सभी अदालतों में महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए नियम बनाए केंद्र और BCI: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
18 Sept 2026 6:47 PM IST

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से कहा कि वे मिलकर हाईकोर्ट, ज़िला अदालतों, तालुका अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य अर्ध-न्यायिक संस्थाओं में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने के लिए नियम बनाएं।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' (POSH Act) को कानूनी पेशे से जुड़ी महिलाओं पर "सख्त और एक ही तरह से" (Straitjacket Manner) लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संबंधित पक्षों से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के 2013 के नियमों का अध्ययन करें और अन्य अदालतों के लिए भी वैसा ही ढांचा तैयार करें।
बेंच ने कहा,
"ये नियम केवल सुप्रीम कोर्ट परिसर के लिए बनाए गए। हाईकोर्ट, ज़िला न्यायपालिका के तहत आने वाली सभी अदालतों, केंद्र और राज्य सरकारों के ट्रिब्यूनल और अन्य अर्ध-न्यायिक संस्थाओं आदि में इन नियमों का दायरा बढ़ाने के लिए अलग से नियम बनाना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हम पाते हैं कि 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' के प्रावधानों को कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं पर सख्ती से या एक ही तरह से लागू नहीं किया जा सकता। इन हालात में हम संबंधित पक्षों के वकीलों से अनुरोध करते हैं कि वे आपस में चर्चा करें और ऊपर बताई गई सभी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अदालतों, ट्रिब्यूनल और संस्थाओं पर लागू होने वाले नियमों का एक सेट तैयार करें।"
कोर्ट ने BCI को यह पता लगाने का भी निर्देश दिया कि क्या राज्य बार काउंसिल द्वारा पहले से ही ऐसे कोई नियम लागू किए जा रहे हैं।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"प्रतिवादी बार काउंसिल की वकील ने भी कहा कि वह इस मामले में निर्देश लेंगी और कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं के लिए एक समान नियम बनाने की कोशिश करेंगी। हम बार काउंसिल ऑफ इंडिया की वकील से भी अनुरोध करते हैं कि वे राज्यों की बार काउंसिल से पता करें कि क्या इस संबंध में कोई मौजूदा नियम लागू किए जा रहे हैं।"
कोर्ट ने कहा कि 'भारत के सुप्रीम कोर्ट में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन और महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) नियम, 2013' खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट परिसर के लिए बनाए गए और महिला वकीलों के लिए एक सिस्टम देते हैं।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हाईकोर्ट, ज़िला अदालतों और तालुका अदालतों के लिए भी ऐसा ही सिस्टम बनाया जा सकता है।
उन्होंने कहा,
"तो, अब हाईकोर्ट के लिए भी आप ऐसा कर सकते हैं। शायद आप इसे अपना सकते हैं। 'सुप्रीम कोर्ट' की जगह आप 'हाईकोर्ट' कह सकते हैं। ज़िला अदालत और तालुका अदालत का क्या? उन्हें भी निर्देश दिए जाने चाहिए।"
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रस्तावित नियमों में कार्यस्थल को परिभाषित करना होगा और वे सिर्फ़ POSH Act की नकल नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय और राज्य कानूनों के तहत बने ट्रिब्यूनल, अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण और अन्य निकायों पर भी विचार करना होगा।
कोर्ट एक PIL पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें यह घोषित करने की मांग की गई कि POSH Act, 2013 के तहत सुरक्षा उन महिला वकीलों तक भी है जो स्टेट बार काउंसिल में रजिस्टर्ड हैं और अदालतों में प्रैक्टिस कर रही हैं। याचिका में बार काउंसिल और बार एसोसिएशन को महिला वकीलों की शिकायतों को सुनने के लिए आंतरिक समितियां बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई।
यह याचिका तब दायर की गई, जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि POSH Act बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के कर्मचारियों पर तो लागू होता है, लेकिन महिला वकीलों पर नहीं, क्योंकि उनके बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध नहीं होता है।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट महालक्ष्मी पावनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'मेधा कोटवाल लेले बनाम भारत संघ' मामले में बार काउंसिल और बार एसोसिएशन को महिला वकीलों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने के लिए सिस्टम बनाने का निर्देश दिया था।
पावनी ने यह भी कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35, जो पेशेवर कदाचार से संबंधित है, POSH Act के तहत परिकल्पित सिस्टम की जगह नहीं ले सकती।
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट इस मामले से निपटने के लिए काफी व्यापक है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सीनियर और जूनियर वकील के बीच एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई (मालिक-कर्मचारी) जैसा कोई रिश्ता नहीं होता है। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट के कर्मचारियों के लिए मौजूद POSH सिस्टम अकेले वकीलों से जुड़े इस मामले को हल नहीं कर सकते।
उन्होंने सभी पक्षों से इस बात पर विचार करने को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों को देश भर के वकीलों के लिए कैसे लागू किया जा सकता है, क्योंकि ये नियम वकीलों पर भी लागू होते हैं।
उन्होंने कहा,
"इस बात को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ें, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में यह सिस्टम काफी अच्छा काम कर रहा है। आप इसे भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूरे परिसर के लिए देखें और उसी के अनुसार, आपको इसे हर राज्य के हाईकोर्ट परिसर के लिए भी बनाना होगा। और हर कोर्ट के हिसाब से आपको बस इसे ही लागू करना होगा। नियमों का एक और सेट तैयार करें। उन्हें सभी बार काउंसिल द्वारा लागू किया जा सकता है।"
BCI की वकील राधिका गौतम ने कहा कि वह निर्देश लेंगी और कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं के लिए एक कॉमन नियम लाने की कोशिश करेंगी। उन्होंने महिला वकीलों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने वाले मौजूदा नियमों के बारे में सभी राज्य बार काउंसिल से जानकारी लेने के लिए समय मांगा।
कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 25 नवंबर की तारीख तय की।
Case Title – Seema Joshi v. Bar Council of India and Ors.

