनकी 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका भी खारिज कर दी।

    जवाब-हलफनामा वकील चांद कुरैशी के माध्यम से दाखिल किया गया।

    Case: Shailendra Mani Tripathi v. Union of India & Ors., Diary No. 44078/2026 (and connected cases)

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