समान वेतन की मांग करने वाले पश्चिम बंगाल के पार्ट-टाइम शिक्षकों को नई प्रतिनिधित्व याचिका दाखिल करने की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
6 Jan 2026 5:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने आज पश्चिम बंगाल के कुछ अंशकालिक (पार्ट-टाइम) शिक्षकों को राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव के समक्ष पूर्णकालिक शिक्षकों के समान वेतन (पे-पैरिटी) की मांग को लेकर नई अभ्यावेदन/प्रतिनिधित्व (representation) दाखिल करने की अनुमति दी। अदालत ने निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी उनके अभ्यावेदन पर चार महीने के भीतर कारणयुक्त (reasoned) आदेश पारित करे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया। कोर्ट में आदेश का ऑपरेटिव भाग पढ़ते हुए न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि—
याचिकाकर्ता 6 सप्ताह के भीतर सचिव (स्कूल शिक्षा विभाग) के समक्ष नया अभ्यावेदन दायर कर सकते हैं।
सचिव याचिकाकर्ताओं को प्रतिनिधिक क्षमता में सुनवाई का अवसर देंगे।
संबंधित स्कूलों से नियुक्ति एवं कार्य-रिकॉर्ड मंगाए जाएंगे और पक्षकार उन्हें देख सकेंगे।
अभ्यावेदन तथा प्रस्तुतियों पर विचार कर सक्षम प्राधिकारी 4 माह में विस्तृत व कारणयुक्त आदेश पारित करेगा।
यदि कोई प्रतिकूल आदेश पारित होता है, तो याचिकाकर्ता कानून के अनुसार उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकेंगे।
आदेश पढ़े जाने के बाद जस्टिस नाथ ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा — “यहां मत आना!”
पृष्ठभूमि
28 जुलाई 2010 के एक सरकारी आदेश के तहत संविदा आधारित पार्ट-टाइम शिक्षकों को 10 दिन आकस्मिक अवकाश और 10 दिन चिकित्सीय अवकाश का लाभ दिया गया था, बशर्ते वे नियमित शिक्षकों के समान साप्ताहिक कक्षाएँ लें।
इसके बावजूद कुछ पार्ट-टाइम शिक्षकों को नियमित शिक्षकों के समकक्ष नहीं माना गया, जिस पर समान कार्य के लिए समान वेतन की मांग उठाते हुए हाईकोर्ट में याचिकाएँ दायर की गईं। एक याचिका खासतौर पर बर्दवान जिले के खंद्रा हाई स्कूल के पार्ट-टाइम शिक्षकों से संबंधित थी।
हाईकोर्ट के निर्देश पर शिक्षा विभाग के सचिव ने मामला याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध तय किया और उनकी सेवा नियमित करने से इनकार किया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि कुछ अवधियों — जुलाई 2007 से 27 जुलाई 2010 तथा 25 दिसंबर 2013 के बाद की अवधि — को बिना कारण अनदेखा कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि 15.01.2025 के आदेश में विभाग ने उनकी समान वेतन की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि पार्ट-टाइम और फुल-टाइम शिक्षकों के संगठनात्मक और प्रबंधकीय ढांचे अलग हैं, जबकि अदालतें पहले ही ऐसे तर्कों को अस्वीकार कर चुकी हैं। उनके अनुसार आदेश में यह नहीं आंका गया कि पार्ट-टाइम शिक्षक जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के लिहाज़ से नियमित शिक्षकों के समान कार्य कर रहे थे या नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2024 के निर्णय की अवमानना है, जिसमें पार्ट-टाइम शिक्षकों के समान वेतन के दावे के अधिकार को मान्यता दी गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि आदेश का परिणाम यह होगा कि तीनों अदालतों में जीत के बावजूद उन्हें केवल 2010–2013 की अवधि के लिए ही लाभ मिलेगा, जो “अनुचित और अव्यवहारिक” है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नई प्रतिनिधित्व प्रक्रिया के माध्यम से मामले के पुनर्विचार का मार्ग खोला है।

