'इस दिवाली को आनंदमय बनाएं': सुप्रीम कोर्ट ने विराट कोहली और अन्य सेलिब्रिटी से बिना पटाखों के दिवाली मनाने का मैसेज देने का सुझाव दिया
Shahadat
29 Oct 2026 8:31 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और दिल्ली के अधिकारियों को सुझाव दिया कि विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर और समाज की अन्य सम्मानित हस्तियों को जन-जागरूकता अभियान में शामिल किया जा सकता है। इस अभियान के जरिए लोगों को बिना पटाखों के दिवाली मनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच Delhi-NCR में वायु प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।
कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि वे पटाखों पर लगी पाबंदियों का टेलीविजन, अखबारों और अन्य माध्यमों से व्यापक प्रचार करें। साथ ही कोर्ट ने सुझाव दिया कि जानी-मानी हस्तियां जागरूकता संदेश रिकॉर्ड कर सकती हैं, जिसमें वे लोगों से अपील करें कि वे प्रदूषण बढ़ाए बिना रोशनी के इस त्योहार (दिवाली) को मनाएं।
जस्टिस वराले ने कहा,
"आप जन-जागरूकता फैलाने के लिए मशहूर खिलाड़ियों या समाज के विभिन्न क्षेत्रों की सम्मानित हस्तियों की मदद क्यों नहीं लेते?"
जस्टिस सुंदरेश ने आगे कहा,
"दिल्ली के मामले में अगर आप उनसे कहेंगे तो वे जरूर आएंगे और आपकी मदद करेंगे। आप विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटरों से एक ऐसा संदेश रिकॉर्ड करने का अनुरोध कर सकते हैं, जिसमें वे लोगों से कहें कि आइए इस दिवाली को आनंदमय बनाएं। आइए रोशनी के इस त्योहार का असली आनंद लें। जैसा कि सही कहा गया, पहले ऐसा नहीं होता था। समस्या तब शुरू हुई जब आतिशबाजी का चलन आया। 14वीं-15वीं सदी के आसपास जब बारूद का इस्तेमाल शुरू हुआ, तब से ही शायद यह सब इसमें शामिल हो गया होगा।"
उन्होंने कहा कि अधिकारियों को यह संदेश देना चाहिए कि त्योहार मनाने के लिए ऐसी किसी गतिविधि की जरूरत नहीं है, जिससे दूसरों को नुकसान पहुंचे। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को पटाखों से होने वाले प्रदूषण और उसके हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने बच्चों को वायु प्रदूषण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी शामिल करने का सुझाव दिया, क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार पर भी असर डाल सकते हैं।
जस्टिस सुंदरेश ने कहा,
"शायद अब समय आ गया कि हम शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दें कि वे बच्चों को जागरूक करें। शुरुआत यहीं से होनी चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि हम किसी को भी परेशान किए बिना इस त्योहार को कैसे मना सकते हैं।"
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी बदलावों को जल्दी अपना लेती है, इसलिए बच्चों को जागरूक करने से वे अपने परिवारों को बिना पटाखों के त्योहार मनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा,
"हमें एक संदेश देना होगा। मेरा मानना है कि आज की युवा पीढ़ी पटाखों को लेकर काफी संशय रखती है। समस्या असल में दूसरों की तरफ से है। लेकिन अगर हम बच्चों को सही जानकारी दें, तो वे अपने माता-पिता से कहेंगे कि वे ऐसा न करें। नई पीढ़ी दिवाली तो मनाना चाहती है—इसमें कोई दिक्कत नहीं है—लेकिन वे पटाखों में विश्वास नहीं रखते। सोचिए, इसका कितना बड़ा असर हो सकता है।"
अदालत ने प्रदूषण के असर का जिक्र करते हुए कहा कि उसे सभी का ध्यान रखना है—बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, बीमार लोगों, और जीव-जंतुओं का भी।
अदालत ने त्योहार से जुड़ी भावनाओं का सम्मान किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इन भावनाओं को जनस्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जस्टिस सुंदरीश ने बताया कि संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, वह भी जनस्वास्थ्य और संविधान के भाग III में दिए गए अन्य अधिकारों के अधीन है।
अदालत ने कहा कि अभी वह पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से स्थिति और बिगड़ सकती है। हालांकि, अदालत ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि अगर उनके निर्देशों का पालन नहीं कराया गया तो उन्हें मजबूरन "बहुत सख्त रुख" अपनाना पड़ सकता है।
Case Title : Arjun Gopal v. Union of India

