BREAKING | 'वंदे मातरम्' सर्कुलर के खिलाफ याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट बोला—न गाने पर कोई दंड नहीं

Praveen Mishra

25 March 2026 1:30 PM IST

  • BREAKING | वंदे मातरम् सर्कुलर के खिलाफ याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट बोला—न गाने पर कोई दंड नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी हालिया सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। यह सर्कुलर आधिकारिक कार्यक्रमों और स्कूलों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के सभी अंतरे गाने से संबंधित है। कोर्ट ने कहा कि सर्कुलर में गीत गाना अनिवार्य नहीं किया गया है।

    कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गीत न गाने पर कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है और याचिकाकर्ता द्वारा व्यक्त सामाजिक भेदभाव की आशंकाएं “अस्पष्ट” हैं। कोर्ट ने याचिका को “समय से पहले” (premature) बताते हुए खारिज कर दिया।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ मोहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 28 जनवरी को MHA द्वारा जारी सर्कुलर और उसके बाद कार्यालयों व स्कूलों में 'वंदे मातरम्' गाने के प्रोटोकॉल को चुनौती दी गई थी।

    सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस बागची ने कहा कि MHA का सर्कुलर एक “एडवाइजरी” है और यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि इसका पालन न करने पर कोई दंड निर्धारित नहीं है।

    याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि भले ही 'एडवाइजरी' का पालन न करने पर कोई दंड नहीं है, लेकिन इससे 'वंदे मातरम्' गाने के लिए सामाजिक दबाव उत्पन्न हो सकता है और जो लोग इसे नहीं गाएंगे, उन्हें अलग-थलग कर भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “उन्हें conform करने के लिए मजबूर किया जाएगा।”

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सर्कुलर में स्कूलों में गीत गाने के संदर्भ में “may” शब्द का उपयोग किया गया है। “यहां 'may' शब्द का इस्तेमाल हुआ है। कोई दंडात्मक या प्रतिकूल परिणाम नहीं हैं। किसी ने आपसे यह नहीं कहा कि आप अपने संस्थान में इसे करें,” CJI ने कहा।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो किसी अन्य मामले में उपस्थित थे, ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “क्या हमें राष्ट्रीय गीत का सम्मान करने के लिए भी सलाह की आवश्यकता है?”

    हेगड़े ने कहा कि सभी धर्मों के लोग, यहां तक कि नास्तिक भी, अंततः “loyalty के सामाजिक प्रदर्शन” के रूप में इसे गाने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

    सॉलिसिटर जनरल ने संविधान के अनुच्छेद 51A(a) का हवाला दिया। इस पर हेगड़े ने कहा कि अनुच्छेद 51A(a) के अनुसार नागरिकों का कर्तव्य केवल राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना है, 'वंदे मातरम्' का इसमें उल्लेख नहीं है।

    हेगड़े ने कहा, “देशभक्ति को मजबूर नहीं किया जा सकता।”

    इस पर CJI ने पूछा, “क्या राष्ट्रगान के लिए भी इसे बाध्य नहीं किया जा सकता?”

    हेगड़े ने जवाब दिया, “यदि संविधान का कोई अर्थ है, तो उसे व्यक्तिगत अंतरात्मा की रक्षा करनी चाहिए। हमारी परंपरा सहिष्णुता सिखाती है। यदि यह केवल बिना दंड वाली एडवाइजरी है, तो इसे लागू करने का कोई तरीका नहीं है।”

    जस्टिस बागची ने कहा, “जब आपको इस एडवाइजरी के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़े, तब हमारे पास आइए।”

    हेगड़े ने कहा कि “conform करने का खतरा” है। इस पर असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “ऐसा कोई खतरा नहीं है… आपकी आशंकाएं अस्पष्ट हैं।”

    CJI ने कहा, “यह समय से पहले की आशंका है; यदि कोई दंडात्मक परिणाम होते हैं, तो हमारे पास आइए।”

    जस्टिस बागची ने कहा, “हमें लगता है कि आपकी भेदभाव की आशंकाएं अस्पष्ट हैं और उनका इस सर्कुलर से कोई स्पष्ट संबंध नहीं है।”

    हेगड़े ने राष्ट्रगान की गरिमा कम होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि हाल ही में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 'वंदे मातरम्' तीन मिनट तक गाया गया, जिससे राष्ट्रगान दब सकता है। उन्होंने कहा कि सर्कुलर के अनुसार राष्ट्रीय गीत राष्ट्रगान से पहले गाया जाएगा, जिससे राष्ट्रगान का महत्व कम होगा।

    उन्होंने कहा, “कई नागरिकों पर conform करने का दबाव होगा।”

    चीफ़ जस्टिस ने असहमति जताते हुए कहा, “यह केवल एक प्रोटोकॉल है। इसमें 'when it is played' शब्द का उपयोग किया गया है। पहले भी राष्ट्रीय ध्वज का प्रोटोकॉल था, जिसमें यह बताया गया था कि यदि कोई उसे फहराना चाहता है तो किन बातों का पालन करना होगा।”

    हेगड़े ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज के लिए 'Prevention of Insults to National Honour Act' के तहत वैधानिक आधार है।

    उन्होंने कहा कि यह पूरे देश के नागरिक जीवन को प्रभावित करने वाला मामला है और ऐतिहासिक कारणों से राष्ट्रीय गीत के पूर्ण संस्करण को अपनाया नहीं गया था। “राष्ट्रीय गीत के लिए कानूनी ढांचे का अभाव इस एडवाइजरी को अस्थिर बनाता है,” उन्होंने कहा।

    CJI ने कहा, “यदि इसे अनिवार्य बनाया जाता तो हम इस तर्क की सराहना करते। लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं है—न कोई दंड, न कोई अनिवार्यता।”

    सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “जो व्यक्ति कहता है कि देशभक्ति अनिवार्य नहीं है, उसे कोर्ट में रिट दायर करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।”

    इस पर हेगड़े ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा, “यह केवल दिखावा है। संविधान सभी के लिए है। यह इस पर निर्भर नहीं करता कि आप राजनीतिक या धार्मिक रूप से कहां खड़े हैं।”

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