सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल पुराने रिश्वत मामले में एक्साइज इंस्पेक्टर की सज़ा बरकरार रखी, दोषी की उम्र 75 साल होने के कारण सज़ा कम की

Shahadat

14 March 2026 11:52 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल पुराने रिश्वत मामले में एक्साइज इंस्पेक्टर की सज़ा बरकरार रखी, दोषी की उम्र 75 साल होने के कारण सज़ा कम की

    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के एक पूर्व एक्साइज कांस्टेबल की भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत रिश्वत के जाल वाले मामले में सज़ा बरकरार रखा। हालांकि, उनकी ज़्यादा उम्र और हिरासत में पहले ही बिताए गए समय को देखते हुए उनकी सज़ा कम की।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राज बहादुर सिंह द्वारा उत्तराखंड हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील खारिज की। हाईकोर्ट ने राज बहादुर सिंह को अवैध रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के आरोप में दोषी ठहराया। हालांकि, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा में कुछ बदलाव किए।

    मामले की पृष्ठभूमि

    अपीलकर्ता राज बहादुर सिंह, ऊधम सिंह नगर ज़िले में एक्साइज विभाग में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे। अभियोजन पक्ष का मामला कश्मीर सिंह की शिकायत से शुरू हुआ, जो कथित तौर पर अवैध शराब बनाने के काम में शामिल थे।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, 16 जून 1990 को शिकायतकर्ता के गांव में की गई एक छापेमारी के दौरान, आरोपी ने शिकायतकर्ता पर कुछ दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला और अवैध रिश्वत के तौर पर 500 रुपये की मांग की। शिकायतकर्ता को कथित तौर पर धमकी दी गई कि यदि यह रकम नहीं दी गई तो उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में चालान पेश कर दिया जाएगा।

    शिकायतकर्ता ने 18 जून 1990 को सतर्कता विभाग से संपर्क किया। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए खटीमा के एक रेस्टोरेंट में एक जाल बिछाया गया। शिकायतकर्ता को 100-100 रुपये के पांच नोट दिए गए, जिन पर फिनोलफथेलिन पाउडर लगा हुआ।

    19 जून, 1990 को जाल बिछाने वाली टीम ने आरोपी के पास से वे नोट बरामद कर लिए। जब ​​आरोपी के हाथों को सोडियम कार्बोनेट के घोल में धोया गया, तो घोल का रंग गुलाबी हो गया, जिससे यह पुष्टि हो गई कि आरोपी के हाथों का संपर्क फिनोलफथेलिन पाउडर से हुआ।

    जांच पूरी होने के बाद PC की धारा 13(2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 7 और 13(1)(d) के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।

    दोषसिद्धि बरकरार

    साल 2006 में ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया और अधिनियम की धारा 7 के तहत एक साल के कठोर कारावास और धारा 13(2) के तहत दो साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई, साथ ही जुर्माना भी लगाया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2012 में दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने निजी दुश्मनी के कारण और अपने अवैध शराब के कारोबार पर होने वाली कार्रवाई से बचने के लिए उसे झूठा फंसाया। यह तर्क भी दिया गया कि गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे और यह कि यह जाल शिकायतकर्ता और पुलिस द्वारा रचा गया।

    कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया।

    कोर्ट ने यह पाया कि दोषसिद्धि मुख्य रूप से शिकायतकर्ता (PW-1) और स्वतंत्र शैडो गवाह (PW-2) के एक जैसे बयानों पर आधारित थी; इन दोनों ने ही रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किए जाने के संबंध में अभियोजन पक्ष की बात का समर्थन किया।

    कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि शैडो गवाह एक "हितबद्ध गवाह" (Interested Witness) था; कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता के साथ केवल जान-पहचान होना ही, किसी तरह की दुश्मनी या पक्षपात को दर्शाने वाले ठोस सबूतों के अभाव में ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का आधार नहीं बन सकता।

    इसके अलावा, कोर्ट को बचाव पक्ष के इस तर्क में कोई दम नहीं लगा कि यह जाल (trap) मनगढ़ंत था, या फिर सबूतों में मौजूद विरोधाभासों ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर कर दिया था।

    करेंसी नोट पेश न करना कोई गंभीर बात नहीं

    अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी कि जिन करेंसी नोटों पर आरोप था, उन्हें कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया, जिससे अभियोजन पक्ष का केस कमज़ोर पड़ जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को मानने से यह देखते हुए इनकार किया कि यह मुद्दा न तो ट्रायल कोर्ट में उठाया गया था, न ही हाई कोर्ट में, और न ही स्पेशल लीव पिटीशन में।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि करेंसी नोटों की बरामदगी और फेनोल्फथेलिन टेस्ट, जिससे यह पक्का हुआ कि आरोपी ने ही उन्हें छुआ, ये बातें पंचनामा में ठीक से दर्ज थीं और गवाहों की गवाही से भी इनकी पुष्टि हुई।

    कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें उसने बचाव पक्ष के एक गवाह की गवाही खारिज किया था। यह गवाह उस रेस्टोरेंट का मालिक था, जहां छापा मारा गया; उसने इस बात से इनकार किया कि वहां कोई छापा पड़ा था।

    हाईकोर्ट ने यह तर्क दिया कि वह गवाह, जो उसी शहर का रहने वाला था। उसी शहर में एक छोटा सा रेस्टोरेंट चलाता था, जहां आरोपी रहता था, शायद किसी स्थानीय सरकारी अधिकारी के खिलाफ गवाही देने में हिचकिचा रहा हो।

    सुप्रीम कोर्ट को इस तर्क में कोई गलती नज़र नहीं आई।

    दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कोर्ट ने काफी लंबा समय बीत जाने और अपीलकर्ता की उम्र को देखते हुए उसकी सज़ा कम की।

    कोर्ट ने पाया कि 1990 में जब यह अपराध हुआ था, तब अपीलकर्ता की उम्र लगभग 40 साल थी। अब वह करीब 75 साल का है। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि 2012 में आत्मसमर्पण करने के बाद ज़मानत मिलने से पहले, वह पहले ही लगभग दो महीने और 24 दिन हिरासत में बिता चुका था।

    Cause Title: RAJ BAHADUR SINGH VERSUS STATE OF UTTARAKHAND

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